IIT एक्‍सपर्ट्स ने चेताया, आने वाले दिनों में दिल्‍ली-एनसीआर में आ सकता है बड़ा भूकंप

नई दिल्ली: पिछले दो महीनों में दिल्‍ली कई बार कांप चुकी है। भले ही भूकंप के ये झटके हल्‍के रहे हों, एक डर लोगों के दिलों में बैठ गया है। एक्‍सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि दिल्‍ली-एनसीआर में एक बड़े भूकंप का खतरा है। हल्‍के झटके बार-बार लगना किसी बड़े भूकंप का संकेत है। यह इंडियन इं‍स्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी (IIT) के एक्‍सपर्ट्स का कहना है। आने वाले कुछ दिनों में दिल्‍ली और एनसीआर में हाई इन्‍टेंसिटी का भूकंप आ सकता है। IIT धनबाद के डिपार्टमेंट्स ऑफ अप्‍लाइड जियोफिजिक्‍स और सीस्‍मोलॉजी ने लंबी रिसर्च के बाद यह चेतावनी दी है।

IIT धनबाद में सीस्‍मोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड पी.के. खान कहते हैं, “कम तीव्रता के झटके बार-बार लगना एक बड़े भूकंप का संकेत है।” उन्‍होंने कहा कि पिछले दो साल में दिल्‍ली-एनसीआर ने रिक्‍टर स्‍केल पर 4 से 4.9 तीव्रता वाले 64 भूकंप देखे हैं। वहीं पांच से ज्‍यादा तीव्रता वाले भूकंप 8 बार आए। खान के मुताबिक, “यह दिखाता है कि इलाके में स्‍ट्रेन एनर्जी बढ़ रही है खासतौर से नई दिल्‍ली और कांगड़ा के नजदीक।”

प्रफेसर खान ने बताया कि एनसीआर और उत्‍तरकाशी की दूरी सिर्फ 260 किलोमीटर है जबकि कांगड़ा 370 किलोमीटर दूर है। दोनों इलाके खतरनाक भूकंप आने के लिए जाने जाते हैं। इस फॉल्‍ट लाइन पर एक बड़ा भूकंप एनसीआर को प्रभावित करेगा ही करेगा। कांगड़ा के नजदीक स्थित चम्‍बा में साल 1945 में 6.3 तीव्रता का भूकंप आया था। पास के ही धर्मशाला ने 1905 में 7.8 तीव्रता का भूकंप झेला था।

IIT प्रफेसर के मुताबिक, हाल की सीस्मिक ऐक्टिविटी की क्‍लस्टरिंग छोटी है। उत्‍तरकाशी के नजदीक गढ़वाल में एक निष्क्रिय इलाका है जहां पर 1803 में 7.7 और 1991 में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया था। बढ़ते शहरीकरण और बिल्‍डर्स के भूकंप संबंधी मानकों का पालन न करने के चलते एक बड़ा भूकंप एनसीआर के लिए प्रलयकारी साबित हो सकता है। खान ने कहा कि दिल्‍ली-हरिद्वार रिज पर भी हलचल हो रही है। वहां हर साल प्‍लेट में 44 मिलीमीटर का मूवमेंट देखने को मिल रहा है।

IIT कानपुर में सिविल इंजिनियरिंग विभाग के प्रफेसर जावेद एन मलिक के अनुसार, उनके इस दावे का आधार यह है कि पिछले 500 साल में गंगा के मैदानी क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। उत्‍तराखंड के रामनगर में चल रही खुदाई में 1505 और 1803 में भूकंप के अवशेष मिले हैं। उन्‍होंने बताया कि 1885 से 2015 के बीच देश में सात बड़े भूकंप दर्ज किए गए हैं। इनमें तीन भूकंपों की तीव्रता 7.5 से 8.5 के बीच थी।

वाडिया इंस्‍टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के चीफ डॉ कलाचंद जैन ने चेतावनी दी है कि NCR क्षेत्र में लगातार सीस्मिक ऐक्टिविटी हो रही है और इससे दिल्‍ली में एक बड़ा भूकंप आ सकता है। IIT जम्‍मू के प्रोफेसर चंदन घोष ने कहा कि अगर कोई बड़ा भूकंप इस इलाके में आया तो भयानक नतीजे होंगे।

किसी भी बड़े भूकंप का 300-400 किलोमीटर की रेंज तक दिखता है। 2001 में भुज में आए भूकंप ने करीब 300 किमी दूर अहमदाबाद में भी बड़े पैमाने पर तबाई मचाई थी। इसके अलावा, भूकंप की कम तीव्रता की तरंगें दूर तक असर कर बिल्डिंगों में कंपन पैदा कर देती हैं। गंगा के मैदानी क्षेत्रों की मुलायम मिट्टी इस कंपन के चलते धसक जाती है। केंद्र सरकार के आदेश पर डिजिटल ऐक्टिव फॉल्ट मैप ऐटलस तैयार किया गया है। इसमें ऐक्टिव फॉल्टलाइन की पहचान के अलावा पुराने भूकंपों का रेकॉर्ड भी तैयार हुआ है। ऐटलस से लोगों को पता चलेगा कि वे भूकंप की फॉल्ट लाइन के कितना करीब हैं और नए निर्माण में सावधानियां बरती जाएंगी।

ऐटलस को तैयार करने के दौरान टीम ने उत्तराखंड के रामनगर में जमीन में गहरे गड्ढे खोदकर रिसर्च शुरू किया। जिम कॉर्बेट नैशनल पार्क से 5-6 किमी की रेंज में हुए इस अध्ययन में 1505 और 1803 में आए भूकंप के सबूत मिले। रामनगर जिस फॉल्ट लाइन पर बसा है, उसे कालाडुंगी फॉल्टलाइन नाम दिया गया है। प्रफेसर जावेद के अनुसार, 1803 का भूकंप छोटा था, लेकिन मुगलकाल के दौरान 1505 में आए भूकंप के बारे में कुछ तय नहीं हो सका है। जमीन की परतों की मदद से इसे निकटतम सीमा तक साबित करना बाकी है।

सैटलाइट से मिली तस्वीरों के अध्ययन से यह भी पता चला है कि डबका नदी ने रामनगर में 4-5 बार अपना अपना ट्रैक बदला है। अगले किसी बड़े भूकंप में यह नदी कोसी में मिल जाएगी। बरेली की आंवला तहसील के अहिच्छत्र में 12वीं से लेकर 14वीं शताब्दी के बीच भूकंपों के अवशेष मिले हैं। इंडियन और तिब्बती (यूरेशियन) प्लेटों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए फॉल्टलाइनों के करीब 20 स्थायी जीपीएस स्टेशन लगाए गए हैं। भूकंप संभावित क्षेत्रों में सेस्मोमीटर भी लगाए जा सकते हैं।

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