यूपी में बुआ-भतीजे ने किया कमाल, अब आगे क्या होगा?

आलोक कुमार

उत्तर प्रदेश की दोनों लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के नतीजे जितना भारतीय जनता पार्टी को झटका लगा है उससे बड़ा झटका सीएम योगी आदित्यनाथ को लगा है। गोरखपुर से पांच बार सांसद रह चुके योगी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सीट खाली हुई थी। भाजपा आलाकमान भी गोरखपुर सीट को लेकर निश्चिंत था। हालांकि फूलपुर को लेकर तो संशय के बादल थे। कहने को तो भाजपा नेता हार के लिए कम वोटिंग प्रतिशत और सपा-बसपा गठबंधन को दे रहे हैं, लेकिन सच्चाई तो यह है कि भाजपा की नीतियां और अति-आत्मविश्वास उसकी हार का कारण बनी।

बदले सियासी समीकरण : दो लोकसभा सीटों के नतीजे न सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि केंद्र की राजनीति के सियासी समीकरणों में भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव को यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और सपा-बसपा की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था। अगर दोनों सीटों पर भाजपा जीत जाती तो सपा-बसपा गठबंधन शायद आगे नहीं बढ़ पाता, लेकिन अब बसपा के साथ कांग्रेस के भी लोकसभा चुनाव से पूर्व एक मंच पर आने की संभावना और मजबूत हो गई है। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि उपचुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा।

लिटमस टेस्ट थे उपचुनाव : ये उपचुनाव देश की राजनीति के लिए गैर कांग्रेसी गठजोड़ का लिटमस टेस्ट भी माना जा रहा था। कारण यह है कि उत्तर प्रदेश की सियासत के दो प्रमुख दल सपा और बसपा में यहां 23 साल बाद नजदीकी देखने को मिली थी। बसपा ने इस उपचुनाव में सपा को समर्थन जरूर दिया था, लेकिन इस समर्थन को वह गठबंधन की संज्ञा देने से बचती रही थी। मायावती का कहना था कि यह सिर्फ भाजपा को हराने के लिए उठाया गया कदम था। उपचुनाव में सपा-बसपा की जीत के बाद माया-अखिलेश के बीच की निकटता और गहरा सकती है, इसमें कोई शक नहीं है। हालांकि, अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि सपा-बसपा के लिए सब कुछ आसान हो गया है। दोनों ही दलों के नेताओं की महत्वाकांक्षा किसी भी गठबंधन को आगे बढ़ाने और साथ चुनाव लडऩे के आड़े आ सकती है।

पुरानी यादें ताजा : गोरखपुर और फूलपुर में सपा को मिली जीत ने पुरानी यादें भी ताजा कर दी हैं। 90 के दशक में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की जुगलबंदी ने जो कमाल दिखाया, अब माया और अखिलेश से भी ऐसी उम्मीदें की जा रही है।

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