जानिए क्या होता है उस रात जब किसी किन्नर की हो जाती है मौत

लखनऊ: कहा जाता है कि मृत्यु एक सार्वभौम सत्य है और इसपर किसी का जोर नही चलता। कौन इंसान कब मृत्यु को प्राप्त हो जाए कोई नहीं बता सकता। इस प्रक्रिया से सभी बंधे है की जिस ने जन्म लिया है उसकी मौत एक न एक दिन निश्चित है। न सिर्फ इंसान बल्कि पशु पक्षी, पेड आदि सब एक न एक दिन मौत के हवाले हो जाते है। इस दुनिया में हर धर्म के लोगों के कुछ अलग अलग रीति रिवाज़ और रस्में हैं।

इसी तरह हर धर्म में अंतिम संस्कार को लेकर भी अलग अलग तरीके है। हिन्दू धर्म में जहाँ दाह संस्कार में स्त्री और पुरुष के शव को जलाकर अंतिम संस्कार किया जाता है वहीँ मुस्लिम और ईसाई धर्म में शव को दफनाने का रिवाज़ है। पर आज हम आपको बता रहे है की किन्नरों का अंतिम संस्कार किस तरह किया जाता है। किन्नरों की दुनिया हम सभी से बेहद अलग और रहस्यमयी होती है। इतना तो आपने सुना होगा की किन्नर की शव यात्रा को रात के अँधेरे में दुनिया से छुपा कर निकाला जाता है। इसी तरह बहुत से रहस्य है जो किन्नरों के जीवन से जुड़े हुआ है और इनपर समाज में पर्दा रखना ही सबसे बेहतर माना जाता है।

देखा जाए तो ये विषय ही रहस्यों से भरा है परन्तु इसके बावजूद भी लोग किन्नरों से जुड़ी नई नई बातों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। बहुत से लोगों के मन में ये सवाल उठते है की आखिर किन्नरों के शव के साथ क्या किया जाता है और कैसा होता है इनका अंतिम संस्कार। आज हम आपको बताते है की किन्नरों की दुनिया में क्या रीति रिवाज होते है अंतिम संस्कार के। किन्नर की मौत के बाद उसको सबसे पहले सफेद कपड़े में लपेट दिया जाता है. इसके बाद उसकी डेड बॉडी से हर प्रकार के गहने एवं वस्तें निकाली जाती हैं और उसके शरीर पर किसी प्रकार की कोई भी बंधी हुई चीज नहीं छोड़ी जाती। ऐसा उनको इसलिए किया जाता है ताकि उनकी आत्मा आजाद हो जाए और किसी तरह के बंधन ले बंध कर वह धरती पर ना रह जाए।

किन्नर की आत्मा की मुक्ति के लिए इस रसम को निभाया जाता है। इसके इलावा अंतिम संस्कार से पहले पार्थिव शरीर को जूते एवं चप्पलों से पीटा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि किन्नर द्वारा किए गए पापों से उस को हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके और उसके पापों का प्रायश्चित हो सके। गौरतलब है कि किन्नरों का अंतिम संस्कार सबसे चोरी छिपे किया जाता है ताकि कोई उसको देख ना सके। ऐसी मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति किन्नर की अंतिम यात्रा को देख ले तो उस किन्नर का अगला जन्म भी किन्नर के रूप में ही होगा।

इसलिए आम इंसान की अंतिम शव यात्रा वह दिन के समय निकाला जाता है जबकि किन्नरों की शव यात्रा को रात के समय निकालने का रिवाज है। किन्नर हिंदू धर्म को मानते हैं मगर इनके शव को जलाने की बजाय दफनाने का रिवाज सदियों से चलता आ रहा है। जहां आम इंसान की मृत्यु पर परिजन इकट्ठे होकर मातम मनाते हैं, शोक मनाते हैं वहीं किन्नरों के साथ इसके बिल्कुल विपरीत किया जाता है। दरअसल किन्नरों की मौत का मातम नहीं मनाया जाता बल्कि उनके जाने पर जश्न मनाया जाता है।

किन्नरों की मौत पर जश्न का कारण उनके नर्क रुपी जीवन से मुक्ति मिलना है। साथ ही आराध्य देव अरावन से यह कामना करते हैं कि अगले जन्म उस किन्नर को दोबारा किन्नर का रूप ना दें।

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