जेटली भी हो सकते हैं अगले प्रधानमन्त्री, जानिये पूरा गणित

अखिलेश अखिल
राजनीति केवल ठगिनी ही नहीं बेदर्द भी होती है। किसी की छाती पर पैर रखकर अगर सियासत चलती नजर आती है तो नेता लोग इसमें चूकते नहीं। इसे राजनीतिक ह्त्या कहिये या फिर राजनीतिक खेल। लेकिन इसके बिना कुछ संभव भी नहीं। इसीलिए तो राजनीति को सभ्य लोग सामाजिक कोढ़ भी कहने से नहीं चूकते। किसने किसको मारा ,किसने किसको दागा दिया और किसने अपने आका को ही बाहर कर दिया ,इसके उदाहरण भरे परे हैं। तो बहस इस बात ही है कि 2019 के चुनाव के परिणाम क्या होंगे और जो परिणाम आएंगे उसके बाद की कहानी क्या बनती दिखती है।
पूर्वोत्तर में बीजेपी की जीत मायने रखती है। तभी तो मंगलवार को जब पीएम मोदी सत्र के दौरान संसद में पहुंचे तो बीजेपी सांसदों ने उन्हें खुश करने के लिए कर्नाटक जीत की संभावनाओं पर नारे लगाए। यह बात और है कि नारे लगाने वाले नेताओं को अगले लोक सभा चुनाव में टिकट मिलेगी या नहीं कोई नहीं जानता लेकिन आखिर बीजेपी के असली महान रथ वाहक पीएम मोदी को खुश तो करना ही पडेगा। खैर कहानी यह बन रही है कि आगामी लोक सभा चुनाव में अगर बीजेपी को 250 से कम सीटें मिलती है तब क्या होगा ? क्या मोदी को फिर से प्रधानमन्त्री बनाया जाएगा ? बड़ा सवाल यही है। क्या संघ ऐसा चाहेगा और क्या एनडीए के नए घटक दल ऐसा चाहेंगे ? अभी से इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना साफ़ है कि 250 से कम की हालत में संघ को भी सोचना पडेगा और नए एनडीए में शामिल दलों को भी।
आज इस बात को मजाक में उड़ा दिया जाय लेकिन सम्भावनानो पर आधारित राजनीति के तहत  है कि तब पीएम का अगला उम्मीदवार कौन होगा ? यह बड़ा सवाल है। बीजेपी की राजनीति को देखने से पता चलता है कि ऐसी हालत में दो चेहरे सामने आते दीखते हैं। एक हैं अरुण जेटली और दूसरे हैं पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी।  आपको बता दें कि ये दो ऐसे चेहरे हैं, जिनपर पक्ष विपक्ष के अधिकतर नेता और क्षत्रप यकीन करते हैं और मानते भी हैं। और दूसरी बात यह है कि पीएम मोदी भी इन दोनों नेताओं को समर्थन दे सकते हैं।
कई लोग यह मानते हैं कि अगर मोदी पीएम बनने की स्थिति में नहीं होंगे तो अमित शाह को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। वे सबसे पहले जेटली पर दाव लगाना चाहेंगे। पूछा जा सकता है कि आरएसएस और भाजपा  राजनाथ सिंह या नितिन गडकरी पर दाव क्यों नहीं लगाएगी।  इस बारे में दो धारणा है। एक, लोकसभा चुनाव से पहले इन दोनों नेताओं को बदनाम करने का निर्णायक वार चला जाएगा। यदि उससे बच गए तो दोनों को चुनाव में हरवा दिया जाएगा।
और जहां तक लालकृष्ण आडवाणी, डा मुरलीमनोहर जोशी, सुषमा स्वराज जैसो का  सवाल है तो इनको चुनाव का टिकट मिलना भी मुश्किल है। तय माने कि भाजपा के एक-तिहाई से ज्यादा मौजूदा सांसदों के और  विधायकों के  टिकट कटने हैं ।  मोदी-शाह आगे की  तैयारी में फोकस इसी बात पर बनाए रखेंगे कि अगली लोकसभा में भाजपा के चेहरे सौ टका निराकार, बिना जुबान वाले हों। यह सब इसलिए कि भाजपा पर मोदी का कंट्रोल रहे  लेकिन एलायंस पार्टियों और नेताओं पर नहीं। ऐसी हालत  में अरूण जेटली सचमुच नरेंद्र मोदी के लिए सर्वाधिक सुरक्षित और अनुकूल नेता होंगे ।
कोई पूछ सकता है  अमित शाह क्यों नहीं? इसका जबाब साफ़ है। ऊपर से देखने में अमित शाह भले ही ताकतवर दीखते हों लेकिन सच यही है कि अमित शाह को भाजपा की वकील लॉबी ने निपटा दिया है। यदि जज लोया की मौत के मामले में जांच के आदेश हो गए ,जिसकी संभावना अधिक है तो आगे शौहराबुद्दीन केस भी खुलेगा और फिर निपट जायेगी उनकी पूरी राजनीति। यह चर्चा मामूली नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने प्रशांत किशोर को बुला कर चुनाव तैयारी के लिए कहा। इसका सीधा मतलब है कि चुनाव के लिए वे अमित शाह के बजाय खुद अपने बूते फैसले, दशा-दिशा तय कराने लगे हैं।
अरूण जेटली के फायदे की बात यह है कि एक तरफ नरेंद्र मोदी उनकी पहली पसंद होंगे तो दूसरी और वे नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडु, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, करूणानिधि आदि से फटाफट सौदा पटाने में समर्थ हैं। कुछ भी हो अरूण जेटली का न इन नेताओं से पंगा है और न कांग्रेस से ऐसा टकराव है। भाजपा की तरफ से बाकि तमाम पार्टियों में कामकाजी, सद्भावना बनाए रखने वाली राजनीति अकेले अरूण जेटली करते रहे हैं और कर रहे हैं । इसलिए  मोदी की तरफ से विकल्प अकेला जेटली का होगा।
नरेंद्र मोदी का दूसरा विकल्प प्रणब मुखर्जी होंगे। प्रणब मुखर्जी का सपना अभी भी कायम है। उन्होने नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों से जोरदार केमेस्ट्री बना रखी है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के साथ जैसे उन पर स्नेह उड़ेला हुआ है वह मतलब लिए हुए है तो नरेंद्र मोदी उन्हे अभी भी कितना मानते है यह राजनीति समझने वाले जानते हैं।  नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव जीतने के बाद संसद भवन की सीढ़ियों पर मत्था टेका तो राष्ट्रपति भवन जा कर प्रणब मुखर्जी के आगे साष्टांग हुए थे तभी से वे उनके नरेंद्रा बने हुए हैं। तो 2019 में भाजपा के बुरी तरह पिछड़ने की स्थिति में उनके रक्षक के नाते सक्रिय हो सकते हैं।
जिस तरह की राजनीतिक घेरेबंदी चल रही है उससे लगता है कि भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में 250 सीट से नीचे अटक सकती है। बहुमत की 273 सीटे उसके लिए अब दूभर है। अगर 180 से 250 के दायरे में भाजपा अटकी तो फिर एलायंस ऐसा बनेगा जिसमें प्रधानमंत्री पद के लिए अरूण जेटली और प्रणब मुखर्जी मुकद्दर के सिकंदर हो सकते हैं हैं। बता दें की यह सब एक काल्पनिक राजनितिक समझ हो सकती है लेकिन राजनीति अगर अवसरों का खेल है तो कुछ भी संभव हो सकता है और होगा भी।
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