जानिए भगवान सूर्य देव कब अपने पुत्र शनिदेव से खुद उसके घर पर मिलने जाते हैं ?

लखनऊ : मकर संक्रांति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है जो जनवरी के महीने में 14 या 15 तारीख को मनाया जाता है. पूरे भारत में इस त्योहार को किसी न किसी रूप में मनाया जाता है. तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाते हैं,तो कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में इसे केवल ‘संक्रांति’ कहते हैं. पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है जब इस पर्व को मनाया जाता है.

संक्रांति के दिन होता है सूर्य का उत्तरायण

यह पर्व जनवरी माह के तेरहवें, चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ( जब सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है ) पड़ता है. मकर संक्रांति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है. इसलिए इसको उत्तरायणी भी कहते हैं.

सौ गुना बढ़कर मिलता है दान

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि यानि नकारात्मकता का प्रतीक और उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है. धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है.इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल दान मोक्ष की प्राप्त करवाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यंत शुभकारक माना गया है. इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है. सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है. यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छह-छह माह के अंतराल पर होती है.

रातें छोटी व दिन होंगे बड़े

भारत देश उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है. मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात भारत से दूर होता है. इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, लेकिन मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है. अत: इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है.

शनि देव से मिलने जाते हैं भगवान भास्कर

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है.

संक्रांति पर भीष्म पितामह ने त्यागी था देह

महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं. इसलिए संक्रांति मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इस दिन तिल-गुड़ के सेवन का साथ नए जनेऊ धारण करने की भी परंपरा है. यही नहीं मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्ष‍िणायन से उत्तरायण होते हैं. इसलिए मकर संक्रांति के दिन तड़के स्‍नान कर सूर्य उपासना का विशेष महत्‍व है.

क्यों और कहाँ -कहाँ मनाई जाती है मकर संक्रांति ?

मकर संक्रांति का त्योहार हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है, जो सूर्य के उत्तरायण होने पर मनाया जाता है. इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य के उत्तरायण की गति प्रारंभ होती है. भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है. आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है, तमिलनाडु में इसे पोंगल पर्व के रूप में मनाया जाता है. पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व मनाया जाता है, वहीं असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है.

जानिए क्यों मकर संक्रांति पर खाई जाती है खिचड़ी?

– संक्रांति पर चावल, दाल, हल्दी, नमक और सब्जियों की खिचड़ी बनती है.

– चावल चन्द्रमा का प्रतीक है.

– काली उरद की दाल शनि का प्रतीक है.

– हल्दी बृहस्पति और नमक शुक्र का प्रतीक है.

– हरी सब्जियां बुध से संबंध रखती हैं.

– खिचड़ी की गरमी मंगल और सूर्य से जुड़ी है.

– इस प्रकार खिचड़ी खाने से सारे ग्रह मजबूत होते हैं.

– मकर संक्रांति पर नए अन्न की खिचड़ी खाने से पूरे साल आरोग्य मिलता है.

– इस अनोखे भोजन से शरीर नए मौसम के लिए तैयार होता है.

– खिचड़ी ताज़ी ही खानी चाहिए और इसके साथ घी ज़रूर खाना चाहिए.

मकर संक्रांति का त्योहार हर साल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाता है. बीते कुछ वर्षों से मकर संक्रांति की तिथि और पुण्यकाल को लेकर उलझन की स्थिति बनने लगी है. इस साल भी कुछ ज्योतिषी कह रहे हैं कि मकर संक्रांति 14 की नहीं बल्कि 15 जनवरी को मनाई जाएगी. आइए देखें कि यह उलझन की स्थिति क्यों बनी हैं और मकर संक्रांति का पुण्यकाल और तिथि मुहूर्त क्या है.

दरअसल इस उलझन के पीछे खगोलीय गणना है. गणना के अनुसार हर साल सूर्य के धनु से मकर राशि में आने का समय करीब 20 मिनट बढ़ जाता है. इसलिए करीब 72 साल के बाद एक दिन के अंतर पर सूर्य मकर राशि में आता है. ऐसा उल्लेख मिलता है कि मुगल काल में अकबर के शासन काल के दौरान मकर संक्रांति 10 जनवरी को मनाई जाती थी. अब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का समय 14 और 15 के बीच में होने लगा क्योंकि यह संक्रमण काल है.

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