मेघालय सरकार में कई शनिचरा, स्थिर सरकार देना चुनौती 

दिल्ली ब्यूरो : 60 सदस्यीय मेघालय विधानसभा चुनाव के परिणाम चाहे जिस तरह का आया हो लेकिन जिस हिसाब से एनपीपी नेता कॉनराड संगमा के नेतृत्व में सरकार बनी है उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थिर देने की है। सरकार बनाने के लिए जिन घटक दलों को एमडीए में शामिल किया गया है वे सभी शनिचरा से कम नहीं। कब उनकी आँखें पलट जाए कोई नाही जानता। तमाम घटक दलों की अपनी अलग राजनीति है और अलग खेल भी।  कोई किसी को देखना नहीं चाहता।
हाँ एक बात पर सब एक होते दिख रहे हैं कि उनका कांग्रेस से छतीस का सम्बन्ध रहा है। यही एक ऐसी समझ है जिसको लेकर सब एक हुए हैं लेकिन भीतर से सब एक दूसरे के कट्टर दुश्मन। इनमे से एक शनिचरा भी नाराज हुआ तो संगमा की यह सरकार कब आया राम  गया राम में बदल जाय कौन जाने।  60 सदस्यीय विधानसभा में उनकी नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) के 19 विधायक हैं, जो यहां की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से दो कम हैं।  एनपीपी ने जरूरी बहुमत जुटाने के लिए भाजपा और तीन क्षेत्रीय दलों के विधायकों का समर्थन हासिल किया है।
मेघालय में आगे जब-जब सरकार संकट में फंसेगी, कांग्रेस इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगी।  यह ऐसी स्थिति है जहां छोटी-छोटी पार्टियों के पास अब सरकार चलाने-गिराने यानी मोलभाव की जबर्दस्त ताकत होगी।  मुख्यमंत्री मुकुल संगमा की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की एक बड़ी उपलब्धि तो यही कही जा सकती है कि वे आठ साल तक यहां स्थिर सरकार दे पाए।  मेघालय में उनके पहले की सरकारें आयाराम-गयाराम की तर्ज पर बनती-गिरती रही हैं।
बता दें कि एनपीपी की अगुवाई में बने सत्ताधारी गठबंधन – मेघालय डेमोक्रेटिक एलायंस (एमडीए) में पांच पार्टियां शामिल हैं।  इसमें जब-जब मतभेद उभरेंगे, तब-तब कॉनराड संगमा को इस परीक्षा से गुजरना होगा कि वे कितनी कुशलता से इन्हें सुलझाते हैं।  इनके बीच मतभेद उभरने की संभावना इसलिए है क्योंकि इन सभी पार्टियों ने अलग-अलग मुद्दों और विचारधारा के आधार पर चुनाव लड़ा था। मेघालय की राजनीति हमेशा से कांग्रेस के आसपास ही घूमती रही है।  एमडीए में शामिल सभी पार्टियां उसे अपना मुख्य विरोधी समझती हैं और इसी साझा विचार के चलते इनके बीच गठबंधन भी हुआ है।  इसके साथ ही 59 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद सिर्फ दो पर जीत हासिल करने वाली भाजपा ने इन्हें मतभेद भुलाकर गठबंधन के लिए तैयार करने में काफी अहम भूमिका निभाई है।
नई सरकार के लिए अब पहली जरूरत है एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करने की।  वैसे मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि गठबंधन उन मुद्दों की पहचान करेगा जहां मतभेद हैं और कोशिश करेगा कि उन्हें जल्द से जल्द सुलझाया जाए।  हालांकि यह इतना आसान नहीं है।  यह संकट शुरुआत में ही तब उजागर होता हुआ दिखा जब हिल स्टेट पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (एचएसपीडीपी) के अध्यक्ष ने मंत्रिमंडल में भाजपा को शामिल करने पर आपत्ति जताई थी। जहां तक भाजपा की बात है तो वह कई मसलों पर उत्तर-पूर्व की संवेदनशीलता को समझती है।  यही वजह भी थी कि उसने यहां प्रचार अभियान के दौरान अपने हिंदुत्व के एजेंडे को पीछे रखा। चूंकि अब वो सरकार में शामिल है इसलिए देश के दूसरे हिस्सों की उसकी गतिविधियों पर यहां भी चर्चा होगी और बहुत संभावना है कि इससे गठबंधन भी प्रभावित हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार में शामिल दल शनिचरा ना बन पाए। सरकार में कम से कम तीन दल तो शनिचरा  है ही जो कब खेल कर दे किसी को पता नहीं।
नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper