अडानी ग्रुप पर लगे 200 करोड़ के जुर्माने को मोदी सरकार ने क्लीनचिट दे दी

द लखनऊ ट्रिब्यून ब्यूरो : सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का। गाँव -देहात की यह कहावत आज मोदी सरकार और अडानी ग्रुप पर चरितार्थ होती दिख रही है। खबर के मुताबिक़ यूपीए सरकार ने 2013 में अडानी ग्रुप पर पर्यावरण नुकसान करने के आरोप में उसपर 200 करोड़ का हर्जाना लगाया था। लेकिन मोदी सरकार जब सत्ता में आयी तो हर्जाना की रकम तो समाप्त कर ही दी साथ ही साथ उसे क्लीनचिट भी दे दिया।
जिस प्रोजेक्ट के तहत पर्यावरण को नुकसान पहुंचने पर कंपनी के ऊपर फाइन लगाया गया था। मोदी सरकार ने कहा है कि कंपनी ने कोई नुकसान नहीं पहुंचाया इसलिए कोई फाइन नहीं होगा। कंपनी विल्कुल पाक साफ़ है। बता दें कि मुंद्रा प्रोजेक्ट के तहत गुजरात के कच्छ इलाके में अडानी की कोम्पनी ने पर्यावरण को भारी नुक्सान पहुंचाया था। इसके बाद उसकी जांच करवाई गयी थी और उसके बाद सरकार ने 200 करोड़ का फाइन किया था। अब मोदी सरकार ने कंपनी को क्लीनचिट देते हुए कहा है कि कंपनी ने किसी भी तरह से ग्रीन रेगुलेशंस के मानकों को नहीं तोड़ा है इसलिए फाइन की कोई जरूरत नहीं है। अब पर्यावरण मंत्रालय प्रोजेक्ट के विस्तार प्रक्रिया पर काम  शुरू कर रही है।

आपको बता दें कि अडानी ग्रुप पर 2013 में जुर्माना किया गया था। तब यूपीए की सरकार थी। लेकिन जैसे ही 2014 में मोदी की सरकार आयी खेल बदल गया। सितंबर 2015 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में पर्यावरण मंत्रालय ने पिछली सरकार के निर्णय से ठीक उलट निर्णय लिया और कहा कि सरकार इस तरह के कोई दंड नहीं लगा सकती है। कहा- किसी तरह के पर्यावरण के नुकसान हुआ है तो उसकी भरपाई के लिए कंपनी अलग से भरपाई करेगी। जब 2016 में इसपर चौतरफा खबरें बनने लगी तो मिनिस्ट्री ने तर्क दिया कि पिछला फाइन हटाने का मतलब है कि नए और बड़े फाइन की संभावना बन सकती है।

जितना पर्यावरण को नुकसान हुआ होगा उतना इस कंपनी को देना होगा। यानी कि पर्यावरण की नुकसान की भरपाई के लिए 200 करोड़ से ज्यादा का भी दंड लगाया जा सकता है। आरोपों के साढ़े पांच साल बाद अब पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से किसी भी पर्यावरण को किसी भी तरह का नुकसान नहीं हुआ है।

वाटर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत अडानी कि कंपनी द्वारा 4 पोर्ट्स पर निर्माण प्रक्रिया हो रही थी । 2012 में जब पर्यावरण उल्लंघन का आरोप लगा और गुजरात हाईकोर्ट ने इस पर सवाल किया तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक कमेटी का गठन किया कि मामले में पर्यावरण को नुकसान हुआ है या नहीं।

सुनीता नारायण की अगुवाई में कमेटी ने निष्कर्ष दिया कि कंपनी ने कई हरित मानकों को भारी नुकसान पहुंचाया है, इससे पर्यावरण क्षतिग्रस्त हुआ है। साथ ही कमेटी ने एक पोर्ट पर कंपनी के बैन लगाए जाने का सुझाव भी दिया था और कहा कि या तो 200 करोड़ का फाइन लगाएं या पूरे प्रोजेक्ट की कीमत का 1 फीसदी पर्यावरण की भरपाई के लिए दिया जाए । कमिटी ने यह भी सुझाव दिया कि कंपनी की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी  खर्च से ज्यादा का फाइन लगाया जाए।

तत्कालीन यूपीए सरकार ने इन सुझावों को मान लिया और कंपनी को नोटिस देते हुए कहा कि उस पर ये फाइन क्यों ना लगाया जाए। इस पर कंपनी ने अपनी सफाई दिया तो सभी तरह की प्रतिक्रियाओं का पर्यावरण मंत्रालय ने इंतजार किया और जनवरी 2014 में निष्कर्ष दिया कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को नुकसान हुआ है और इस पर फाइन लगाना जरूरी है।

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