सुने संपूर्ण राष्ट्रगान

लखनऊ ट्रिब्यून डेस्क: राष्ट्रगान देश प्रेम से परिपूर्ण एक ऐसी संगीत रचना है, जो उस देश के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और उसकी प्रजा के संघर्ष की व्याख्या करती है। यह संगीत रचना या तो उस देश की सरकार द्वारा स्वीकृत होती है या परंपरागत रूप से प्राप्त होती है। 27 दिसम्बर 1911 को पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कलकत्ता सभा में गाया गया था, उस समय बंगाल के बाहर के लोग इसे नहीं जानते थे। संविधान सभा ने जन गण मन को भारत के राष्ट्रगान के रूप में 24 जनवरी 1950 को अपनाया था। हालांकि इसे साल 1905 में बंगाली में लिखा गया था। जन गण मन को इसके अर्थ की वजह से राष्ट्रगान बनाया गया।

राष्ट्रगान जब लिखा गया था तब भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था। 1911 में जब ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भारत आए तो 26 दिसंबर 1911 को कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में उनके लिए आयोजित स्वागत समारोह के दौरान ही पहली बार टैगोर द्वारा लिखित ‘जन-गण-मन’ को गाया गया। यही से राष्ट्रगान को लेकर विवाद शुरू हो गया। इसे बदलने की मांग करने वाले कहते रहे हैं कि राष्ट्रगान की शुरुआत में ही प्रयोग किए गए शब्दों-जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता’ में ‘अधिनायक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ का प्रयोग ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम की तारीफ करने के लिए प्रयोग किया गया था और इसे आजाद भारत के राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया जाना गलत है और इसलिए इसमें बदलाव किए जाने की जरूरत है।

इस विवाद की जड़ थी अंग्रेजी मीडिया जिसने बिना गीत को समझे ही यह लिख दिया कि टैगोर ने जॉर्ज पंचम की तारीफ में गीत लिखा। इसकी वजह शायद उसी कार्यक्रम में जन-गण-मन के तुरंत बाद रामानुज चौधरी द्वारा जॉर्ज पंचम की तारीफ में समर्पित गीत का गाया जाना भी हो सकती है। अंग्रेजी अखबार द स्टेट्मसैन ने 28 दिसंबर 1911 को लिखा कि बांग्ला कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने सम्राट का स्वागत करने के लिए अपने द्वारा रचित एक गीत गाया। बांग्ला अखबार बंगाली ने इसके उलट इस अंतर को साफ तौर पर स्पष्ट करते हुए 28 दिसंबर 1911 में लिखा था कि कांग्रेस का वार्षिक समारोह महान बांग्ला कवि रवींद्रनाथ टैगौर द्वारा रचित गीत को गाए जाने के साथ शुरू हुआ। इसके बाद राजा जॉर्ज के प्रति वफादारी प्रकट करने वाला प्रस्ताव पास किया गया। इसके बाद राजा के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए लड़को-लड़कियों के एक ग्रुप ने एक गीत गाया।

गौरतलब है कि आजादी के बाद तुरंत ही तिरंगा भारत का राष्ट्रीय ध्वज बन गया था। लेकिन राष्ट्रगान पर फैसला होने में तीन साल लग गए। ज्यादातर लोग यह मान रहे थे कि इसके लिए वंदे मातरम को चुना जाएगा। इसकी वजह भी थी। आधी सदी से भी ज्यादा समय से यह भारत की आजादी के आंदोलन का गीत बना हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मेलनों में मुहम्मद अली जिन्ना और उनके समर्थकों सहित कई मुसलमान भी इसे गाते थे। बाद में कहा गया कि इस गीत के कई छंद इस्लामी आस्थाओं से मेल नहीं खाते। कट्टरपंथी मुसलमानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। इससे आपसी मतभेद हो गए। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दूसरा विकल्प खोजने को मजबूर होना पड़ा।

26 जनवरी 1950 को जब भारत गणतंत्र बना तो संसद में हुए एक समारोह में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी, ‘जन गण मन का पहला छंद भारतीय गणतंत्र का राष्ट्रगान होगा। राष्ट्रगान को पूरा गाने में 52 सेकेंड का समय लगता है। ज्यादातर लोगों ने 52 सेकेंड का ही राष्ट्रगान सुना होगा जबकि पूरा राष्ट्रगान लगभग पांच मिनट का है। अभी तक आप जो राष्ट्रगान सुन रहे हैं वह केवल एक अंश मात्र ही है। आज पूरा राष्ट्रगान सुनिए तबियत खुश हो जायगी-

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