ऐसे थे अपने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस

नई दिल्ली: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उन महान सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों में से एक हैं, जिन्हें आज भी लोग दिल से याद करते हैं. सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था, लेकिन बोस की मृत्यु को लेकर आजतक असमंजस्य बना हुआ है.

भाई से था सबसे ज्यादा लगाव

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था. बोस के पिता कटक शहर के मशहूर वकील थे. बोस के पिता ने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वह बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे. अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें ‘रायबहादुर’ का खिताब दिया था. प्रभावती और जानकीनाथ बोस की 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे. सुभाषचंद्र उनकी 9वीं संतान थे. अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था. सुभाष, शरदचंद्र को मेजदा कहकर बुलाते थे. दोनों भाइयों में बहुत लगाव था. दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ रहते थे.

गांधीजी से पहली मुलाकात

सुभाषचन्द्र बोस कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्यों से प्रेरित थे. वह सुभाष दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे अतः उन्होंने इंग्लैंड से उन्हें पत्र लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की.

रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के मुताबिक भारत वापस आने पर वह सर्वप्रथम मुम्बई गये और महात्मा गाँधी से मुलाकात की. उस समय गाँधी जी मुम्बई के मणिभवन में निवास करते थे. वहाँ, 20 जुलाई, 1921 को महात्मा गाँधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच पहली बार मुलाकात हुई. गाँधीजी ने भी उन्हें कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी. इसके बाद बोस ने दासबाबू से भेट की.

स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश

उन दिनों गाँधीजी, अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ ‘असहयोग आंदोलन’ कर रहे थे. वहीँ दासबाबू इस आंदोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे. उनके साथ सुभाषबाबू इस आंदोलन में सहभागी हो गए. वर्ष 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत ‘स्वराज पार्टी’ की नींव रखी. दासबाबू ने बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया. बोस ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल कर रख दिया. कोलकाता में जो रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें भारतीय नाम दिया. जिन लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राण न्यौछावर किये थे उस लोगों के परिजाओं को महापालिका में नौकरी मिलने लगी.

नेहरू के साथ शुरू की इंडिपेंडन्स लिग

अपने कार्य से बोस बहुत ही जल्द एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए. पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ बोस ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की ‘इंडिपेंडन्स लिग’ शुरू की. वर्ष 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए. कोलकाता में बोस ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था. साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम 8 सदस्यीय आयोग को सौंपा. पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और बोस उसके एक सदस्य थे.

नहीं बचा सके भगत सिंह को

26 जनवरी 1931 को कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर बोस ने एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व किया. इस दौरान पुलिस ने उन पर लाठी चलायी, जिससे वह घायल हो गए. जब बोस जेल में थे, तब गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा किया गया, लेकिन अंग्रेजों ने सरदार भगत सिंह को रिहा करने से इनकार कर दिया. यही नहीं भगत सिंह की फांसी माफ़ कराने के लिए गाँधीजी ने सरकार से बात भी की, लेकिन वह नहीं माने. बोस चाहते थे कि गाँधीजी, अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड दें, लेकिन गांधीजी इसके लिए राजी नहीं हुए. अंग्रेज सरकार भी अडी रही इसके चलते भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई.

अपने सार्वजनिक जीवन में बोस को कुल 11 बार जेल जाना पड़ा. सबसे पहले उन्हें 1921 में छह महीन एके लिए जेल जाना पड़ा. द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद बोस को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था. उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया. 18 अगस्त1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की ओर जा रहे थे कि अचानक रास्ते में उनका जहाज लापता हो गया. उस दिन के बाद आज तक बोस का कोई आता-पता नहीं है. उन्हें आज तक कोई खोज नहीं सका.

बचपन से ही थे सुभाष-

नेता जी के घर के सामने एक बूढ़ी भिखारिन रहती थी. वे देखते थे कि वह हमेशा भीख मांगती थी और दर्द साफ दिखाई देता था. उसकी ऐसी अवस्था देखकर उसका दिल दहल जाता था. भिखारिन से मेरी हालत कितनी अच्‍छी है यह सोचकर वे स्वयं शर्म महसूस करते थे.

उन्हें यह देखकर बहुत कष्ट होता था कि उसे दो समय की रोटी भी नसीब नहीं होती. बरसात, तूफान, कड़ी धूप और ठंड से वह अपनी रक्षा नहीं कर पाती. यदि हमारे समाज में एक भी व्यक्ति ऐसा है कि वह अपनी आवश्यकता को पूरा नहीं सकता तो मुझे सुखी जीवन जीने का क्या अधिकार है और उन्होंने ठान लिया कि केवल सोचने से कुछ नहीं होगा, कोई ठोस कदम उठाना ही होगा.

सुभाष के घर से उसके कॉलेज की दूरी 3 किलोमीटर थी. जो पैसे उन्हें खर्च के लिए मिलते थे उनमें उनका बस का किराया भी शामिल था. उस बुढ़िया की मदद हो सके, इसीलिए वह पैदल कॉलेज जाने लगे और किराए के बचे हुए पैसे वह बुढ़िया को देने लगे.

सुभाष जब विद्यालय जाया करते थे तो मां उन्हें खाने के लिए भोजन दिया करती थी. विद्यालय के पास ही एक बूढ़ी महिला रहती थी. वह इतनी असहाय थी कि अपने लिए भोजन तक नहीं बना सकती थी. प्रतिदिन सुभाष अपने भोजन में से आधा भोजन उस बुढ़िया को दिया करते थे. एक दिन सुभाष ने देखा कि वह बुढ़िया बहुत बीमार है. सुभाष ने 10 दिन तक उस बुढ़िया की मन से सेवा की और वह बुढ़िया ठीक हो गई. ऐसे थे अपने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस

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