आसान नहीं 2019 की राह, अगर साथ आए सपा-बसपा तो मोदी का टूटेगा तिलिस्म

आलोक कुमार 

2019 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल पूरा हो चुका है और इसमें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मुंह की खानी पड़ी पड़ी है। यूपी की गोरखपुर व फूलपुर और बिहार की अररिया, तीनों सीटों पर राजग के उम्मीदवारों की कड़ी हार हुई है। हालांकि हर चुनाव राजनीति का एक नया संदेश देकर जाता है और उत्तर प्रदेश के उपचुनावों का संदेश भी साफ है कि भाजपा के खिलाफ यदि पार्टियां मिल कर लड़ें, तो उसे हराया जा सकता है। दूसरा संदेश है कि यूपी में कांग्रेस अभी भी ताकत नहीं बन पाई है, भले ही राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बन गए हों, लेकिन उसे एक अदद बैसाखी की जरूरत है। ये नतीजे राहुल गांधी के यूपीए नेता के रूप में स्वीकार्यता पर भी सवाल खड़े करते हैं।

भाजपा को तगड़ा झटका : उपचुनावों के नतीजों से 2०19 के बारे में भविष्यवाणी करना तो राजनीतिक अपरिपक्वता की श्रेणी में आएगा, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि गोरखपुर और फूलपुर के नतीजे भाजपा के लिए बड़ा झटका हैं। इस नतीजे से यह साफ है कि विकास और रोजगार अभी तक अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचा है, जिसका दम भाजपा भरती रहती है।

अगला लोकसभा चुनाव होगा कांटे का : जहां तक यूपी की बात है तो गोरखपुर और फूलपुर में जीत हासिल करने के बाद जिस तरह से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मायावती से मिलने पहंुचे और बसपा सुप्रीमो ने भी उनके लिए अपनी काली मर्सिडीज कार भेजी, यह सब नए इशारे कर रहे हैं। इनसे एक बात तो आइने की तरह साफ है कि सपा और बसपा अगले लोकसभा चुनाव में साथ लड़ेगी, बस अब कांग्रेस को देखना है कि वह साथ आती है या नहीं। इन चुनावों के नतीजों से एक बात यह भी साफ है कि अगर कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष की एकजुटता भाजपा के लिए घातक साबित हो सकती है। गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को मिलने वाला वोट प्रतिशत, सपा और बसपा को कुल मिलने वाले वोट प्रतिशत से काफी कम था। अगर सपा-बसपा पिछले विधानसभा चुनावों में साथ होते तो भाजपा की सरकार किसी भी हालत में नहीं बन सकती थी।

मोदी का मैजिक : केवल एक उपचुनाव में हार से यह मान लेना कि भाजपा यूपी के चुनावी खेल से बाहर हो गई, बहुत जल्दबाजी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विपरीत परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने में महारत हासिल है और 2०19 में भाजपा उन्हीं के सहारे चुनावी मैदान में उतरेगी। हालांकि तब पिछली बार की तरह सरकार को कोसने की जगह उन्हें अपने पांच साल के काम का हिसाब देना होगा। कहने का मतलब यह है कि अगला आम चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर जनमत संग्रह जैसा होगा।

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