हे माननीय ! संसद चलती नहीं ,पगार  खुद बढ़ा लेते हो…

अखिलेश अखिल 

जिस तरह संसद की कार्यवाही लगातार घटती जा रही है और उसमे भी लगातार हंगामे और बाइकाट की भेंट चढ़ती जाती है ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत जैसा देश को  सांसदों के वेतन और सुविधाओं को बढ़ाना चाहिए ? देखा जा रहा है कि संसद की कार्यवाही लगातार घटती जा रही है और दूसरी तरफ उनके वेतन भत्ते लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

पिछले 6 साल में सांसदों के वेतन चार गुना बढे हैं और उनके काम कितने बढे हैं यह तो सांसद ही जाने। इधर इस बार के बजट में भी सांसदों के वेतन बढ़ाने की बात कही गयी है। बजट में यह तय किया गया है कि अब सांसदों को वेतन बढ़ाने के लिए हाला नहीं करना पडेगा, हर पांच साल बाद खुद उनकी पगार बढ़ जायेगी। इसके लिए एक कमेटी इसका निर्णय करेगी। अभी तक सांसद और विधायक अपना वेतन खुद ही बढ़ाते रहे हैं। सरकार चाहे जिस भी पार्टी या गुट की हो सब मिलकर वेतन बढ़ाते रहे हैं। देश के किसी मसले पर भले ही सभी सांसद विधायक एक दूसरे का विरोधी करते दीखते हों लेकिन पगार बढ़ाने के नाम पर सब एक होते रहे हैं।

इधर भाजपा सांसद वरुण गांधी ने सवाल उठाया कि क्या कोई आदमी अपने मन से अपनी तनख़्वाह बढ़ा सकता है या ख़ुद ही इसे तय कर सकता है, अगर नहीं तो सांसद और विधायक अपनी तनख़्वाह कैसे तय कर सकते हैं? उन्होंने  1952 की पहली संसद और वर्तमान संसद की तुलना करते हुए कहा, ‘पिछले छह सालों में संसद सदस्यों की पगार चार गुना बढ़ गई है।  1952 से 1972 के बीच संसद साल में 150 दिन चला करती थी जबकि अब यह सिर्फ 50 दिन ही चलती है।’बीते माह ही उन्होंने लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन को पत्र लिखकर अपील की थी कि वे आर्थिक रूप से सम्पन्न सांसदों द्वारा 16वीं लोकसभा के बचे कार्यकाल में अपना वेतन छोड़ने के लिए आंदोलन शुरू करें।

वरुण गांधी ने कहा है कि  ‘भारत में आर्थिक असमानता प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।  भारत में एक प्रतिशत अमीर लोग देश की कुल संपदा के 60 प्रतिशत के मालिक हैं। 1930 में 21 प्रतिशत लोगों के पास इतनी संपदा थी। भारत में 84 अरबपतियों के पास देश की 70 प्रतिशत संपदा है।  यह खाई हमारे लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।  हमें जन प्रतिनिधि के तौर पर देश की सामाजिक, आर्थिक हकीकत के प्रति सक्रिय होना चाहिए। ’उन्होंने अपने पत्र में लिखा था,  ‘स्पीकर महोदया से मेरा निवेदन है कि आर्थिक रूप से सम्पन्न सांसदों द्वारा 16वीं लोकसभा के बचे कार्यकाल में अपना वेतन छोड़ने के लिए आंदोलन शुरू करे।  ऐसी स्वैच्छिक पहल से हम निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की संवेदनशीलता को लेकर देशभर में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। ’

भाजपा सांसद ने कहा था कि 16वीं लोकसभा के बचे हुए कार्यकाल में हमारे वेतन को जस का तस रखने का फैसला भी इस दिशा में एक स्वागतयोग्य क़दम हो सकता है।  ऐसे क़दम से कुछ लोगों को असुविधा होगी लेकिन इससे समग्र रूप से प्रतिष्ठान के प्रति लोगों का भरोसा पैदा होगा। अध्यक्ष को लिखे पत्र में उन्होंने अपनी बात के समर्थन में कुछ आंकड़े भी पेश किए थे।  जिनके अनुसार 16वीं लोकसभा में प्रति व्यक्ति संपत्ति 14.60 करोड़ रुपये है।  राज्यसभा में 96 फीसद सदस्य करोड़पति हैं।

उनकी औसत संपत्ति 20.12 करोड़ रुपये है।  वर्तमान स्थिति में प्रति सांसद मासिक रूप से सरकार 2.7 लाख रुपये खर्च करती है। वरुण ने बढ़े वेतन के विपरीत सांसदों के प्रदर्शन में आई गिरावट को भी अपनी बात के समर्थन में पेश करते हुए कहा था, ‘क्या हम वाकई भारी बढ़ोत्तरी के लायक हैं? सदन की बैठकें कम हो गई हैं।  बीते पंद्रह वर्षों में बिना चर्चा के ही चालीस फीसद विधेयक पारित हुए हैं।  भारत में असमानता का अंतर बढ़ता जा रहा है।’

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