राहुल का ट्वीट, मोदी का नया नाम व राष्ट्रवाद का ‘सायलेंसर’

राहुल गांधी के ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नए नामकरण ’सरेंडर मोदी’ से विचलित भाजपा के हमलावर तर्कों की मार में वह तीखापन नहीं है, जिसके लिए उसका सोशल मीडिया जाना जाता है। चीन से जुड़े अनुत्तरित सवालों के बढ़ते शोर को काबू करने के लिए ’राष्ट्रवाद के सायलेंसर’ का इस्तेमाल शुरू हो गया है। मोदी का नया नाम एक ’पर्सेप्शन’ को आकार दे रहा है कि भारत ने चीनी अतिक्रमण को हकीकत मान लिया है। यह सवाल अनुत्तरित है कि भारत के बीस सैनिकों की शहादत किसकी जमीन पर हुई है? प्रधानमंत्री मोदी के भाषण से उद्भूत इस सवाल का जवाब उन्हें ही देना है।

चीन के साथ भारत की ताजा मुठभेड़ में मौजूद धुंधलके आंतरिक राजनीति में तनाव पैदा कर रहे हैं। भाजपा ने सवालों को देश की एकता और अखंडता के लिए नुकसानदेह निरूपित किया है। राहुल गांधी का आरोप है कि मोदी ने चीन के दावों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सरेंडर का सच गहरा रहा है।

भाजपा के मजबूत प्रचार तंत्र को भरोसा है कि वह चीन के आगे आत्मसमर्पण के आरोपों को निष्प्रभावी कर देगा। मोदी के दामन पर राजनीतिक दाग लगाने वाले नामकरणों का सिलसिला नया नहीं हैं। ’मौत के सौदागर’ अथवा ’चौकीदार चोर है’ जैसे विष बाणों के राजनीतिक प्रहारों को मोदी कामयाबी के साथ झेल चुके हैं। लेकिन पिछले सभी घटनाक्रमों में मोदी ने इन राजनीतिक दागों को सफाई में राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के डिटर्जेंट का उपयोग किया था। इस मर्तबा सवालों की उलझनों को राष्ट्रवाद की मीमांसा से काटना आसान नहीं होगा। भाजपा की ट्रोल सेना ने स्पेलिंग मिस्टेक के नाम पर राहुल गांधी के ट्वीट की खिल्ली उड़ाना शुरु कर दिया है, लेकिन इससे ’सरेंडर’ का पर्सेप्शन कमजोर हो पाएगा, कहना मुश्किल है।

भले ही राजनीति के गलियारों में मोदी के विश्‍वास का ग्राफ ऊंचा नहीं हो, लेकिन देश की जनता मोदी पर आंख मूंदकर विश्‍वास करती है। पहली बार जनता के मन में उनके प्रति सवाल सुलग रहे हैं कि यदि चीन की सेना ने अतिक्रमण या घुसपैठ नहीं की तो ये सैनिक कैसे और क्यों मारे गए?
राष्ट्रवाद के नाम पर सवालों को हाशिए पर ढकेलना मोदी सरकार की रणनीति का हिस्सा रहा है। भाजपा की ट्रोल सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा, आतंकवाद और कश्मीर के आंतरिक हालात से जुड़े सवालों को कुचलने के लिए राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया है। भाजपा ने राष्ट्रवाद की नई राजनीतिक संस्कृति का नया चलन विकसित किया है। इसके अंतर्गत सरकार के कार्यकलापों पर सवाल पूछने वाले मीडियाकर्मी, एक्टिविस्ट या विपक्षी राजनेताओं को देशद्रोही माने जाने लगे हैं। एक ओर मीडिया ट्रायल में इन लोगों को गोदी मीडिया के आरोपों का सामना करना पड़ता है, दूसरी ओर उनके गले में कानूनी फंदा भी डाला जाता है।

चीन के साथ सीमा विवाद पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आहूत सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने भले ही राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में केन्द्र और सेना के साथ एकजुटता का संकल्प व्यक्त किया हो, लेकिन वह सुरक्षा से जुड़े सवालों का वह राजनीतिक स्पेस छोड़ने को तैयार नहीं हैं। यह उसके वजूद के लिए भी जरूरी है। पिछले छह वर्षो में अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक अभियानों मे सेना और सीमा के इस्तेमाल के कई उदाहरण मौजूद हैं। इन घटनाओं के मद्देनजर केन्द्र सरकार के नैतिक तकाजे इतने भोंथरे हो चुके कि वह यह कह सके कि सुरक्षा के मामलों में विपक्ष को खामोशी अख्तियार करना चाहिए।

बीस सैनिकों की शहादत की कहानी में भी भाजपा की चुनावी महत्वाकांक्षाओं कुलबुलाने लगी हैं। बिहार में विधानसभा के आसन्न चुनाव में चीन की सीमा पर बिहारी सैनिकों की शहादत को भुनाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। 15 जून को गलवान घाटी में चीन की कायराना हरकत का जवाब देने में बिहार रेजीमेंट के बीस सैनिक शहीद हुए थे। अब इंडियन आर्मी की नार्थर्न कमांड ने बिहार रेजीमेंट की शौर्य गाथा का गुणगान करते हुए वीडियो जारी किया है। जिसमें 21 साल पहले के कारगिल युद्ध में बिहार रेजीमेंट के योद्धा ओं की वीर गाथा का ब्यौरा है कि- ’रेजीमेंट के शेर लड़ने के लिए जन्मे हैं, वो बैट नहीं बैटमैन हैं। हर सोमवार के बाद मंगलवार आता है, बजरंग बली की जय’।

अभी जबकि चीन सीमा पर विवाद चरम पर है, ऐसे राजनेता वीडियो जारी करने के टाइमिंग और उसके राजनीतिक-निहितार्थ टटोलने लगे हैं। भाजपा सैनिकों की शहादत का इस्तेमाल पहले भी करती रही है। उत्तर प्रदेश की तरह बिहार की चुनावी-सभाओं के बैकड्रॉप में भी गलवान घाटी के शहीदों के फोटो लगाने की भूमिका शुरू हो चुकी है। उप्र में पुलवामा के शहीदों को फोटो लगाए गए थे। ऐसे में भाजपा विपक्ष को सवाल करने से कैसे रोक सकती है?

उमेश त्रिवेदी/सुबह सबेरे से साभार

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