वर्ष 2012 में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ना चाहती थी शीला दीक्षित, लेकिन क्यों?

नईं दिल्ली। शीला दीक्षित स्वास्थ्य कारणों एवं कांग्रेस के लिए अगले विधानसभा चुनाव से पहले उनकी जगह कोईं अन्य नेता ढूंढ लेने का मार्ग प्रशस्त करने लिए 2012 में ही मुख्यमंत्री के पद से हटना चाहती थीं लेकिन 16 दिसंबर की सामूहिक बलात्कार की घटना के चलते उन्होंने इरादा बदल लिया और अपने पद पर बने रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने संस्मरण में कहा है कि ऐसे में इस्तीफा देना समरभूमि से पलायन समझा जाता। उन्होंने अपनी पुस्तक देल्ही: माईं टाईंम्स, माईं लाईंफ में लिखा है, निर्भया घटना के बाद मैं एक स्थिति में घिर गयी थी। मेरे परिवार, जिसने उस दौरान मेरा दबाव देखा था, ने मुझसे पूर्व की योजना के हिसाब से पद से हट जाने की अपील की लेकिन मैंने महसूस किया कि इस प्रकार के कदम को समरभूमि से पलायन समझा जाएगा। हाल में प्रकाशित इस संस्मरण में पाठक दिल्ली में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहीं शीलादीक्षित के सफर की झलक पा सकते हैं।

शीला दीक्षित ने बतौर मुख्यमंत्री अपने तीन कार्यंकाल, दिल्ली में उनके द्वारा लाये गये बदलावों, उनके सामने आयी मुश्किलें और 2013 की चुनावी हार समेत कईं विषयों पर लिखा है। उन्होंने पुस्तक में कहा है, हमारी पार्टी स्पष्ट तौर पर हार गयी। मैं खुद आप के अरविंद केजरीवाल के हाथों प्रतिष्ठित नईं दिल्ली सीट पर 25000 से अधिक वोटों के अंतर से हार गयी। हम में से कईं ने आप को कमतर आंका था। उनके अनुसार ऐसे कईं लोग थे जिन्होंने इस हार को केंद्र सरकार के विरद्ध जनाोश का परिणाम माना क्योंकि दिल्ली सरकार की पहचान संप्रग द्वितीय के साथ होती थी क्योंकि वह कांग्रेस नीत सरकार थी।

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