तेलंगाना-आंध्रा की तेज होती राजनीति में मौक़ा तलाशती BJP

अखिलेश अखिल 

जैसे-जैसे 2019 की तारीख नजदीक आती जा रही है आंध्रा और तेलंगाना की राजनीति तेज होती नजर आ रही है। आंध्रा में टीडीपी की सरकार है जिसके मुखिया चंद्रबाबू नायडू है तो तेलंगाना की सरकार के चंद्रशेखर राव  की पार्टी टीआरएस चला रही है। याद रहे आँध्र प्रदेश के बटवारे के बाद ही तेलंगाना सामने आया है। इन दोनों राज्यों की अपनी अपनी मांगे है और यह भी सच है कि दोनों प्रदेश के मुखिया बीजेपी सरकार के समर्थक भी है। लेकिन 2019 के चुनाव सबको डरा रहे हैं। बीजेपी असमंजस की हालत में है।

टीडीपी, टीआरएस, भाजपा, कांग्रेस जैसे बड़े खिलाड़ियों के बीच दो रुस्तम भी हैं।  जगन मोहन रेड्‌डी और अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण।  राज्य के केंद्र में थोड़े-बहुत समर्थन की ज़रूरत पड़ने पर ये दोनों अहम भूमिका निभा सकते हैं।  इनमें से जहां तक जगन का ताल्लुक़ है तो उन्होंने बीते नवंबर में पूरे आंध्र की 3,000 किलोमीटर की पदयात्रा शुरू की है।  यह अब तक जारी है।  इसमें उन्हें खासा जनसमर्थन भी मिल रहा है।  राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव जैसे कई अहम मसलों पर बिना मांगे ही भाजपा को समर्थन दे चुके हैं।  और आगे भी समर्थन के लिए तैयार हैं।  हालांकि राजनीतिक मज़बूरियों के चलते वे केंद्र की भाजपा सरकार के ख़िलाफ ही 21 मार्च को अविश्वास प्रस्ताव पेश करने की घोषणा भी कर चुके हैं।  मांग राज्य के लिए विशेष दर्ज़े की ही है जो टीडीपी भी चाहती है।

ऐसे ही पवन कल्याण भी अपनी जन सेना पार्टी बनाकर फिलहाल तेलंगाना की यात्रा परनिकले हें।  आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू कई मर्तबा पवन की तारीफ़ कर चुके हैं।  पवन ख़ुद तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर की तारीफ़ करते हैं।  दूसरी तरफ़ भाजपा उनकी पार्टी को अपने साथ मिलाने की पेशकश कर चुकी है।  ऐसा ख़ुद पवन का दावा है।  बस एक जगन रह जाते हैं जिनसे पवन की सीधी अदावत नज़र आती है।  जानकारों के मुताबिक इन चारों स्थितियों के सियासी मतलब है जो आने वाले वक़्त में दिखाई दे सकते हैं।

आंध्र और तेलंगाना की स्थितियां उतनी सहज नहीं हैं जैसी दूसरे राज्यों की।  दोनों राज्य तेलुगु भाषी हैं।  पर तेलंगाना गठन के समर्थन और विरोध में जिस तरह का आंदोलन चला था उसके बाद दोनों के बीच दोस्ताना कम ही बचा है।  दोनों राज्य अब नए सिरे से अपनी इबारत लिख रहे हैं। इसलिए केंद्र सरकार से माली मदद अगर एक को मिलती है तो दूसरे को भी चाहिए। विशेष दर्ज़े के मामले में यह बात लागू होती है।  यानी केंद्र में बैठी किसी भी पार्टी (फिलहाल भाजपा) के लिए एक साथ दोनों राज्यों को खुश कर पाना आसान नहीं है।

इसीलिए भाजपा के लिए यहां धर्मसंकट की स्थिति भी है।  क्योंकि उसे दोनों राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाना है।  यही कारण है कि वह सहयोगी टीडीपी के दबाव के बावज़ूद अब तक आंध्र को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है।  और यही वह वजह भी है कि उसे दोनों राज्यों में वैकल्पिक सियासी गठबंधन के लिए भी तैयार रहना पड़ रहा है।  हालांकि उसके सामने ज़्यादा विकल्प हैं नहीं।  इसीलिए तमाम अटकलबाज़ियां भी चल रही हैं।  इनमें एक अटकल यह है कि तेलंगाना में कांग्रेस को बाहर रखने के लिए टीआरएस, भाजपा और एमआईएम से हाथ मिला सकती है।  हालांकि भाजपा और एमआईएम के बीच जिस तरह कट्‌टर वैचारिक भेद हैं और जिस तरह दोनों दल धार्मिक ध्रुवीकरण की सियासत करते हैं उसके चलते यह गठबंधन मुश्किल लगता है।

दूसरा विकल्प भाजपा और टीआरएस के साथ आने का है।  लेकिन इसमें भी पेंच है।  पहला तो यही कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और टीआरएस प्रमुख केसीआर के बीच ज़्यादा बनती नहीं है।  इसके चलते बीते साल मई में एक बार तो यह नौबत आ गई थी कि टीआरएस शायद राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को समर्थन ही नहीं देगी।  लेकिन जैसा कि पहले ही बताया गया प्रधानमंत्री मोदी ने केसीआर के साथ अच्छे संबंध बना रखे हैं।  इसलिए मामला उस वक़्त ज़्यादा बिगड़ा नहीं।  दूसरी बात तेलंगाना में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है।  इसीलिए केसीआर मुस्लिमों के लिए 12 फ़ीसदी आरक्षण का बंदोबस्त करने की तैयारी में भी हैं।  इस हिसाब से भी टीआरएस-भाजपा की दोस्ती की संभावना बनती नहीं।  फिर भी मान लें कि दोनों साथ आ जाते हैं तब भी भाजपा को टीआरएस से तेलंगाना में ही मदद मिलेगी आंध्र में नहीं।  क्योंकि आंध्र से अलग होने के लिए टीआरएस ने जो उग्र आंदोलन चलाया उसे देखते हुए निकट भविष्य में तो यह नहीं ही मानना चाहिए कि उसके लिए आंध्रवासियों के मन में कोई सुहानुभूति होगी।  यानी वहां भाजपा को दूसरा साथी ढूंढना होगा।

भाजपा के लिए तीसरे विकल्प के तौर पर जगनमोहन की वाईएसआर कांग्रेस बचती है।  जगन खुद भी भाजपा के साथ आने को तैयार हैं।  लेकिन तभी जब आंध्र को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की उनकी शर्त मान ली जाए।  भाजपा की आंध्र इकाई के कुछ नेता भी मानते हैं कि जगन का साथ भाजपा के लिए ज़्यादा मुफ़ीद होगा।  लेकिन जगन पर भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति जमा करने के तमाम आरोप हैं।  ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी उनके साथ जाना शायद ही पसंद करें।  और फिर तेलंगाना में भी जगन से भाजपा को बहुत लाभ मिलने की संभावना नहीं है। यही हाल पवन कल्याण का है।  वे फिल्मी पर्दे पर जितने लोकप्रिय हैं उतने राजनीति में नए हैं।  उनकी लोकप्रियता भीड़ तो खींच सकती है पर वह भीड़ वोट में तब्दील होगी इसकी संभावना कम ही है।  इसीलिए जैसा कि पवन ने भी दावा किया है कि भाजपा उनकी पार्टी का अपने साथ विलय कराने की जुगत में थी। पर दांव चला नहीं लिहाज़ा गठबंधन की संभावनाएं भी कम ही नजर आती हैं। पवन ख़ुद टीडीपी-टीआरएस की तरफ़ ज़्यादा झुके दिखते हैं।

अब बच गई टीडीपी, जिसके साथ भाजपा का गठबंधन है ही।  इससे पहले भी वह अटलबिहारी वाजपेयी के समय एनडीए (भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) में रह चुकी है।  आंध्र के साथ पार्टी और उसके प्रमुख चंद्रबाबू नायडू का जनाधार तेलंगाना में भी भरपूर है।  दोनों राज्यों में नायडू की छवि भी अच्छी है।  क्योंकि उन्होंने तेलंगाना के गठन का विरोध या समर्थन के बजाय विकास जैसे मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान दिया।  यानी अंत में ले-दे कर सियासी नफ़ा-नुक़सान को ध्यान में रखें तो दोनों राज्यों में टीडीपी ही भाजपा के लिए सबसे ज़्यादा अनुकूल और स्वाभाविक सहयोगी है।  इस बात का अंदाज़ा टीडीपी को भी है शायद।  इसीलिए वह इन दिनों भाजपा अपनी मांगों को मनवाने के लिए भरपूर दबाव बनाए हुए है।  और कुछ हद भाजपा भी उसकी मांगों को मानती दिख रही है।  ताकि दोनों का साथ आगे भी चलता रहे।  जो कि चलते रहने की संभावना भी है।

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