ठहाका लगाइए! हाजिर है दुनिया में भारत की रैंकिग

दिल्ली ब्यूरो. पिछले दो सप्ताह की खबरों पर नजर डालें, तो साफ हो जाता है कि देश की सरकार वही करना चाहती है, जिससे उसे चुनावी लाभ हो। सामने पांच राज्यों में चुनाव हैं और फिर लोकसभा चुनाव। चूंकि सरकार को अब हर मसले पर विपक्ष घेर रहा है और उनके किये वादों पर सवाल पूछ रहा है। इसलिए सरकार और भाजपा के लोग गोदी मीडिया के साथ साठगांठ कर जनता से जुड़े मसलों से इतर दूसरे मसलों पर जनता को भ्रमित कर रहे हैं।

याद कीजिए, 31 अक्टूबर के दिन को। जब सरदार की ऊंची मूर्ति को लेकर कई दिनों तक बहस चली और मोदी सरकार के गुणगान गाये गये। कांग्रेस-नेहरू के खिलाफ कई तरह की बातें सामने आयीं। एक कीचड़ की बदबू को ढांपने के लिए उससे ज्यादा बदबूदार दूसरा कीचड़ उछाला जा रहा है। इन सब के बीच कहीं कोई अगले दिन की पटकथा तैयार कर रहा होता है। चूंकि कैमरे के सामने ही पटाक्षेप होना है, तो स्क्रिप्ट बहुत जरूरी है। स्क्रिप्ट की ही पब्लिक में डिमांड है। और हां, स्क्रिप्ट से भी ज्यादा जरूरी है मार्केंटिंग, जिसके लिए मंच तैयार है।

खेल देखिये। भारत के पहले गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की 143वीं जयंती का अवसर। नर्मदा के तीरे रंगारंग कार्यक्रम। चारों ओर उत्साह का माहौल। विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बनाने का उत्साह। यकीनन उत्साह की बात है। लाइव कवरेज चल रहा है। टीवी एंकर और रिपोर्टर विरदावलियां गा रहे हैं। इसी बीच कार्यक्रम के होस्ट और चीफ गेस्ट सर्वेसवाã माननीय प्रधानमंत्री जी अवतरित होते हैं। पर्दा उठता है। तालियां बजती हैं। फिर समां ढल जाती है। सवाल यह है कि क्या प्राप्त हुआ? क्या बदला? क्या एक भारी प्रतिमा लगाकर सरदार पटेल के सपनों का भारत बनाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं? स्टेच्यू की लम्बाई में हम नंबर एक बन गए। अच्छी बात है।

उधर, हिंदुत्व और अयोध्या को लेकर राजनीति गर्म है। मामला अदालत में है, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर को लेकर बयान जारी है। ललकार जारी है और फुफकार भी। फैजाबाद का नाम बदला। अयोध्या नाम पड़ गया। इससे पहले इलाहाबाद का नाम बदला। प्रयागराज नाम हो गया। पता चला कि देश के दर्जनों शहरों के नाम बदले जाने हैं। लेकिन बदल भी जाए तो लाभ क्या है? क्या उन शहरों में रहने वाले लोगों की दशा बदल जायेगी? कदापि नहीं। लेकिन जनता को यही पसंद है। चूंकि सरकार जनता को मूल मुद्दे से भटकाना चाह रही है, इसलिए नाम बदलने का खेल जारी है। मोदी सरकार और गोदी मीडिया कह रही है कि सरदार की मूर्ति सबसे ऊंची है। ऊंची मूर्ति के मामले में भारत पहले पायदान पर आ गया है, लेकिन जिन रैंकिग के बारे में हमें नहीं बताया गया, आइए उन पर भी एक नजर डालते हैं…

जीवन प्रत्याशा के मामले में भारत की 224 देशों की सूची में 164वीं रैंक है। टीबी के मामलों में हम 2०16 में विश्व में नंबर एक थे। डायरिया की वजह से देश में 5 साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों की संख्या में हम नाइजीरिया के साथ मिलकर दुनिया का 4० फीसदी हिस्सा अकेले रखते हैं। दुनिया के 6० फीसदी कुष्ठ रोग के मामले भारत से आते हैं। विश्व भूख सूचकांक की 119 देशों की सूची में हम 1०3वें स्थान पर हैं। कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या की रैंकिग में हम दुनिया में पहले स्थान पर हैं। शारीरिक डील-डौल और स्वास्थ्य रैंकिग में भारत को 1०1 देशों की सूची में 9०वां स्थान मिला हुआ है। पर्यावरण प्रदूषण में साहब हमारी बैंड बज रखी है। दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट में अकेले भारत के 14 शहर शामिल हैं। यहां प्रदूषण के कारण साल 2०18 में 2 मिलियन प्रीमेच्योर मौतें हुईं, जो दुनिया की एक-चौथाई है। साथ ही 5 साल से कम उम्र के बच्चों की प्रीमेच्योर मौतों के मामले में हम दुनिया में नंबर एक हैं।

पर्यावरण की शुध्दता की 18० देशों की रैंकिग में हम 177वें स्थान पर हैं। भूमिगत जल निकालने के मामले में हम सबसे आगे हैं। एक अनुमान के मुताबिक साल 2०5० तक हमारे पास सिर्फ 114० क्यूबिक मीटर/व्यक्ति जल रह जाएगा, जो न्यूनतम निर्धारित मात्रा से मात्र 14० अंक ऊपर है। साल 195० में यह आंकड़ा 5००० क्यूबिक मीटर/ व्यक्ति से भी अधिक था।

अब आइए शिक्षा के मसले पर हम अपनी रैंकिग देखते हैं। इस सम्बंध में हम 158 देशों की लिस्ट में 115वें स्थान पर हैं। प्रति व्यक्ति आय के मामले में हम पिछले 1 साल में 12 पायदान नीचे घटकर 1०3वें स्थान पर पहुंच गए हैं। यहां हमारी हालत नेपाल और श्रीलंका से भी पतली है। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में आईटीसी विकास सूचकांक में हम 176 देशों की सूची में 134वें स्थान पर हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिहाज से हम 14 सबसे खतरनाक देशों की लिस्ट में अंतिम पायदान पर हैं। यहां हम सोमालिया, सीरिया, ईराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के साथ रैंकिग साझा करते हैं। इस पर भी आप गर्व कर सकते हैं। लोकतंत्र की रक्षा और कायदे-कानूनों के पालन के मामले में हम 113 देशों की लिस्ट में 62वें स्थान पर हैं।

दरअसल सबसे बड़े लोकतंत्र की स्थिति इन चंद आंकड़ों से भी बदतर है। भारत माता का दामन अपनी मुफलिसी से तार-तार है। इन हालातों के होते हुए भी अगर हम विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति बनाने पर ताली पीट रहे हैं, तो पीटते रहिए। मूर्तियां बनती रहेंगी। इससे भी ऊंची, इससे भी विशाल। दुनिया हंसती रहेगी हम पर और हम यही नहीं जान पायेंगे कि आखिर हम विश्व गुरु बनने से कहां चूक गये।

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