पार्टी बदलने के फिराक में बैठे हैं दर्जनों मौसम विज्ञानी नेता 

अखिलेश अखिल 
राजनीतिक मौसम विज्ञानी कौन हैं ? सीधे अर्थ में उसे राजनीतिक मौसम विज्ञानी कहा जाता है जो समय को भांप कर पार्टी बदल लेते हैं और सरकार में शामिल हो जाते हैं। भारतीय राजनीति में दलबदलू मौसम विज्ञानियों का लंबा इतिहास रहा है। इन्हे आया राम गया राम से भी राजनीति में जाना जाता है। लेकिन लाली प्रसाद ऐसे पहले नेता रहे हैं जिन्होंने दलबदलू नेताओं को सबसे पहले मौसम विज्ञानी से नवाजा था।
राजद प्रमुख लालू यादव सबसे पहले इन शब्दों का प्रयोग रामविलास पासवान के सन्दर्भ में किया था। पासवान की पहचान पिछले कुछ समय में ऐसे नेता की बनी है कि केंद्र में जिसकी भी सरकार हो, वे मंत्री जरूर बनते हैं क्योंकि वे राजनीतिक बदलावों को भांपते हुए उस पार्टी के साथ हो जाते हैं। हो सकता है कि पासवान को इंगित करके लालू प्रसाद ने पहली दफा मौसम विज्ञानी शब्द को राजनीति में जगह दिया हो लेकिन  देश में मौसम विज्ञानी की कमी नहीं। हर राज्य में मौसम विज्ञानियों की बड़ी तादात है जो समय के साथ अपना चोला भी बदलते हैं और समर्पण भाव भी।
अभी बीते दिनों की ही बात है कि अरविंदर सिंह लवली भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर वापस अपनी मूल पार्टी कांग्रेस में शामिल हो गए। लवली भी मौसम विज्ञानी ही रहे हैं।  लवली दिल्ली में कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं और वे दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं।  उनकी गिनती दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के विश्वस्त नेताओं में होती रही है।  लेकिन पहले 2013 और बाद में 2015 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की खराब हालत के बाद वे 2017 में दिल्ली नगर निगम चुनावों के पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। तब उन्हें लगा था कि बीजेपी में जाकर उनकी दाल गलेगी और दिल्ली के बड़े नेता के रूप में उनकी पहचान बीजेपी में हो जायेगी। लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हुआ। यह बात और है कि उनके इस मौसम विज्ञानी सोच की वजह से तब कांग्रेस को कुछ हानि तो हो गयी।
दिल्ली में अरविंदर सिंह लवली कांग्रेस के सिख चेहरे रहे हैं।  इस समाज के लोगों की दिल्ली में अच्छी-खासी संख्या है।  लवली के वापस कांग्रेस में आने के मौके पर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने खुद कहा कि लवली के कांग्रेस से निकलने की वजह से निगम चुनावों में पार्टी को नुकसान हुआ था। खैर अब लवली पुनः कांग्रेस में आगये हैं।
हालिया दौर में केवल लवली ही मौसम विज्ञानी नहीं रहे। उधर महाराष्ट्र के सांसद नाना पटोले भी नए मौसम विज्ञानी के रूप में ख्यात हुए हैं। वे भी पहले कांग्रेस में थे, बाद में वे भाजपा में आ गए और सांसद बने।  कुछ दिनों पहले उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ दिया और अपनी लोकसभा सीट से भी इस्तीफा दे दिया।  इसके बाद वे कांग्रेस में वापस चले गए।
कांग्रेस की बदलती हालत को देखकर माना जा रहा है कि घर वापसी का मामला पहले से कुछ ज्यादा ही तेज होने वाला है। कांग्रेस छोड़ कर दूसरे दलों में गए नेता फिर से वापस लौटने की चाह में बैठे हुए हैं। यह खेल दूसरे दलों के साथ भी संभव है। हर नेता अपने पुराने दल में लौटने को बेकरार हैं। आप को बता दें कि ये वही नेता हैं जो 2014 के लोकसभा चुनावों के ठीक पहले या उसके बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के विस्तार और उसकी मजबूत स्थिति को देखते हुए भाजपा में आए थे।  सिर्फ दिल्ली में ही तकरीबन दस छोटे-बड़े कांग्रेस नेता भाजपा में शामिल हुए थे।
भाजपा के लोकसभा सांसदों में अच्छी-खासी संख्या उन सांसदों की है जो दूसरी पार्टियों से भाजपा में आए हैं। भाजपा से वापस अपनी मूल पार्टियों की ओर नेताओं की वापसी के लिए राजनीतिक जानकार पिछले कुछ समय में भाजपा के प्रति लोगों के बढ़ते गुस्से को भी जिम्मेदार मानते हैं।  इन लोगों को यह लगता है कि कांग्रेस और दूसरे दलों की जो हालत 2014 के लोकसभा चुनावों के ठीक पहले थी या उसके बाद के कुछ समय बाद थी, उसके मुकाबले उनकी स्थिति ठीक हुई है।  ऐसे में उस दौर में भाजपा में शमिल हुए कुछ नेता वापस अपनी मूल पार्टियों में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं। कांग्रेस से भाजपा में आईं पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्ण तीरथ के बारे में कहा जा रहा है कि वे फिर से कांग्रेस में शामिल होने के लिए प्रयासरत हैं।
बीजेपी से क्या दलबदलू नेताओं का मोह भांग हो रहा है ? जानकार मानते हैं की ऐसी बात नहीं है। पिछले लोक सभा चुनाव के समय बहुत सारे मौसम विज्ञानी कांग्रेस और दूसरे दलों से बीजेपी में गए और चुनाव भी जीते। संसद बने और मंत्री भी। लेकिन असली बात तो यही है कि बीजेपी अभी तक उन्हें अपना नहीं पायी है। ऐसे नेताओं को बीजेपी और संघ शक की निगाहों से देखते हैं। भाजपा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और इनके दूसरे सहयोगी संगठनों का काफी दखल है। जो नेता इस पृष्ठभूमि से नहीं है उन्हें बीजेपी और संघ तवज्जों नहीं देते। भार समझते हैं ,बाहरी मानते हैं। बीजेपी स्वीकार भी कर ले लेकिन संघ में ऐसे नेताओं की स्वीकार्यता नहीं है।  यही वजह है कि बीजेपी में रहकर भी बहुत सारे मौसम विज्ञानी नेताओं को घुटन हो रही है। अब वे वक्त के इन्तजार में हैं ताकि अपने चरित्र के मुताविक अपने दल में लौट जाए जहां वे खुली हवा ले सकें।
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