आखिर क्यों 25 बरस बाद साथ आए सपा-बसपा, जानिए इस राजनीति का गुणा-भाग

आलोक कुमार 

25 बरस से एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने वाले दो सियासी दल एक साथ आ चुके हैं। हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की। इन दोनों दलों के बीच 25 साल से दूरी है। अब अचानक बढ़ने वाली नजदीकी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

हालांकि दोनों दलों के साथ आने के पीछे एक वजह यह है कि किसी भी तरह वर्ष 2०19 के लोकसभा चुनाव से पहले राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में अपना-अपना वजूद बचाए रखा जाए। शायद इसीलिए बसपा प्रमुख मायावती ने गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में सपा उम्मीदवारों को समर्थन देने के साथ राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में एक-दूसरे के उम्मीदवारों की मदद की घोषणा की है। वैसे बसपा अभी तक उपचुनाव नहीं लड़ती थी, लेकिन न लड़ने और घोषित समर्थन में बहुत फर्क है।

गौरतलब है कि स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद से समाजवादी पार्टी को दुश्मन नंबर एक बताने वाली मायावती का बदले सियासी हालात में सपा के प्रति नरम रुख होना चौंकाने वाला नहीं है। दरअसल फूलपुर और गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में समाजवादी उम्मीदवारों को समर्थन देने के एवज में बसपा राज्यसभा में अपने एक उम्मीदवार को समायोजित करा लेना चाहती है।

काफी महत्वपूर्ण है साथ आना
मायावती के सपा से गठबंधन नहीं करने की घोषणा के बावजूद इस बदले परिदृश्य को राजनीतिक पंडित बहुत महत्व दे रहे हैं। दरअसल, पिछली बार जब सपा और बसपा ने साथ चुनाव लड़ा था तो बाबरी विध्वंस के बाद ताकतवर दिख रही भाजपा बुरी तरह हारी थी।

राज्यसभा में अपने भाई को पहुंचाना चाहती हैं मायावती

उत्तर प्रदेश में भाजपा के बढ़ते वर्चस्व पर नियंत्रण लगाने के लिए सपा-बसपा में नजदीकी बढ़ने की बात कही जा रही है, लेकिन सच्चाई कुछ और भी है। दरअसल, यूपी में राज्यसभा की दस सीटों के लिए चुनाव होना है और उच्च सदन में भागीदारी बढ़ाने के लिए सपा-बसपा एक साथ आने के लिए मजबूर हुए हैं। इसके अलावा इस तालमेल से यह भी दिख रहा है कि बसपा अपना एक सदस्य सपा के सहारे राज्यसभा में भेजने की तैयारी में है, वहीं विधान परिषद के चुनाव में बसपा सपा का साथ देगी। इससे मायावती अपने भाई आनंद कुमार को किसी भी तरह राज्यसभा तक पहुंचा देंगी।

वैसे भी मायावती ने अब अपने भाई आनंद कुमार को बसपा में नंबर दो पर लाने की कवायद शुरू कर दी है। फिलहाल बसपा में आनंद कुमार का दखल काफी बढ़ गया है और कहा तो यहां तक जा रहा है कि मायावती अब हर कदम उन्हीं की सलाह पर उठा रही हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कई जांचों में भी फंसे हैं। राज्यसभा जाने से उन्हें इसमें भी राहत मिलने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, राज्यसभा जाने के लिए समाजवादी पार्टी में भी भी कई बड़े नेता दावेदारी ठोंक रहे हैं। बसपा से गठबंधन होने से सपा नेतृत्व को भी विवादों से राहत मिल जाएगी।

वैसे भी राज्यसभा व विधान परिषद में अपने प्रत्याशी भेजने के लिए न तो सपा और न ही बसपा के पास विधायकों की पर्याप्त संख्या है। मई में विधान परिषद के 13 सीटें खाली होंगी, जिनके लिए अप्रैल में चुनाव होगा। बसपा का साथ मिलने से सपा अपने दो सदस्यों को भेज सकती है। सपा के 47 विधायक और बसपा के 19 विधायक मिलकर विधान परिषद में दो सीटें जिताने के लिए पर्याप्त होंगे। अब ऐसे में दोनों दलों का एक-दूसरे के करीब आना लाजिमी ही था, वरना दोनों के हाथ आने वाले राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में खाली ही रह जाते।

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