आखिर क्यों हारी भाजपा, जानिए उन वजहों को

आलोक कुमार

गोरखपुर और फूलपुर में करारी हार के बाद न केवल शीर्ष भाजपा नेताओं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे से हंसी गायब है। ज्यादातर नेता या तो मीडिया का सामना करने से बच रहे हैं या फिर हार की समीक्षा करने की बात कह रहे हैं। लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि टिकट वितरण में भाजपा नेतृत्व स्थानीय मतदाताओं की नब्ज नहीं पहचान पाया और प्रतिष्ठा का सवाल बनी दोनों ही सीटों पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा। दरअसल, भाजपा ने गोरखपुर में गोरक्षनाथ पीठ से बाहर के व्यक्ति को, तो फूलपुर में स्थानीय दावेदारी को दरकिनार कर बाहरी को टिकट दिया। इसका खमियाजा पार्टी को लोकसभा की दोनों सीटें गंवाकर भुगतना पड़ा।

योगी-मौर्य को दरकिनार किया गया : करीब तीन दशक तक गोरक्षनाथ पीठ का कब्जा गोरखपुर सीट पर रहा। लेकिन इस बार पार्टी ने गोरखपुर प्रांत के अध्यक्ष उपेन्द्र दत्त शुक्ला को मैदान में उतारा। हालांकि योगी अपने किसी खास के लिए गोरखपुर से टिकट चाह रहे थे, लेकिन पार्टी ने उनकी एक नहीं सुनी। वहीं फूलपुर सीट पर भी पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य की अनदेखी करते हुए मिर्जापुर से निवासी कौशलेन्द्र सिंह पटेल को टिकट दिया। मौर्य फूलपुर से अपनी पत्नी के लिए टिकट चाह रहे थे। पटेल के बाहरी होने के कारण स्थानीय कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय नहीं था। गोरखपुर में लोगों की आस्था गोरक्षनाथ पीठ पर है और मतदाताओं ने हमेशा से ही पीठ के प्रत्याशी को ही वोट दिया। जबकि इस बार स्थिति उलट थी, जिस कारण मतदाताओं में वह जोश नहीं रहा और भाजपा के परंपरागत मतदाता ने वोट नहीं डाला। इस कारण इन दोनों सीटों पर पिछले चुनाव की तुलना में वोटिंग भी कम हुई।

पार्टी की कलह भी बनी हार का कारण : यूपी में योगी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद से ही कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री और दोनों उप-मुख्यमंत्रियों के बीच अनबन रहती है। कई बार कैबिनेट की बैठक और पार्टी की मीटिंग में भी मतभेद सामने आ चुके हैं। इन मतभेदों के चलते भी पार्टी कार्यकताओं में एकजुटता की कमी रही।

कार्यकर्ता हैं नाराज़ : इसके अलावा भाजपा सरकार सत्ता में आने के बाद से जिस तरह उसकी अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की नहीं सुनी जा रही है, वह भी हार का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि संगठन में शीर्ष स्तर पर तैनात पदाधिकारियों की भी मंत्रियों द्वारा अनदेखी की जा रही है। यही वजह है कि खुली जुबान में कार्यकर्ता इस बात की दुहाई देते नजर आ रहे हैं कि इससे तो ज्यादा काम बसपा या सपा सरकार के कार्यकाल में हो जाते थे। कुछ कार्यकर्ता तो यहां तक कह रहे हैं कि यूपी सरकार रिमोट से चल रही है।

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