ये युवा 2०19 में पलटेंगे सत्ता?

अखिलेश अखिल

भारतीय राजनीति समय-समय पर आंदोलनों की कोख से नये युवा नेताओं को जन्म देती रही है और वे राजनीति के नये आयाम लिखते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हुए आंदोलनों से कुछ तेज तर्रार युवा नेता निकल भी चुके हैं। इनमें शामिल हैं अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार और चंद्शेखर रावण। इनमें शुरू के तीन युवा नेता गुजरात से हैं, तो उनके बाद के एक नेता जेएनयू की उपज हैं। और चंद्गशेखर राजनीति में सबसे उर्वर उत्तर प्रदेश से हैं। इन सभी युवा नेताओं में जो कॉमन है, वह है सभी का भाजपा का धुर विरोधी होना। ऐसी स्थिति में 2०19 में होने वाले लोकसभा चुनाव में इन पर पूरे देश की नजर रहेगी कि क्या ये युवा नेता भाजपा के विजय रथ को रोक लेंगे।
अल्पेश ठाकोर: गुजरात के हैं। गुजरात में उन्हें ओबीसी वर्ग का नेता माना जाता है। उन्होंने पिछले साल हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत, तो दर्ज की है, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा भी पायी थी। हालांकि उन पर जातीय राजनीति करने का आरोप भी लगा। उनकी जोरदार चर्चा तब हुई थी जब पीएम मोदी पर गोरा करने वाले मशरूम को खाने का आरोप लगा दिया था। 2०11 से पहले वह कांग्रेस में सक्रिय थे, लेकिन 2०11 में दलगत राजनीति से अलग होकर गुजरात क्षत्रिय ठाकोर सेना नाम से खुद का संगठन बनाया। फिर 2०15 में ओबीसी एससी/एसटी एकता मंच नामक संगठन खड़ा किया।
अब वह फिर से कांग्रेस में हैं और कांग्रेस के युवा नेताओं में वह भी एक बड़ा नाम हैं। उनकी पहुंच सीधे राहुल गांधी तक है। उनके पिता और दादा भी राजनीति में रहे हैं। कांग्रेस ने हाल ही में अल्पेश को बिहार का प्रभारी भी बनाया, ताकि वह बिहार के पिछड़े वर्ग को साध सकें। अल्पेश का कहना है कि राजनीति में अगर कुछ भी संभव है, तो मोदी की राजनीति का खात्मा भी संभव है। अब भाजपा की राजनीति आगे नहीं बढ़ सकती, क्योंकि देश का युवा समाज जाग गया है और भाजपा के खेल को जान गया है।
जिग्नेश मेवाणी: यह युवा नेता भी गुजरात से है और मोदी सरकार की नीतियों के प्रबल विरोधी हैं। 2०17 में ऊना में हुए दलितों पर अत्याचार के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। इसी आंदोलन से वह सुर्खियों में आये। उन्होंने विस चुनाव में बनासकांठा के वडगाम सीट से 29,5०० मतों के अंतर से जीत दर्ज की। वह निर्दलीय चुनाव लड़े थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया था। वह वकील भी हैं और पत्रकारिता का कोर्स भी किया हुआ है। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दलित चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी नजर 2०19 के चुनाव पर है। उनका स्लोगन है, अगले चुनाव में भाजपा साफ़। यह स्लोगन कितना चरितार्थ होगा, अभी कहना जल्दबाजी होगी। हालांकि गुजरात में उनकी राजनीति जमीन पकड़ चुकी है। वह खेल करेंगे।
हार्दिक पटेल: मोदी सरकार के घोर विरोधी हार्दिक भी गुजरात से हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा उन्होंने ही बटोरी थी। चुनाव के वक्त उनसे सम्बंधित 5 सीडी सामने आयी थीं और सीसीटीवी फुटेज भी वायरल हुआ था। बावजूद इसके उनका जलवा बरकरार रहा। उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन भाजपा को चिंतित करने में कामयाब रहे थे। चुनाव बाद उन्होंने ईवीएम हैकिग की भी बात उठाई थी। जिस आक्रामकता के साथ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर निशाना साधा, उसकी वजह से भाजपा विरोधियों ने उन्हें हाथों हाथ लिया। अपनी बात रखने की उनकी शैली ने भी उन्हें फायदा पहुंचाया। अब उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है। हाल ही में आरक्षण के मसले पर उन्होंने कई दिनों तक भूख हड़ताल की थी। आम चुनाव में हार्दिक की राजनीति मोदी की राजनीति पर हमला करेगी।
कन्हैया कुमार: जेएनयू का यह तेज तर्रार छात्र नेता मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ हुए आंदोलन की उपज है। वह सरकार विरोधी आंदोलन से लेकर लिटरेचर फ़ेस्टिवल तक में शरीक होते हैं। देश विरोधी नारों के आरोप में जेल तक जा चुके कन्हैया जेल से बाहर निकलने पर जिस अंदाज में केन्द्ग सरकार पर निशाना साधा, उसने उन्हें और प्रसिद्ध दिला दी। अब वह और अधिक मुखर होकर मोदी सरकार के खिलाफ बोलते हैं। वह संघ पर निशाना साधते रहे हैं। लाखों लोग उनके समर्थक हैं। चर्चा है कि अब वह वाम मोर्चा की राजनीति में सक्रिय होंगे। उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की बातें भी चर्चा में हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र में जो सरकार बोलने, खाने की आजादी पर पाबंदी लगाए उसे टिके रहने का कोई मतलब नहीं। आगामी चुनाव में वह गठबंधन की राजनीति को धार देते दिखेंगे।
चंद्गशेखर रावण: भीम आर्मी प्रमुख 3० वर्षीय चंद्रशेखर दलित समुदाय से हैं और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से हैं। 2०17 में वह सुर्खियों में आये। हुआ यह था कि सहारनपुर में दलितों ने अपनी पहचान स्थापित करने के कोशिश में अपनी जमीन पर ‘दि ग्रेट चमार’ लिखा एक बोर्ड लगा दिया। इलाके के ठाकुरों को इससे गुस्सा आया और उन्होंने इस बोर्ड को हटाने की कोशिश की, तो हिंसा भड़क उठी। इसी हिंसा के लिए चंद्रशेखर रावण को 5 महीने के लिए जेल में डाल दिया गया। पिछले साल नवम्बर में उन्हें जैसे ही जमानत मिली, उन पर रासुका लगाकर फिर से जेल भेज दिया गया।
सामने लोकसभा चुनाव को देखते हुए योगी सरकार ने चंद्रशेखर को 13 सितंबर, 2०18 को रिहा करने के आदेश दिए। रिहा होते ही चंद्रशेखर ने मोदी और योगी सरकार पर हमला किया और इनकी सरकारों को सत्ता से हटाने का प्रण भी किया। भीम आर्मी संस्थापक की युवा दलितों में अच्छी पैठ है। इसीलिए वह सत्ता पक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती दिखते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें आधी रात के बाद जेल से रिहा किया गया, जबकि कैदियों की रिहाई दिन में होती है। सरकार को अंदेशा था कि बड़ी संख्या में उनके समर्थक जेल के बाहर जमा हो जाएंगे और कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है। चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के समय भीम आर्मी ने सहारनपुर में ताकत दिखाई थी।
अपनों के बीच जननायक बन चुके चंद्गशेखर की भीम आर्मी एकता मिशन आने वाले दिनों में एक राजनीतिक ताकत के रूप में उभर सकती है। ‘दि ग्रेट चमार’ लिखे बोर्ड सहारनपुर के 16० गांवों में लगे हैं। बदलाव ऐसे ही हुआ करते हैं जब सताए हुए लोग अपने लिए खुद खड़े होते हैं। जहां तक राजनीति की बात है, यह वहीं सफल होती है जहां जनता की भीड़ एक झंडे के नीचे या फिर किसी जननायक के पीछे खड़ी हो जाती है। फिलहाल भीम आर्मी के इस ऐलान के परिणाम का सभी को इंतजार है,जिसमें उसने कहा है कि अगले लोकसभा चुनाव में वह भाजपा को नाथ देगी और मोदी सरकार को जमींदोज कर देगी।
चंद्रशेखर नुकीली मूंछे रखता है। ऐसी मूंछे दूसरों के लिए एक ऐलान भी होती हैं। भीम आर्मी एकता मिशन के जितने भी कार्यकर्ताओं से मैं मिला, उनमें से ज्यादातर ने ऐसी ही मूंछें रखी हुई हैं। ये सभी अपने हाथ में स्टील का एक मोटा कड़ा भी पहनते हैं, लेकिन कोई धार्मिक धागा कलाई में नहीं बांधते। भीम आर्मी सहारनपुर में दलित बच्चों के लिए करीब 3०० स्कूल चलाती है, जहां दलित कार्यकताã स्कूल के नियमित समय के बाद शाम को लोगों को पढ़ाते हैं। ये स्कूल किसी न किसी के घर में चलते हैं। घर के बड़े से बरामदे में करीब 35 बच्चों को तीन कतारों में बिठाया जाता है। इन बच्चों की उम्र 5 से 1० साल के बीच है। एक युवा लड़की और एक किशोर को उन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। जय भीम के नारे के साथ बच्चे एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। उन्हें बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की जीवनी भी याद है।
बेरोजगारी बन सकती है शोला: ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ आंदोलन के बाद एक बार फिर आज का युवा नए आंदोलन को जन्म दे सकता है, और वह है देश में बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन। इस आंदोलन से एक बार फिर देश के राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। तथ्यों पर नजर डालें तो, नौकरी की तलाश में लगभग 5 करोड़ युवाओं ने रोजगार कार्यालय में पंजीकरण कराया है। प्रतिदिन 3०,००० नए युवा नौकरी की तलाश में आते हैं, लेकिन 5०० से भी कम लोगों को नौकरी मिल पाती है। हैरानी की बात तो यह है कि देश में हर दिन 7०,००० नए युवा वोट करने योग्य हो जाते हैं, लेकिन 5०० से भी कम नौकरियां पैदा हो रही हैं। हालिया राष्ट्रीय सर्वे में युवाओं के बीच बेरोजगारी नंबर 1 मुद्दा बन कर उभरी। 77 प्रतिशत भारतीय घरों में कोई नियमित कमाने वाला नहीं है। 9० प्रतिशत औपचारिक क्षेत्रों में 15 हजार रुपये प्रति माह से भी कम वेतन दिया जाता है। नरेगा के तहत लोगों को 6,००० रुपये प्रतिमाह भुगतान किया जाता है।
ग्रामीण युवा भी परेशान: गांव की युवा पीढ़ी पहले रोजगार की तलाश में शहर की ओर पलायन करती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से उन्हें वहां भी निराश होना पड़ रहा है। निवेश की कमी और मंदी के कारण निजी क्षेत्र नौकरियां देने में सक्षम नहीं है। रीयल स्टेट, जो आमतौर पर हमेशा नौकरियां पाने का केन्द्र माना जाता था, नोटबंदी, रेरा और जीएसटी का मारा है। पिछले कुछ सालों में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बढ़ती मांग भी निराशा का एक कारण है। 1०० प्रतिशत आरक्षण भी इस समस्या को हल नहीं कर सकतीं, क्योंकि नौकरियां कम हैं और मांग ज्यादा। लिहाजा ग्रामीण युवाओं का भविष्य अंधकार में है।
शिक्षा प्रणाली मुफीद नहीं: किसी भी देश के लिए उस देश के युवा संपत्ति के समान होते हैं, क्योंकि वे अपने देश के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। भारतीय जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है, लेकिन हम इसका लाभ उठाने में सक्षम नहीं हैं। इसका मुख्य कारण है हमारी असफल शिक्षा प्रणाली। हमारी शिक्षा प्रणाली अयोग्य शिक्षितों को जन्म देती है, जिससे उनकी आकांक्षाएं टूट जाती हैं।
एक और आंदोलन की नौवत: 2०11 के आरंभ में अरविंद केजरीवाल ने ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ आंदोलन की शुरुआत की थी। आंदोलन सफल रहा। बाद में केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (आप) नाम की पार्टी बनायी और दिल्ली में आप की सरकार बनायी, जो चल रही है। खैर, राजनीति में समझ रखने वाले युवाओं की संख्या देश में बढ़ी है। विशेषकर गुजरात विधानसभा चुनाव के समय कई आंदोलन देखने को मिले। आज के युवा नेता स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के माध्यम से परम्परागत रूप से कार्य कर रहीं पार्टियां को चुनौती दे रहे हैं। उन्हें एक ऐसे राजनीतिक मंच की जरूरत है, जो रोजगार को महत्व दें। राम जन्मभूमि और भ्रष्टाचार मुक्त भारत दो ऐसे आंदोलन हैं, जिन्होंने पूरे भारतीयों का ध्यान अपनी और खींचा था। 2०19 में आम चुनाव होना है। हालात के मद्देनजर चुनाव से थोड़ा पहले देश में एक नया आंदोलन देखने को मिल सकता है, क्योंकि अपने मसलों को हल करने के लिए देश के कई इलाकों के युवा नेता तैयार बैठे हैं।
मद में चूर होती है सत्ता: जो सत्ता में होता है उसकी आंखों पर चश्मा चढ़ा होता है। कोई भी इसका अपवाद नहीं है। न इंदिरा गांधी थीं और न नरेंद्र मोदी हैं। शायद यही वह वजह है कि मोदी और अमित शाह को लग रहा है कि 2०19 में उन्हें कोई चुनौती नहीं है। फिलहाल विपक्षी दलों में अभी एकता नहीं है। कांग्रेस कमजोर हो चुकी है। विरोधी पार्टियां संसाधनों के लिहाज से परेशान हैं। लिहाजा उनकी तैयारियां नहीं हैं। इन बातों से भाजपा को चुनौती नहीं दिख रही हो। हालांकि असली चुनौती बड़ी तस्वीर में नहीं दिखती है। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर एक चुनौती हैं, जिन्हें उनके फॉलोवर्स की संख्या को देखते हुए आधी रात के बाद जेल से रिहा किया गया था। अब इस ताकत के साथ जब हार्दिक, अल्पेश, कन्हैया और जिग्नेश की ताकत मिलेगी, तो चुनौती बड़ी हो जायेगी। सच तो यही है कि दलितों के नाम पर ही भाजपा घिर जाएगी। भाजपा नीत केन्द्ग और राज्यों की सरकारों में भी अनुसूचित जाति और जनजातियों को सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से जगह मिली है। देश की करीब साढ़े 22 फीसदी आबादी के एक-एक चेहरे दिखाने के लिए केन्द्ग में हैं। राज्यों में भाजपा के 15 मुख्यमंत्री और सात उप मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उनमें से कोई भी दलित नहीं है। जाहिर है आंदोलन के गर्भ से निकले युवा नेता 2०19 की राजनीति को साधेंगे और भाजपा विरोध देखने को मिलेगा।

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