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बम और गोलियों से आगे बढ़ा पर्यावरणीय संकट, तेल डिपो की आग और रासायनिक प्रदूषण से धरती पर गहरा असर

नई दिल्ली: दुनिया के विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों और पश्चिम एशिया में जारी युद्धों का असर अब केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं रह गया है। लगातार हो रही बमबारी, तेल भंडारण केंद्रों और रिफाइनरियों पर हमले, भीषण आग तथा रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के आरोपों ने पर्यावरण के सामने एक गंभीर और दीर्घकालिक संकट खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध न केवल जान-माल का नुकसान कर रहे हैं, बल्कि मिट्टी, जल स्रोतों, वायु गुणवत्ता और जैव विविधता को भी गहरा नुकसान पहुंचा रहे हैं।

14 दिनों में 50 लाख टन कार्बन उत्सर्जन, बढ़ी चिंता

रिपोर्टों के अनुसार, संघर्षों के शुरुआती 14 दिनों के दौरान ही लगभग 50 लाख टन कार्बन उत्सर्जन दर्ज किया गया। यह मात्रा आइसलैंड जैसे छोटे देश के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन से भी अधिक बताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा दर्शाता है कि युद्ध अब केवल राजनीतिक और सैन्य मुद्दा नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा बड़ा वैश्विक संकट बन चुका है।

तेल डिपो और रिफाइनरियों में आग से फैला खतरनाक प्रदूषण

संघर्ष क्षेत्रों में तेल भंडारण स्थलों और रिफाइनरियों पर हमलों के बाद लगी भीषण आग से वातावरण में भारी मात्रा में कालिख, हाइड्रोकार्बन और अन्य जहरीले प्रदूषक फैल रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे प्रदूषक केवल स्थानीय वायु गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करते, बल्कि सल्फर और नाइट्रोजन यौगिकों के कारण अम्लीय वर्षा जैसी परिस्थितियां भी पैदा कर सकते हैं।

इसका सीधा असर कृषि भूमि, वनस्पतियों और जल स्रोतों पर पड़ता है, जिससे लंबे समय तक पर्यावरणीय क्षति बनी रह सकती है।

120 से अधिक पर्यावरणीय क्षति की घटनाएं दर्ज

ब्रिटेन स्थित संस्था ‘कॉन्फ्लिक्ट एंड एनवायरनमेंट ऑब्जर्वेटरी’ के अनुसार संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरणीय नुकसान से जुड़ी 120 से अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें जंगलों का विनाश, कृषि भूमि को नुकसान, जल संसाधनों का प्रदूषण और प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना शामिल है।

दक्षिणी लेबनान में व्हाइट फॉस्फोरस जैसे रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की रिपोर्टों ने भी पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

दशकों तक रह सकता है युद्ध का पर्यावरणीय असर

विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी पर्यावरण पर उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है। दूषित मिट्टी, प्रदूषित भूजल और नष्ट हुई जैव विविधता को सामान्य स्थिति में लौटने में कई वर्षों या दशकों का समय लग सकता है।

ऐसे प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि मानव स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।

सिर्फ बमबारी नहीं, सैन्य गतिविधियां भी बढ़ाती हैं कार्बन फुटप्रिंट

शोधकर्ताओं के अनुसार युद्ध का कार्बन फुटप्रिंट केवल बमबारी और विस्फोटों से नहीं बनता। इसमें सैन्य विमानों की उड़ानें, नौसैनिक अभियानों, हथियारों के निर्माण, सैन्य रसद और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण कार्यों से होने वाला उत्सर्जन भी शामिल होता है।

इन सभी गतिविधियों का संयुक्त प्रभाव पर्यावरण पर भारी दबाव डालता है और वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन की चुनौती को और गंभीर बना देता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों ने जताई चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्धों के पर्यावरणीय प्रभावों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले वर्षों में दुनिया को जलवायु संकट के और भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उनका कहना है कि संघर्षों के मानवीय और आर्थिक नुकसान के साथ-साथ पर्यावरणीय प्रभावों को भी वैश्विक नीति निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

 

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