आईवीआरआई में 26वाँ इंडियन वेटरनरी कांग्रेस एवं 33वाँ आईएएवीआर वार्षिक सम्मेलन का शुभारंभ

बरेली,13फरवरी।भारतीय पशुचिकित्सा क्षेत्र के प्रतिष्ठित आयोजन 26वें इंडियन वेटरनरी कांग्रेस के साथ-साथ इंडियन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ वेटरनरी रिसर्च (आईएएवीआर) के 33वाँ वार्षिक सम्मेलन तथा “वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन (पोल्ट्री एवं वन्यजीव सहित) में प्रगति एवं उभरती प्रवृत्तियाँ” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज भारतीय पशु चिकित्सा भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान, इज्जतनगर में शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित भी किया गया ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. राघवेंद्र भट्टा, उप महानिदेशक, पशु विज्ञान ने अपने सम्बोधन में पशु स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और उभरती चुनौतियों पर विशेष बल दिया । उन्होने कहा कि वर्ष 2030 तक देश में दुग्ध उत्पादन लगभग 300 मिलियन मीट्रिक टन तथा वर्ष 2047 तक 600 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का लक्ष्य है। ऐसे में पशु स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
डॉ. भट्टा ने उभरती पशु बीमारियों पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर खुरपका-मुंहपका रोग, लंपी स्किन डिजीज, पीपीआर एवं ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारियों से देश को आर्थिक नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि इन बीमारियों की रोकथाम के लिए प्रभावी टीकाकरण कार्यक्रम और अनुसंधान को प्राथमिकता दी जा रही है। विशेष रूप से खुरपका-मुंहपका रोग के लिए दीवा क्षमता वाले उन्नत टीके के विकास पर कार्य अंतिम चरण में है।
रोग निगरानी (सर्विलांस) और पूर्व चेतावनी प्रणाली को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रोग पूर्वानुमान प्रणाली के माध्यम से लगभग 15 प्रमुख बीमारियों का 60 दिन पूर्व पूर्वानुमान संभव हो रहा है, जिससे राज्यों को समय रहते तैयारी करने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त, उभरती एवं चुनौतीपूर्ण बीमारियों पर भी विशेष कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि एवं सरदार बल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ के कुलपति डॉ त्रिवेणी दत्त ने अपने संबोधन में आईवीआरआई की प्रसंशा करते हुए कहा कि आईवीआरआई का 136 वर्षों का विशिष्ट इतिहास अनुसंधान, शिक्षा एवं विस्तार के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा है। संस्थान ने मानव संसाधन विकास, पशु स्वास्थ्य सुरक्षा, नवाचार तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब तक संस्थान द्वारा 100 से अधिक आईपीआर पंजीकृत कराए गए हैं, 142 आईसीटी टूल्स विकसित किए गए हैं तथा 47 प्रौद्योगिकियों (जिनमें 13 टीके शामिल हैं) का व्यावसायीकरण किया जा चुका है। विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को 60 से अधिक प्रौद्योगिकियाँ हस्तांतरित की गई हैं।
उन्होंने “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि पशु स्वास्थ्य एवं पशुधन विकास देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में आधारशिला सिद्ध होंगे। प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2047 तक भारत की अर्थव्यवस्था को 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने के लक्ष्य की प्राप्ति में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। पशुधन उत्पादकता में वृद्धि, निर्यात क्षमता का विस्तार, मूल्य संवर्धन, भंडारण एवं वैल्यू चेन सुदृढ़ीकरण जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
आईएएवीआर के डॉ. एस. एन. सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन के दौरान कहा कि पशुचिकित्सा विज्ञान का प्रभाव केवल पशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण एवं राष्ट्रीय विकास से सीधे जुड़ा हुआ है।
डॉ. सिंह ने अपने व्यावसायिक जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रारंभिक शिक्षा काल में ही उन्हें यह समझ में आ गया था कि पशुचिकित्सा विज्ञान का वैश्विक महत्व है। उन्होंने बताया कि संस्थान के पूर्व निदेशकों एवं वरिष्ठ वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने यह सीखा कि इस क्षेत्र में नेतृत्व और जिम्मेदारी स्वयं उठानी होती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन उत्पादन और सार्वजनिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि पशु स्वास्थ्य और उत्पादन दोनों संतुलित रूप से आगे बढ़ें, तभी समग्र विकास संभव है।
आईएएवीआर के संस्थापक सचिव डॉ. ऋषेन्द्र वर्मा ने अपने सम्बोधन में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों एवं शैक्षणिक नेतृत्वकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि पशु विज्ञान के क्षेत्र में कई विद्वानों ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पदों पर कार्य करते हुए अनुसंधान, नियामक ढांचे एवं जैविक उत्पादों के मानकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होने वर्ष 1991 में स्थापित राष्ट्रीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संघ की 34 वर्षों की सफल यात्रा का भी उल्लेख किया गया। उन्होने कहा कि इस संगठन का मूल उद्देश्य पशु चिकित्सा अनुसंधान को प्रोत्साहित करना, पेशे में अनावश्यक विभाजन को रोकना तथा वैज्ञानिकों को एक साझा राष्ट्रीय मंच प्रदान करना है। यह संगठन देश-विदेश में पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के मध्य समन्वय स्थापित करने वाला एक सशक्त ‘नर्व सेंटर’ के रूप में कार्य कर रहा है।
आयोजन सचिव डॉ. रविकांत अग्रवाल ने जानकारी देते हुए बताया कि यह सम्मेलन बौद्धिक आदान-प्रदान, सहयोगात्मक संवाद एवं नवाचारपूर्ण चिंतन के लिए एक सशक्त मंच के रूप में सुविचारित ढंग से तैयार किया गया है। दो दिवसीय इस वैज्ञानिक सम्मेलन के दौरान प्रबुद्ध की-नोट व्याख्यान, विषयगत तकनीकी सत्र, आमंत्रित मुख्य शोध-पत्र, मौखिक एवं पोस्टर प्रस्तुतियां, पैनल चर्चाएं तथा उद्योग–शैक्षणिक संस्थान संवाद आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने बताया कि सम्मेलन का वैज्ञानिक कार्यक्रम छह प्रमुख विषयगत क्षेत्रों को समाहित करता है। इनमें पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन के लिए उन्नत वैक्सीन एवं डायग्नोस्टिक्स, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस एवं ‘वन हेल्थ’, वन्य एवं प्रयोगशाला पशु विज्ञान, खाद्य सुरक्षा एवं संरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आयुर्वेद एवं फार्माकोविजिलेंस तथा उद्योग–अकादमिक अंतःक्रिया शामिल हैं। इन विषयों के माध्यम से उभरती चुनौतियों, हालिया वैज्ञानिक उपलब्धियों और भविष्य की दिशाओं पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा।
डॉ. अग्रवाल ने विश्वास व्यक्त किया कि उद्योग–अकादमिक संवाद नवाचार को गति प्रदान करेगा, पेशेवर सहयोग को सुदृढ़ करेगा तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सतत पशुधन विकास और बेहतर पशु स्वास्थ्य प्रबंधन की दिशा में सार्थक योगदान देगा। बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्टआईवीआरआई में 26वाँ इंडियन वेटरनरी कांग्रेस एवं 33वाँ आईएएवीआर वार्षिक सम्मेलन का शुभारंभ
बरेली,13फरवरी।भारतीय पशुचिकित्सा क्षेत्र के प्रतिष्ठित आयोजन 26वें इंडियन वेटरनरी कांग्रेस के साथ-साथ इंडियन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ वेटरनरी रिसर्च (आईएएवीआर) के 33वाँ वार्षिक सम्मेलन तथा “वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन (पोल्ट्री एवं वन्यजीव सहित) में प्रगति एवं उभरती प्रवृत्तियाँ” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज भारतीय पशु चिकित्सा भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान, इज्जतनगर में शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित भी किया गया ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. राघवेंद्र भट्टा, उप महानिदेशक, पशु विज्ञान ने अपने सम्बोधन में पशु स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और उभरती चुनौतियों पर विशेष बल दिया । उन्होने कहा कि वर्ष 2030 तक देश में दुग्ध उत्पादन लगभग 300 मिलियन मीट्रिक टन तथा वर्ष 2047 तक 600 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का लक्ष्य है। ऐसे में पशु स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
डॉ. भट्टा ने उभरती पशु बीमारियों पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर खुरपका-मुंहपका रोग, लंपी स्किन डिजीज, पीपीआर एवं ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारियों से देश को आर्थिक नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि इन बीमारियों की रोकथाम के लिए प्रभावी टीकाकरण कार्यक्रम और अनुसंधान को प्राथमिकता दी जा रही है। विशेष रूप से खुरपका-मुंहपका रोग के लिए दीवा क्षमता वाले उन्नत टीके के विकास पर कार्य अंतिम चरण में है।
रोग निगरानी (सर्विलांस) और पूर्व चेतावनी प्रणाली को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रोग पूर्वानुमान प्रणाली के माध्यम से लगभग 15 प्रमुख बीमारियों का 60 दिन पूर्व पूर्वानुमान संभव हो रहा है, जिससे राज्यों को समय रहते तैयारी करने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त, उभरती एवं चुनौतीपूर्ण बीमारियों पर भी विशेष कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि एवं सरदार बल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ के कुलपति डॉ त्रिवेणी दत्त ने अपने संबोधन में आईवीआरआई की प्रसंशा करते हुए कहा कि आईवीआरआई का 136 वर्षों का विशिष्ट इतिहास अनुसंधान, शिक्षा एवं विस्तार के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा है। संस्थान ने मानव संसाधन विकास, पशु स्वास्थ्य सुरक्षा, नवाचार तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब तक संस्थान द्वारा 100 से अधिक आईपीआर पंजीकृत कराए गए हैं, 142 आईसीटी टूल्स विकसित किए गए हैं तथा 47 प्रौद्योगिकियों (जिनमें 13 टीके शामिल हैं) का व्यावसायीकरण किया जा चुका है। विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को 60 से अधिक प्रौद्योगिकियाँ हस्तांतरित की गई हैं।
उन्होंने “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि पशु स्वास्थ्य एवं पशुधन विकास देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में आधारशिला सिद्ध होंगे। प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2047 तक भारत की अर्थव्यवस्था को 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने के लक्ष्य की प्राप्ति में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। पशुधन उत्पादकता में वृद्धि, निर्यात क्षमता का विस्तार, मूल्य संवर्धन, भंडारण एवं वैल्यू चेन सुदृढ़ीकरण जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
आईएएवीआर के डॉ. एस. एन. सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन के दौरान कहा कि पशुचिकित्सा विज्ञान का प्रभाव केवल पशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण एवं राष्ट्रीय विकास से सीधे जुड़ा हुआ है।
डॉ. सिंह ने अपने व्यावसायिक जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रारंभिक शिक्षा काल में ही उन्हें यह समझ में आ गया था कि पशुचिकित्सा विज्ञान का वैश्विक महत्व है। उन्होंने बताया कि संस्थान के पूर्व निदेशकों एवं वरिष्ठ वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने यह सीखा कि इस क्षेत्र में नेतृत्व और जिम्मेदारी स्वयं उठानी होती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुधन उत्पादन और सार्वजनिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि पशु स्वास्थ्य और उत्पादन दोनों संतुलित रूप से आगे बढ़ें, तभी समग्र विकास संभव है।
आईएएवीआर के संस्थापक सचिव डॉ. ऋषेन्द्र वर्मा ने अपने सम्बोधन में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों एवं शैक्षणिक नेतृत्वकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि पशु विज्ञान के क्षेत्र में कई विद्वानों ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पदों पर कार्य करते हुए अनुसंधान, नियामक ढांचे एवं जैविक उत्पादों के मानकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होने वर्ष 1991 में स्थापित राष्ट्रीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संघ की 34 वर्षों की सफल यात्रा का भी उल्लेख किया गया। उन्होने कहा कि इस संगठन का मूल उद्देश्य पशु चिकित्सा अनुसंधान को प्रोत्साहित करना, पेशे में अनावश्यक विभाजन को रोकना तथा वैज्ञानिकों को एक साझा राष्ट्रीय मंच प्रदान करना है। यह संगठन देश-विदेश में पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के मध्य समन्वय स्थापित करने वाला एक सशक्त ‘नर्व सेंटर’ के रूप में कार्य कर रहा है।
आयोजन सचिव डॉ. रविकांत अग्रवाल ने जानकारी देते हुए बताया कि यह सम्मेलन बौद्धिक आदान-प्रदान, सहयोगात्मक संवाद एवं नवाचारपूर्ण चिंतन के लिए एक सशक्त मंच के रूप में सुविचारित ढंग से तैयार किया गया है। दो दिवसीय इस वैज्ञानिक सम्मेलन के दौरान प्रबुद्ध की-नोट व्याख्यान, विषयगत तकनीकी सत्र, आमंत्रित मुख्य शोध-पत्र, मौखिक एवं पोस्टर प्रस्तुतियां, पैनल चर्चाएं तथा उद्योग–शैक्षणिक संस्थान संवाद आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने बताया कि सम्मेलन का वैज्ञानिक कार्यक्रम छह प्रमुख विषयगत क्षेत्रों को समाहित करता है। इनमें पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन के लिए उन्नत वैक्सीन एवं डायग्नोस्टिक्स, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस एवं ‘वन हेल्थ’, वन्य एवं प्रयोगशाला पशु विज्ञान, खाद्य सुरक्षा एवं संरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आयुर्वेद एवं फार्माकोविजिलेंस तथा उद्योग–अकादमिक अंतःक्रिया शामिल हैं। इन विषयों के माध्यम से उभरती चुनौतियों, हालिया वैज्ञानिक उपलब्धियों और भविष्य की दिशाओं पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा।
डॉ. अग्रवाल ने विश्वास व्यक्त किया कि उद्योग–अकादमिक संवाद नवाचार को गति प्रदान करेगा, पेशेवर सहयोग को सुदृढ़ करेगा तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सतत पशुधन विकास और बेहतर पशु स्वास्थ्य प्रबंधन की दिशा में सार्थक योगदान देगा। बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट


