“प्रभावी संगीत के लिए केवल स्वर और लय ही काफी नहीं है इसके लिए भाव होना भी बहुत जरूरी है” : प्रो संजय सिंह

ललित कला अकादमी क्षेत्रीय केन्द्र, लखनऊ के सचिव, डा. देवेंद्र कुमार त्रिपाठी सहित यूपीएसएनए के अध्यक्ष प्रो जयंत खोत, उपाध्यक्ष विभा सिंह और निदेशक डॉ शोभित कुमार नाहर की उपस्थिति में संत गाडगे अकादमी में सम्पन्न हुआ यूपीएसएनए प्रादेशिक संगीत प्रतियोगिता पुरस्कार वितरण समारोह लखनऊ 28 जनवरी। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित उल्लास उत्सव के अंतर्गत बुधवार 28 जनवरी को अकादमी के संत गाडगे जी ऑडिटोरियम में शास्त्रीय एवं सुगम की प्रादेशिक संगीत प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण समारोह 2025-26 आयोजित किया गया। इस अवसर पर डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो संजय सिंह मुख्य अतिथि थे। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सहित अकादमी के अध्यक्ष प्रो जयंत खोत, उपाध्यक्ष विभा सिंह, ललित कला अकादमी क्षेत्रीय केंद्र लखनऊ के सचिव डॉ देवेंद्र कुमार त्रिपाठीऔर निदेशक डॉ शोभित कुमार नाहर ने दीप प्रज्वलित किया। मुख्य अतिथि के सम्मान के उपरांत पुरस्कारों का वितरण किया गया। इस अवसर विशिष्ट अतिथि के रूप में ललित कला अकादमी क्षेत्रीय केन्द्र, लखनऊ के सचिव, डा. देवेंद्र कुमार त्रिपाठी भी उपस्थित रहे। इन सभी विशिष्ट जनों की उपस्थिति में पुरस्कारों का वितरण किया गया।

इस समारोह में डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो संजय सिंह ने कहा कि प्रभावी संगीत के लिए केवल स्वर और लय ही काफी नहीं है। इसके लिए भाव होना भी बहुत जरूरी है। भारतीय संगीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं है। संगीत से साधना की प्राप्ति संभव है। यहां के राग न केवल ऋतु आधारित है बल्कि उनके लिए निश्चित समय भी निर्धारित किया गया है। भारतीय संगीत साक्षी है कि इसके रागों से अग्नि प्रज्वलित की जा सकती है वहीं मेघों से बरसात करवायी जा सकती है। यही नहीं पत्थर तक पिघलाए जा सकते हैं। इसलिए संगीत के नियमित रियाज की जरूरत है जिससे आप उसमें सिद्ध हो सकें। भारतीय संगीत में आधुनिक विज्ञान भी समाहित है। अच्छे संगीतज्ञ बनने के लिए जरूरी है कि आप स्वस्थ रहे और सभी व्याधियों से मुक्त रहे।

उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष प्रो जयंत खोत ने इस अवसर पर बताया कि अकादमी द्वारा वर्ष 2024-25 में सम्भागीय शास्त्रीय प्रतियोगिता का स्वर्ण जयन्ती वर्ष था, जिसमें शास्त्रीय संगीत के साथ सुगम संगीत-गजल और भजन, को भी शामिल करते हुए इस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें प्रदेश के 18 सम्भाग के 21 केन्द्रों पर लगभग 900 प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। वर्ष 2025-26 में आयोजित सम्भागीय शास्त्रीय एवं सुगम संगीत प्रतियोगिता के 18 सम्भाग के 23 केन्द्रों में लगभग 1100 प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़ कर सक्रिय भागीदारी की। प्रतिभागियों के उत्साह को देखते हुए इस साल दो नये केन्द्र लखीमपुर और फर्रुखाबाद को जोड़ा गया। यह प्रतियोगिता तीन वर्गों में हुई जिसमें बाल वर्ग में उन प्रतिभागियों को शामिल किया गया था जिनकी आयु 31 जुलाई को 8 वर्ष से कम किन्तु 14 वर्ष से अधिक न हो। इस क्रम में किशोर वर्ग में 31 जुलाई को 14 वर्ष से अधिक हो किन्तु 20 वर्ष से अधिक न हो वहीं युवा वर्ग में 31 जुलाई को 20 वर्ष से अधिक हो किन्तु 25 वर्ष से अधिक न हो
इस प्रतियोगिता के गायन वर्ग में ख्याल-तराना, ध्रुपद-धमार, ठुमरी-दादरा, तंत्र वाद्यों में वीणा, सितार, सरोद, गिटार, मंडोलिन एवं संतूर, गज वाद्यों में वायलिन, सारंगी, इसराज, दिलरुबा, सुषिर वाद्य में बांसुरी, शहनाई, क्लेरीनेट, अवनद्ध वाद्य में तबला, पखावज, नृत्य में कथक, सुगम संगीत में भजन और गजल को शामिल किया गया है।
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के उपाध्यक्ष विभा सिंह ने कहा कि कलाकार भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवित रखते हैं। यह हमें समाज से जोड़ती, विचारों को जागृत करती है और मानवीय मूल्यों को स्थापित करती है। इस दिशा में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का योगदान अत्यंत सराहनीय रहा है। अकादमी परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का महती दायित्व अदा कर रही है। कला में ही जीवन का वास्तविक उल्लास निहित है।

