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AIIMS रायबरेली में दुर्लभ बीमारी से जूझ रही महिला की सफल सर्जरी, शरीर में उल्टी दिशा में थे सभी प्रमुख अंग

रायबरेली: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायबरेली के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ जन्मजात स्थिति से पीड़ित 46 वर्षीय महिला की दूरबीन विधि से पित्त की थैली निकालने की सफल सर्जरी की है। महिला सिटस इनवर्सस टोटैलिस नामक स्थिति से पीड़ित थी, जिसमें शरीर के भीतर मौजूद प्रमुख अंग सामान्य स्थिति के विपरीत दिशा में होते हैं। ऐसी असामान्य शारीरिक संरचना के कारण सामान्य सर्जरी की तुलना में ऑपरेशन करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। एम्स रायबरेली के जनरल सर्जरी विभाग की यूनिट-1 ने इस जटिल ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा कर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

पित्त की थैली में पथरी की शिकायत लेकर पहुंची थी महिला

जानकारी के अनुसार, लालगंज क्षेत्र के पूरे विजय सिंह, रगांव की रहने वाली 46 वर्षीय महिला पित्त की थैली में पथरी की समस्या से पीड़ित थी। चिकित्सकीय जांच के दौरान पता चला कि उसके शरीर के अंदर के प्रमुख अंग सामान्य शारीरिक संरचना के विपरीत दिशा में स्थित हैं। इस दुर्लभ स्थिति को चिकित्सा विज्ञान में सिटस इनवर्सस टोटैलिस कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो मरीज के शरीर के अंदर अंगों की स्थिति आईने में दिखाई देने वाली तस्वीर की तरह उल्टी होती है।

सर्जरी के दौरान डॉक्टरों के सामने थी बड़ी चुनौती

सिटस इनवर्सस टोटैलिस से पीड़ित मरीज की दूरबीन विधि से सर्जरी करना सर्जनों के लिए तकनीकी रूप से काफी चुनौतीपूर्ण होता है। सामान्य मरीजों में जिस दिशा और तरीके से सर्जिकल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है, इस स्थिति में उसमें बदलाव करना पड़ता है। ऑपरेशन के दौरान दूरबीन और सर्जिकल उपकरणों को शरीर में प्रवेश कराने के लिए बनाए जाने वाले पोर्ट की स्थिति भी सामान्य से विपरीत दिशा में निर्धारित करनी होती है। ऐसे में डॉक्टरों को मरीज की असामान्य शारीरिक संरचना के अनुरूप अपनी कार्यप्रणाली और उपकरणों की स्थिति में बदलाव करना पड़ता है।

डॉ. नीरज कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में टीम ने किया ऑपरेशन

एम्स रायबरेली के जनरल सर्जरी विभाग की यूनिट-1 में डॉ. नीरज कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में यह जटिल ऑपरेशन किया गया। सर्जिकल टीम में डॉ. प्रणभ कुशवाहा, डॉ. अमृतांशु सौरभ और डॉ. शिरीष कुमार के साथ सीनियर रेजिडेंट डॉ. योगेश तथा जूनियर रेजिडेंट डॉ. हिमांशु शामिल रहे। टीम ने मरीज के शरीर में अंगों की विपरीत स्थिति को ध्यान में रखते हुए सर्जिकल पोर्ट और उपकरणों की व्यवस्था की। इसके बाद दूरबीन विधि से पित्त की थैली निकालने की सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की गई। इस प्रक्रिया को लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टॉमी कहा जाता है।

एनेस्थीसिया और नर्सिंग टीम का भी रहा अहम योगदान

ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने में एनेस्थीसिया विभाग की टीम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें डॉ. अनिल, सीनियर रेजिडेंट डॉ. निलंबरा और जूनियर रेजिडेंट डॉ. अपेक्षा शामिल रहे। नर्सिंग ऑफिसर जुबैर ने भी ऑपरेशन के दौरान सहयोग किया। सभी सदस्यों के समन्वित प्रयास से दुर्लभ शारीरिक स्थिति वाले मरीज की सर्जरी पूरी की गई।

एम्स निदेशक ने पूरी टीम को दी बधाई

इस उपलब्धि पर एम्स रायबरेली की निदेशक डॉ. अमिता जैन ने जनरल सर्जरी विभाग की यूनिट-1 और पूरी सर्जिकल टीम को बधाई दी। उन्होंने डॉक्टरों के समर्पण, तकनीकी दक्षता और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता की सराहना की। उन्होंने कहा कि एम्स रायबरेली का जनरल सर्जरी विभाग भविष्य में भी जटिल मामलों में आधुनिक, कम चीरे वाली सर्जरी करने के लिए तैयार रहेगा।

आधुनिक सर्जरी से मरीजों को मिल रहा बेहतर उपचार

एम्स रायबरेली का उद्देश्य मरीजों को आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के माध्यम से कम चीरे, कम दर्द और अपेक्षाकृत तेजी से स्वस्थ होने वाले उपचार का लाभ उपलब्ध कराना है। जहां संभव हो, वहां खुली सर्जरी से जुड़े जोखिमों को कम करना भी इस प्रयास का हिस्सा है। दुर्लभ जन्मजात स्थिति से पीड़ित महिला की सफल दूरबीन सर्जरी संस्थान में उपलब्ध आधुनिक सर्जिकल सुविधाओं और डॉक्टरों की विशेषज्ञता को दर्शाती है। यह उपलब्धि जटिल परिस्थितियों में भी मरीजों को सुरक्षित और आधुनिक उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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