बाजीराव–मस्तानी के शनिवारवाड़ा में क्या आज भी भटकती हैं आत्माएं? पुणे के इस किले से जुड़ी डरावनी और रहस्यमयी कहानियां

पुणे का ऐतिहासिक शनिवारवाड़ा सिर्फ मराठा साम्राज्य की शान और पेशवाओं की सत्ता का प्रतीक नहीं है, बल्कि रहस्य और डर से जुड़ी कहानियों के लिए भी जाना जाता है। दिन में इतिहास का गौरव दिखाने वाला यह महल, सूरज ढलते ही रहस्यमयी दावों और खौफनाक किस्सों का केंद्र बन जाता है। स्थानीय लोगों से लेकर पर्यटकों तक, कई लोग मानते हैं कि आज भी इस किले की दीवारों के बीच दर्दनाक चीखें और अजीब आवाजें गूंजती हैं।

क्या शनिवारवाड़ा सच में भूतिया है?
शनिवारवाड़ा का निर्माण वर्ष 1732 में पेशवा बाजीराव प्रथम ने करवाया था। यह कभी मराठा साम्राज्य की सत्ता का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। भव्य दरवाजे, नक्काशीदार दीवारें, फव्वारे और विशाल प्रांगण इसकी शाही पहचान थे। लेकिन पेशवा परिवार के भीतर चल रही साजिशों और खूनी घटनाओं ने इस ऐतिहासिक किले की छवि को रहस्यमयी बना दिया। खासतौर पर पेशवा नारायण राव की हत्या के बाद शनिवारवाड़ा को भूतिया स्थान के रूप में देखा जाने लगा।
रात होते ही क्यों बढ़ जाता है डर?
स्थानीय लोगों और सुरक्षा कर्मियों का दावा है कि रात के समय शनिवारवाड़ा के अंदर अजीब आवाजें सुनाई देती हैं। कभी दरवाजों के अपने आप खुलने-बंद होने की बातें कही जाती हैं, तो कभी परछाइयों के दिखने के दावे किए जाते हैं। इन्हीं घटनाओं के चलते सूर्यास्त के बाद किले में आम लोगों की एंट्री पर रोक है। डर और रहस्य के इस माहौल ने विदेशी पर्यटकों के बीच भी शनिवारवाड़ा को रोमांचक जगह बना दिया है।
किसकी चीखें गूंजने का दावा किया जाता है?
नारायण राव मराठा साम्राज्य के दसवें पेशवा थे और महज 17 साल की उम्र में गद्दी पर बैठे थे। वे पेशवा नाना साहेब बालाजी बाजीराव के सबसे छोटे बेटे और बाजीराव प्रथम के पोते थे। कम उम्र में सत्ता संभालने के कारण वे राजनीतिक साजिशों के शिकार हो गए। 30 अगस्त 1773 को शनिवारवाड़ा में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि मरते वक्त उनके मुंह से निकला वाक्य “काका, मला वाचवा” आज भी किले की दीवारों में गूंजता महसूस किया जाता है।
बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी

पेशवा बाजीराव प्रथम और मस्तानी की प्रेम कहानी भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित कहानियों में से एक है। मस्तानी एक कुशल नर्तकी और बुद्धिमान राजकुमारी थीं। बाजीराव की वीरता और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर दोनों एक-दूसरे के करीब आए। सामाजिक विरोध के बावजूद बाजीराव ने मस्तानी को अपनाया और शनिवारवाड़ा परिसर में उनके लिए अलग महल बनवाया, जिसे मस्तानी महल कहा गया। यह प्रेम आज भी इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
मस्तानी की मृत्यु को लेकर क्या हैं दावे?
मस्तानी की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 को हुई थी। माना जाता है कि पेशवा बाजीराव की मृत्यु के बाद गहरे सदमे में आकर मस्तानी ने भी प्राण त्याग दिए। हालांकि उनकी मौत को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ में आत्महत्या की बात कही जाती है, तो कुछ के अनुसार उन्हें पुणे के पास पाबल गांव में नजरबंद रखा गया था, जहां उनका निधन हुआ। आज भी पाबल गांव में मस्तानी की मजार मौजूद है।
शनिवारवाड़ा में लगी भीषण आग का रहस्य
27 फरवरी 1828 को शनिवारवाड़ा में भीषण आग लग गई थी, जिसने किले के बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया। आग लगने की असली वजह आज तक साफ नहीं हो पाई है। इतिहासकारों का मानना है कि यह या तो साजिश का नतीजा थी या फिर गंभीर लापरवाही। आग इतनी भयानक थी कि इसे बुझाने में पूरे सात दिन लग गए। लकड़ी और तेल से बनी संरचनाओं के कारण पूरा महल जलकर खाक हो गया और केवल पत्थर की दीवारें ही बच सकीं।
आज भी पर्यटकों को खींचता है शनिवारवाड़ा
आज शनिवारवाड़ा पुणे आने वाले पर्यटकों की सूची में प्रमुख स्थान रखता है। इतिहास के छात्र हों या आम सैलानी, हर कोई इस किले में छिपे राज और मराठा साम्राज्य के गौरवशाली अतीत को जानने आता है। लोग इसकी गलियों में घूमते हैं, दीवारों पर बने चित्र देखते हैं और गाइड या ऑडियो टूर के जरिए इतिहास को करीब से महसूस करते हैं। यहां आने वालों को डर के साथ-साथ मराठा वंश की विरासत की गहरी अनुभूति भी होती है।

