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कंठस्थ शास्त्रों की धनी डॉली देवी—योग, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण की प्रेरक युवा साधिका

           बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के योग विभाग की शोधार्थी डॉली देवी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के अप्रतिम अध्ययन और स्मरण शक्ति के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की है। शास्त्रों के प्रति उनकी गहरी निष्ठा और अद्भुत स्मरण क्षमता के कारण वे परिसर में विशेष पहचान बना चुकी हैं।
           डॉली देवी के पास “श्रीमद्भगवद्गीता, ईशानी नो उपनिषद, पंचदर्शन, हठ प्रदीपिका, नीतिशतकम, चर्पट मंजरी, व्यवहार भानु” जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का कंठस्थ ज्ञान है। भारतीय दर्शन एवं योग साहित्य पर उनकी पकड़ इतनी सशक्त है कि पतंजलि विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित शास्त्र-स्मरण प्रतियोगिता में उन्होंने सभी श्रेणियों में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उनकी उत्कृष्टता और गहन विद्वत्ता को देखते हुए योग गुरु स्वामी रामदेव ने स्वयं उन्हें “धृति आर्या” की उपाधि प्रदान की थी।
          अपनी उपलब्धियों के संबंध में डॉली देवी बताती हैं कि भारतीय संस्कृति केवल परंपराओं का समूह नहीं, बल्कि जीवन का सार है। साथ ही यदि कोई व्यक्ति इस संस्कृति से अपरिचित है, तो उसने जीवन की उस सुंदरता और गहराई का अनुभव ही नहीं किया, जो इसे विशिष्ट बनाती है। डॉली देवी का मानना है कि मनुष्य को श्रेष्ठतम जन्म इसलिए मिला है ताकि वह स्वयं से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के हित में कार्य कर सके। अपने आगामी भविष्य की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे भविष्य में एक योग साधक की भांति सदैव नितांत निष्काम भाव से परार्थ के लिए कर्म करेंगी और संस्कृति एवं राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देंगी।
           विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने डॉली देवी को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि डॉली देवी की साधना, अनुशासन और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति उनकी गहन निष्ठा उन्हें विशिष्ट बनाती है। ‘धृति आर्या’ जैसी सम्मानित उपाधि प्राप्त करना उनके अध्ययन, अध्यवसाय और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण का प्रतीक है। हम सभी को उनकी उपलब्धियों पर गर्व के साथ- साथ पूर्ण विश्वास है कि वे योग, संस्कृति तथा राष्ट्र निर्माण के क्षेत्रों में अपनी विद्वत्ता से निरंतर प्रेरणा देती रहेंगी।
          साथ ही योग विभाग एवं बीबीएयू परिवार ने डॉली देवी की इस विशिष्ट उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है। उनकी साधना, समर्पण और संस्कृत-योग परंपरा के प्रति गौरवपूर्ण दृष्टि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
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