Top Newsदेशराज्य

पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण, उत्तराखंड से महाराष्ट्र तक सियासत में छोड़ी गहरी छाप

देहरादून। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड भाजपा के पहले प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं। देवभूमि उत्तराखंड के साथ-साथ महाराष्ट्र की राजनीति में भी उनकी प्रभावशाली भूमिका रही है।

RSS से राजनीति तक का सफर
भगत सिंह कोश्यारी का राजनीतिक जीवन संघ की विचारधारा से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। संगठनात्मक अनुभव और वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने उत्तराखंड भाजपा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। बाद में वह राज्य की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय जिम्मेदारियों तक पहुंचे।

1989 का चुनाव और अप्रत्याशित झटका
वर्ष 1989 का लोकसभा चुनाव भगत सिंह कोश्यारी के राजनीतिक जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय 47 वर्षीय कोश्यारी ने अल्मोड़ा संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। इससे पहले 1980 और 1984 में भाजपा को लगातार हार का सामना करना पड़ा था और पार्टी के कई दिग्गज क्षेत्र छोड़ चुके थे। ऐसे में कांग्रेस के मजबूत नेता और लगातार दो बार के सांसद हरीश रावत के खिलाफ कोश्यारी को मैदान में उतारा गया।

तीकोणी मुकाबले ने बदली तस्वीर
इस चुनाव में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं था। अलग राज्य उत्तराखंड की मांग को लेकर सक्रिय उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक और प्रखर नेता काशी सिंह ऐरी भी मैदान में थे। पहाड़ी राज्य आंदोलन के कारण उक्रांद का जनाधार तेजी से बढ़ रहा था, जिसका असर सीधे चुनावी नतीजों पर पड़ा।

मतदान और करारी हार
1989 में देशभर में कांग्रेस विरोधी माहौल था, जिससे भाजपा को जीत की उम्मीद थी। कुल 3 लाख 72 हजार मतदाताओं ने मतदान किया, लेकिन परिणाम चौंकाने वाले रहे। भगत सिंह कोश्यारी को केवल 9.32 प्रतिशत यानी 34,768 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे। यह हार इतनी बड़ी थी कि वह केवल अपनी जमानत ही बचा सके।

दो साल बाद खुद हट गए टिकट की दौड़ से
इस हार से निराश होकर भगत सिंह कोश्यारी ने 1991 के लोकसभा चुनाव में टिकट की दौड़ से खुद को अलग कर लिया। भाजपा ने नए चेहरे जीवन शर्मा को मैदान में उतारा, जिन्होंने राम लहर के बीच चुनाव जीत लिया।

25 साल का इंतजार और 2014 में बड़ी जीत
1989 की हार के बाद भगत सिंह कोश्यारी को लोकसभा पहुंचने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। पूरे 25 वर्षों बाद, 72 वर्ष की उम्र में, 2014 में मोदी लहर के दौरान उन्होंने नैनीताल-ऊधम सिंह नगर सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। यह जीत उनके लंबे राजनीतिक संघर्ष और धैर्य का प्रतीक बनी।

सम्मान के साथ राजनीतिक विरासत को मिली नई पहचान
पद्मभूषण सम्मान के साथ भगत सिंह कोश्यारी की राजनीतिक यात्रा और योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। संगठन, सरकार और संवैधानिक पदों पर रहते हुए उनकी भूमिका अब देश के इतिहास में सम्मान के साथ दर्ज हो गई है।

 

---------------------------------------------------------------------------------------------------