कल खेल में हम हों न हों.. : अतुल मलिकराम

हाल ही में महज़ 53 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने की वजह से दुनिया को अलविदा कहने वाले बेहतरीन गायक और शानदार शख्सियत ‘केके’, बीते वर्ष 40 वर्षीय परफैक्टली फिट नजर आने वाले अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला और कन्नड़ फिल्मों के सुपरस्टार 46 वर्षीय पुनीत राजकुमार कुछ ऐसे नाम हैं, जो मेरे ज़हन में इतनी गहराई से उतर गए हैं कि अब जिंदगी पर विश्वास कुछ कम ही रह गया है। दिल में एक अजीब-सी बैचेनी बार-बार घर कर जाती है, कि शरीर से तंदुरुस्त दिखने वाली इन शख्सियतों की जिंदगियों में मौत आखिर इतनी जल्दी दस्तक कैसे दे गई। हालाँकि आम जिंदगी में ऐसा कई लोगो के साथ होता होगा, जब वे यह कहने को मजबूर हो जाते होंगे कि फलां आदमी कल तक तो एकदम ठीक था, वो दुनिया को छोड़कर कैसे जा सकता है..

अर्थी पर रखे उनके हजारों अधूरे सपने और परिवार के सामने आखिरी साँसें न ले पाने की पीड़ा.. उफ्फ.. मेरे मन पर रखी हुई टन भर की चट्टान ने उन दिनों को कुरेदकर जख्मी कर दिया, जब दादी-नानी एक स्वस्थ और लम्बी आयु जी लेने के बाद भगवान को याद करती हुईं परलोक सिधारने की इच्छा रखती थीं। उनके कमरे के किसी कोने में बरसों से धुल खाता पड़ा हुआ लकड़ी का संदूक आज भी मेरे ज़हन में है, जब पूरे परिवार को अपने पास बैठाकर पोते को अपने हाथों से बनाया हुआ गुलुबंद, बड़ी बहु को करधनी, छोटी को बाजूबंद, नाचने की शौकीन पोती को रुनझुन करती हुईं पैजनियाँ जिस प्यार से वो दिया करती थीं, सच मानों, तो करोड़ों की मलकियत भी उसके आगे फीकी ही थी। उम्र का लम्बा पड़ाव पार करने के बाद काँपते हुए शरीर के साथ कमर में चौकस प्रिंट वाले सालों पुराने रुमाल में खुसी उस चाबी से संदूक का ताला खोलते समय उनके जेठ के बड़े बेटे की बहु की बेटी के कन्यादान में पैर पुजाई के लिए देने वाला हार भी उन्हें अच्छे से याद होता था।

वह गीता का सोलहवाँ अध्याय, सिरहाने बैठे सभी बच्चे और पोते-पोतियाँ, भरे-पूरे परिवार के सामने दम तोड़ने की इच्छा कितनी सुकून भरी होती होगी! बच्चों को सारी जिम्मेदारियाँ सौंप कर चार धाम की यात्रा और गौदान का संकल्प भी हमारे घर के बुजुर्ग होश रहते ले लिया करते थे। आज जब दुनिया की चका-चौंध की इस भूलभुलैया में लोगों को भटकते हुए देखता हूँ, तो पाता हूँ, वह सुकून अब कहाँ? वो पैजनियाँ, वो करधनी अब कहाँ? वो संदूक और वह लम्बी-पूरी उम्र अब कहाँ?
आजकल मृत्यु का पैटर्न बदल गया है। अब मृत्यु गीता का सोलहवाँ अध्याय सुनने-सुनाने का सुअवसर नहीं देती। अब बेटे-बहू के सामने हँसते-बतियाते हुए जाने की साध पूरी होती देखने में नहीं आती। बहुत से लोग तो इतनी युवावस्था में जा रहे हैं कि बहू, दामाद, नाती, पोतों जैसे सुखों का आनंद, चाँद छूकर आने जैसा सपना बनकर रह गया है। आजकल मौत, जिंदगी से इतनी नाराज़ चल रही है कि आखिरी बार परिवार वालों से मिलने का मौका भी नहीं दे रही। मन फिर केके, सिद्धार्थ और पुनीत की हकीकत को याद करके भर आया। जीवन ने इन्हें इतना मौका भी नहीं दिया कि माता-पिता, पत्नी, दोस्तों से आखिरी बार अपने मन की कुछ साध कह लेते। न ही दो चार दिन बीमार ही पड़े रहे कि कुछ आभास हो जाता।

सोचता हूँ कि भाग-दौड़ करके, खुद के सुखों और इच्छाओं को भूलकर कमाया गया पैसा आखिर किस काम का, जब एक बार मिलने वाली जिंदगी भी सुकून से न जी जा सके। उम्र कम हो या अधिक, अंत में साथ सिर्फ और सिर्फ व्यवहार ही जाना है, तो क्यों न सभी से हँसकर मिला जाए। आपसे भी आग्रह ही है कि मन में पल रहे गीले-शिकवों को घर की देहलीज पर ही झटककर अंदर आएँ; आज की बात को आज ही खत्म कर दें; जिससे भी मिलें, प्यार से ही मिलें; आज की गलतियों को आज ही माफ करते चलें; अपने ख्वाबों को कल के भरोसे न छोड़ें, क्योंकि उन्हें पूरा करने के लिए कल हो भी या नहीं, हम नहीं जानते; किसी से रूठकर ना बिछड़ें; किसी को रुलाकर ना सोएँ; किसी को अपमानित करके बड़प्पन ना महसूस करें; किसी को दबाकर, किसी की स्थिति का फायदा उठाकर मूँछों पर ताव ना दें; हो सकता है अपनी गलती का एहसास होने तक वह व्यक्ति हमारी माफी सुनने के लिए मौजूद ही न हो, फिर किससे माफी माँगेंगे, किसकी सुनेंगे और किससे कहेंगे..
अपना मन उदार रखें; छोटी-छोटी बातों को दिल से ना लगाएँ; चोट और धोखा बेशक किसी से ना खाएँ, लेकिन इतने तंगदिल भी ना हो जाएँ कि प्रेम के दो बोल भी हमसे सुनने के लिए हमारे संपर्क में आने वाले तरस जाएँ। ऐसे विदा हुए, तो तनी हुई भौंह और ताव वाली मूँछों में भी हमारी अंतिम तस्वीर सुंदर नहीं आएगी। विचार जरूर करिएगा, कल खेल में हम हों न हों..

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