क्या सहस्रपाद की वाकई हज़ार टांगें होती हैं

लखनऊ: सहस्रपाद (मिलीपीड) नाम के बावजूद सभी मिलीपीड के पैरों की संख्या हज़ार नहीं होती है। आम बोलचाल में इन्हें गिंजाई या कनखजूरा कहते हैं। अधिकांश प्रजातियों में पैरों की संख्या सौ से भी कम होती है। लेकिन अब, शोधकर्ताओं ने सहस्रपाद की एक ऐसी प्रजाति की खोजी है जिसके पैरों की संख्या उसके नाम से भी अधिक हो सकती है।

शोधकर्ताओं को सहस्रपाद की यह प्रजाति पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के एक रेगिस्तान में 60 मीटर गहराई में मिली है। शोधकर्ता खनन कंपनियों द्वारा अन्वेषण के लिए खोदे गए सुराखों में खास डिज़ाइन किए गए जाल (सड़ी-गली पत्तियों से भरे प्लास्टिक पाइप) डालकर गहराई में रहने वाले अकशेरुकी जीवों की खोज कर रहे थे।

इसे यूमिलीपीस पर्सेफोन नाम दिया है। यूमिलीपीस का मतलब है वास्तव में हज़ार पैरों वाली और पर्सेफोन नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं की पाताल लोक की देवी से मिला है, जो कुछ समय के लिए ज़मीन के ऊपर आती है और वसंत का आगाज़ करती है।

क्रीमी रंग का यह सहस्रपाद एक मिलीमीटर से भी कम चौड़ा और लगभग 10 सेंटीमीटर लंबा है। अपने डील-डौल में यह ज़मीन के ऊपर रहने वाले सहस्रपादों की तुलना में बहुत छरहरा है। इसके कई सारे छोटे-छोटे पैर इसे चट्टान की छोटी-छोटी दरारों से गुज़रने की शक्ति देते हैं। साइंटिफिक रिपोर्ट्स में शोधकर्ता बताते हैं कि ई. पर्सेफोन की आंखें नहीं हैं, ये अपने बड़े एंटीना की मदद से दुनिया को भांपते हैं। और संभवत: कवक इनका भोजन होता है।

शोधकर्ताओं को इस स्थल से आठ ई. पर्सेफोन मिले हैं। यदि इनके पैर गिनें तो इनमें से दो वयस्क मादाएं ही सच्ची सहस्रपाद हैं; दो वयस्क नरों के पैरों की अधिकतम संख्या 778 और 818 है। दरअसल, किसी भी सहस्रपाद के पैरों की संख्या बदलती रह सकती है क्योंकि आर्थ्रोपोड (संधिपाद जंतु) अपने पूरे जीवन में शरीर में अतिरिक्त खंड विकसित करते रहते हैं। ई. पर्सेफोन शरीर के खंड सिकोड़ और फैला सकता है। इससे संभवत: छोटी दरारों में फिट होने और कठिन रास्तों पर चलने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ई. पर्सेफोन सतह की जलवायु गर्म और शुष्क होने के काफी पहले भूमिगत हो गए थे।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... ------------------------- ------------------------------------------------------ -------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------- --------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------   ----------------------------------------------------------- -------------------------------------------------- -----------------------------------------------------------------------------------------
----------- -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper