रातभर पवित्र तीर्थों के जल से कराया गया स्नान, ऐसे दी जाएगी समाधि

नरसिंहपुर: जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद पार्थिव शरीर को देश के विभिन्न तीर्थों के पवित्र जल से स्नान कराया गया। वैदिक मंत्रोपचार के साथ रात भर यह क्रिया चलती रही। वही अंतिम दर्शन और समाधि कार्यक्रम में शामिल होने उनके शिष्यों-भक्तों के पहुंचने का सिलसिला रात भर जारी रहा। आज शाम 5 बजे परमहंसी गंगा आश्रम में विधि विधान से समाधि दी जाएगी। काशी और ऋषिकेश से विद्वान संत भी पहुंचे हैं।

पार्थिव शरीर का पवित्र जल से स्नान
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के पार्थिव शरीर को झोतेश्वर के मणिद्वीप आश्रम से भगवती मंदिर के नीचे गंगा कुंड तक ले जाया गया था। महाराजश्री को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। राम-धुन और संकीर्तन के बाद रात भर देश के पवित्र तीर्थों के जल से पार्थिव शरीर को स्नान कराने कराया गया। सनातन धर्म में अलग-अलग परम्पराओं के साधु-संतों को दी जाने वाली समाधि के पहले इस धार्मिक क्रिया को अपनाया जाता हैं।

आश्रम की परिक्रमा के बाद पूजा-अर्चना
परमहंसी गंगा आश्रम के स्वामी अचलानंद के मुताबिक स्वामीजी के पार्थिव शरीर को आश्रम की परिक्रमा कराई जाएगी। इसके बाद संत परंपरा के मुताबिक पूजन अर्चन का कार्यक्रम होगा। विधि विधान से पार्थिव देह को समाधि स्थल ले जाया जाएगा। आश्रम प्रबंधन ने समाधि कार्यक्रम की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। इस दौरान देशभर से सैकड़ों संत मौजूद रहेंगे। जिन मार्गों से आश्रम की परिक्रमा कराई जाएगी, वहां विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं।

आश्रम के शास्त्री, काशी विश्वनाथ के विद्वान दिलाएंगे समाधि
बताया गया कि महाराजश्री के इस समाधि कार्यक्रम को संपन्न कराने काशी विश्वनाथ से विद्वान आचार्य पुरोहित भी पहुंचे हैं। परमहंसी गंगा आश्रम के शास्त्री रविशंकर महाराज के सानिध्य में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वतीजी को समाधि दी जाएगी। उन्हें हिंदुओं का सबसे बड़े गुरु का दर्जा दिया गया था। सनातन धर्म विकास के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए उन्होंने शंकराचार्य परंपरा का पालन किया।

किसे दी जाती है भू-समाधि और क्या होता है इसमें?
पौराणिक काल से संत महात्माओं ऋषि मुनियों का समाधि परंपरा का बड़ा इतिहास हैं। धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों में भी समाधि का उल्लेख हैं। ध्यान, साधना, तपस्या की शक्ति ईश्वर के सामान हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में इस शक्ति को प्राकृतिक रूप में मुक्त होने दिया जाता हैं। जानकर बताते है कि शैव, नाथ, दशनामी, अघोर और शाक्त परंपरा के साधु सन्यासी संतों को भू-समाधि दी जाती हैं। जिसमें पद्मासन सिद्धि आसान की मुद्रा में बिठाकर जमीन में दफनाया जाता हैं। गुरु की समाधि के नजदीक या मठ आश्रम में ही संतों को समाधि देने परंपरा हैं। इसी तरह शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को भी उनकी संत परंपरा के हिसाब से आश्रम में ही समाधि दी जा रही हैं।

स्वरूपानंद सरस्वती के लाखों अनुयायी
ज्योतिष और द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का व्यक्त्तिव बड़ा प्रतापी रहा। उनकी शरण में आया हर व्यक्ति आज किसी न किसी रूप में स्मरण जरुर कर रहा हैं। उनसे दीक्षा लेने शिष्यों को इस दुखद खबर से सबसे ज्यादा आघात पहुंचा हैं। देश भर में सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और विकास के लिए जो पताका स्वामी स्वरूपानंद महाराज ने लहराई, उसके लाखों लोग मुरीद थे।

 

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