साइनेस इंटरनेशनल आर्ट गैलरी एवं द सेंट होटल के संयुक्त तत्वावधान में पाँच समकालीन कलाकारों की समूह चित्रकला प्रदर्शनी आयोजित की गई
इस प्रदर्शनी में वडोदरा के अमरनाथ शर्मा एवं अमितेश वर्मा तथा दिल्ली के संबित पांडा, उमा शंकर पाठक एवं शत्रुसोवन बंदरूई की कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं।
प्रदर्शनी में कुल 30 कलाकृतियाँ शामिल हैं, जिनमें कैनवास पर निर्मित ऐक्रेलिक एवं ऑयल पेंटिंग्स प्रमुख हैं। प्रत्येक कलाकृति में ऐसे जीवंत एवं विचारोत्तेजक अवधारणाओं का समावेश है, जो दर्शकों के दृष्टिकोण को नई गहराई प्रदान करती हैं।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यह प्रदर्शनी पारंपरिक चौकोर या गोलाकार कैनवास की स्थापित सीमाओं से अलग एक विशिष्ट कलात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। कलाकारों ने अपने विचारों को दृश्य रूप देने और उन्हें प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए कैनवास के विभिन्न एवं अनूठे स्वरूपों का प्रयोग किया है।
प्रदर्शनी का उद्घाटन शनिवार, 19 सितंबर 2026 को शाम 5 बजे दीप प्रज्वलन समारोह के साथ हुआ। समारोह की अध्यक्षता मुख्य अतिथि एवं लखनऊ के प्रतिष्ठित वरिष्ठ वास्तुकार श्री अशेष श्रीवास्तव ने की।
यह प्रदर्शनी 27 सितंबर 2026 तक प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से शाम 7 बजे तक दर्शकों के लिए खुली रही।
उद्घाटन समारोह में अन्य विशिष्ट अतिथियों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें उद्यमी एवं फिल्म निर्माता श्री सर्वेश गोयल, वरिष्ठ वास्तुकार श्रीमती सविता अग्रवाल, पद्म भूषण से सम्मानित एवं संपादक सुश्री पूर्णिमा वर्मन तथा द सेंट होटल के महाप्रबंधक श्री भगवती पंत प्रमुख रूप से शामिल रहे।
साइनेस इंटरनेशनल आर्ट गैलरी के स्वामी श्री राकेश कुमार मौर्य ने मीडिया को संबोधित करते हुए प्रदर्शनी की संकल्पना, उद्देश्य एवं कलात्मक दृष्टिकोण के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की।
अमरनाथ शर्मा
अमरनाथ शर्मा का संबंध बढ़ई परिवार से है और उनका बचपन एक छोटे से गाँव में बीता। वे गर्मियों की छुट्टियाँ अपने दादा के साथ बिताते थे, जहाँ उन्होंने विभिन्न प्रकार की लकड़ियों के बारे में जाना। उनके लिए लकड़ी एक जीवंत अस्तित्व का अनुभव कराती है।
हिंदू परंपरा में लकड़ी को जीवनभर के साथी के रूप में देखा जाता है। इसका उपयोग घरों के निर्माण से लेकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों तक में किया जाता है। लकड़ी एक नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है, प्रदूषण को कम करने में सहायक है और मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती है। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी सकारात्मक प्रभाव रखती है तथा विश्वभर में लाखों लोगों की आजीविका का आधार है।
व्यावहारिक, परिचित और सौंदर्यपूर्ण होने के साथ-साथ लकड़ी अमरनाथ के लिए जीवन का प्रतीक है। यह मनुष्य को प्रकृति और अस्तित्व से जोड़ने वाली एक कड़ी है। लकड़ी को काटने पर उभरने वाले प्राकृतिक पैटर्न उनके लिए महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें वे अपनी कला में रूपकों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका कलात्मक कार्य मानव जीवन और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों की पड़ताल करता है। वे भावनाओं को व्यक्त करने के लिए दृश्यात्मक माध्यमों का प्रयोग करते हैं और उनकी कलात्मक साधना में लकड़ी एक केंद्रीय तत्व के रूप में उपस्थित रहती है।
अमितेश वर्मा
अमितेश वर्मा का कला-केंद्र मानवीय अनुभव है। वे घोड़ों और मानव शरीर की सूक्ष्म एवं गहन शारीरिक संरचना संबंधी अध्ययनों के लिए जाने जाते हैं। कैनवास पर उनके ऑयल और चारकोल माध्यम में किए गए कार्य उनकी कला के प्रति गहन समर्पण को दर्शाते हैं। इसकी जड़ें उनके बचपन से ही चित्रांकन के प्रति विकसित हुए जुनून में हैं।
उन्होंने वर्ष 1999 से 2008 के बीच दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट में अध्ययन किया। घोड़ों की शारीरिक संरचना का गहन अध्ययन करने के लिए उन्होंने दिल्ली रेस कोर्स में भी समय बिताया और अपने अध्ययन को अधिकतम करने के उद्देश्य से वहीं रुककर कार्य किया। इस गहन अभ्यास का परिणाम उनकी कलाकृतियों में दिखाई देने वाली असाधारण शारीरिक सटीकता के रूप में सामने आया।
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वर्तमान में नई दिल्ली में रहने वाले अमितेश वर्मा अपनी कलात्मक साधना और देश-विदेश में आयोजित प्रदर्शनों के माध्यम से समकालीन कला परिदृश्य को समृद्ध कर रहे हैं।
संबित पांडा
संबित पांडा का कलात्मक कार्य पर्यावरणीय मूल्यों और परंपराओं पर केंद्रित है। वे शहरीकरण और जीवित प्राणियों के बीच बदलते संबंधों पर विचार करते हैं। उनकी एक श्रृंखला में मनुष्यों की अनुपस्थिति में विभिन्न जीव-जंतुओं को प्रस्तुत किया गया है, जो दर्शक के साथ एक संवाद स्थापित करती है और स्थापित मूल्यों को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास करती है।
वे अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति में असामान्य एवं प्रभावशाली दृश्य-छवियों का प्रयोग करते हैं। उनका कला-अभ्यास पारिस्थितिक चेतना के साथ-साथ पीढ़ियों से विरासत में मिले मूल्यों पर भी विचार करता है। उनका कार्य प्रकृति और समकालीन शहरी जीवन के बीच बदलते संबंधों की पड़ताल करता है, जिसे वे महानगरीय एवं बहुसांस्कृतिक परिवेश से प्राप्त अनुभवों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं।
शत्रुसोवन बंदरूई
शत्रुसोवन बंदरूई अपनी चित्रकला में स्मृति, मिथक, पारिस्थितिकी और गहन कालबोध को एक साथ पिरोते हैं। वे इतिहास को पारंपरिक कालक्रम में देखने की धारणा से अलग हटकर ऐसी दृश्य दुनिया रचते हैं, जहाँ जीवाश्म उन प्रजातियों के साथ संवाद करते दिखाई देते हैं जो अभी अस्तित्व में भी नहीं आई हैं।
उनकी कृतियों में विलुप्त जीव कभी-कभी भूत-प्राय साक्ष्यों के रूप में पुनः उपस्थित होते हैं। उनका कला-संसार पारिस्थितिक क्षति के अनुभव से उभरता है। विशेष रूप से, वे हैदराबाद के शहरी विस्तार की ओर संकेत करते हैं, जिसने जंगलों के विनाश और वन्यजीवों के विस्थापन को जन्म दिया है।
भूकंप, टेक्टोनिक दरारें और संकर जीवन-रूप उनके कार्यों में रूपकों के रूप में उपस्थित होते हैं। इनके माध्यम से वे अस्तित्व, संघर्ष और प्रकृति के विरुद्ध होने वाली अदृश्य हिंसा को अभिव्यक्त करते हैं।
बंदरूई चमकीले और बेचैन कर देने वाले रंगों—जैसे इलेक्ट्रिक पिंक और विषैले नीले—का प्रयोग करते हैं। इन रंगों से वे ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं, जहाँ सुंदरता और विनाश एक साथ मौजूद दिखाई देते हैं।
कैनवास और कागज़, दोनों माध्यमों में कार्य करते हुए, वे ड्रॉइंग को एक प्रकार की दृश्य कविता के रूप में देखते हैं। उनकी प्रत्येक रेखा और प्रत्येक चिह्न संभावित जीवन की एक काल्पनिक पांडुलिपि का हिस्सा बन जाता है।
उमाशंकर पाठक
उमाशंकर पाठक अपनी कला में शहरी और ग्रामीण जीवन के दृश्यों को एक साथ प्रस्तुत करते हैं। उनकी कृतियों में शहर और गाँव के जीवन के बीच का तनाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। स्ट्रीट लाइट और हल के फाल जैसे प्रतीक उनके लिए “हर चीज़ में कुछ नहीं” की अवधारणा को व्यक्त करते हैं।
यह दृष्टिकोण उनके स्वयं के प्रवासी जीवन-अनुभव से जुड़ा हुआ है—एक ऐसा सफर, जिसमें वे कृषि की दुनिया से निकलकर अपने सपनों की तलाश में आगे बढ़े।

