2047 का भारत हरा, केसरिया और सिमटती सफ़ेद पट्टी भारत के भविष्य की चेतावनी – डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

भारत जब 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव का उत्सव नहीं मना रहा
होगा, बल्कि अपने सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विकास का गहन आत्ममंथन भी कर रहा होगा। 2047 कोई
दूर की तारीख़ नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें आज की प्रवृत्तियाँ जैसे हमारी भाषा, हमारे राजनीतिक निर्णय और
हमारे सामाजिक व्यवहार, स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होंगी। यह लेख किसी आशंका को बढ़ाने या किसी की भावनाओं
को आहत करने का प्रयास नहीं है; बल्कि यह एक विवेकपूर्ण चेतावनी है कि यदि वर्तमान रुझानों पर गंभीरता से
विचार नहीं किया गया, तो भारत की सबसे बड़ी शक्ति यानी उसकी 'सामाजिक शांति और विविधता' दबाव में आ
सकती है।

हाल के वर्षों में सार्वजनिक विमर्श अधिक भावनात्मक और पहचान-प्रधान हो गया है। राजनीति, मीडिया और
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में विचारों की जगह प्रतीकों और नारों ने ले ली है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि पहचान
मनुष्य को सुरक्षा और अपनापन देती है। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब पहचान संवाद का माध्यम बनने के
बजाय टकराव का कारण बन जाए। भारत जैसे विविध समाज में यह संतुलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
हिंदू समाज के भीतर सांस्कृतिक आत्मविश्वास का उभार पिछले कुछ दशकों से देखा जा रहा है। अनेक लोगों के लिए
यह अपनी परंपराओं, इतिहास और सभ्यता पर गर्व की अभिव्यक्ति है। यह भावना स्वाभाविक और वैध है। साथ ही,
मुस्लिम समुदाय सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के भीतर भी अपनी पहचान, सुरक्षा और प्रतिनिधित्व को लेकर
सजगता बढ़ी है। यह भी उतना ही मानवीय और समझने योग्य है। समस्या इन भावनाओं में नहीं, बल्कि उस
राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में है जो इन्हें परस्पर संवाद के बजाय प्रतिस्पर्धा में बदल देता है।
जब 'हम' और 'वे' की भाषा सार्वजनिक जीवन में हावी हो जाती है, तब लोकतंत्र की मूल भावना यानी सह-अस्तित्व'
धीरे-धीरे संकुचित होने लगती है। असहमति, जो लोकतंत्र का प्राण है, यदि सम्मान और संवेदनशीलता से रहित हो
जाए, तो वह समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करती है। शांति का क्षरण अक्सर अचानक नहीं होता; वह भाषा
के कठोर होने, नीतियों के असंतुलित दिखने और व्यवहार में बढ़ती असहिष्णुता से धीरे-धीरे आकार लेता है।
राष्ट्रीय प्रतीकों का अर्थ भी इसी सामाजिक चेतना से जुड़ा होता है। तिरंगा केवल रंगों का संयोजन नहीं है; वह शक्ति,
समृद्धि और शांति के संतुलन का प्रतीक है। केसरिया साहस और त्याग का, हरा विकास और जीवन का, और सफ़ेद
शांति व सत्य का प्रतिनिधित्व करता है। यदि सामाजिक विमर्श में संघर्ष और पहचान के रंग अत्यधिक गाढ़े हो जाएँ
और संवाद व संयम की जगह कम होती जाए, तो यह संतुलन प्रतीकात्मक रूप से भी कमजोर पड़ सकता है। यह कोई
संवैधानिक परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय चेतना में आने वाला सूक्ष्म बदलाव होगा, जो समय के साथ गहरा
असर डाल सकता है।

डिजिटल युग ने इस प्रक्रिया को और तेज़ किया है। तेज़ प्रतिक्रियाएँ, भावनात्मक संदेश और एल्गोरिदम-आधारित
सामग्री अक्सर संयम की बजाय उत्तेजना को बढ़ावा देती हैं। राजनीति के लिए यह तात्कालिक लाभ का माध्यम बन
सकता है, लेकिन समाज के लिए दीर्घकालिक चुनौती भी साबित हो सकता है। परिणामस्वरूप, शांति सक्रिय सह-
अस्तित्व के बजाय एक नाजुक, तनावपूर्ण संतुलन में बदल सकती है, जो कभी भी टूट सकता है।
फिर भी, मैं इस लेख के माध्यम से किसी अनिवार्य भविष्य की घोषणा नहीं करता। भारत के पास एक सशक्त
संविधान है, स्वतंत्र संस्थाएँ हैं और विविधताओं को समेटने की ऐतिहासिक क्षमता भी है। भारत का लोकतंत्र कई
कठिन दौरों से गुज़रा है और हर बार उसने स्वयं को पुनर्संतुलित किया है। आज भी वही संभावना मौजूद है, यदि
विवेक को प्राथमिकता दी जाए तो।
इस दिशा में कुछ मूलभूत स्तंभ निर्णायक होंगे। गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा, निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय,
आर्थिक अवसरों की समान पहुँच और संघीय सहयोग, ये ऐसे तत्व हैं जो पहचान-आधारित तनाव को स्वाभाविक रूप
से कम करते हैं। इतिहास और संस्कृति की शिक्षा का उद्देश्य किसी एक समुदाय का गौरव बढ़ाना नहीं, बल्कि साझा
विरासत को समझाना होना चाहिए। मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, मतलब उत्तेजना नहीं, संदर्भ देना;
विभाजन नहीं, समझ पैदा करना।
2047 का भारत कैसा होगा, यह पहले से तय नहीं है। यह भविष्य आज लिखे जा रहे निर्णयों, चुनी जा रही भाषाओं
और अपनाए जा रहे व्यवहारों से बनेगा। नागरिक के रूप में यह हम पर निर्भर करता है कि हम भय और आवेश के
आधार पर चुनाव करते हैं या विवेक और दूरदृष्टि का रास्ता चुनते हैं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह
मतभेदों को सह सके, न कि उन्हें मिटाने की कोशिश करे।
यदि आने वाले वर्षों में शांति, संवाद और मर्यादा यानी तिरंगे की 'सफ़ेद पट्टी' को मज़बूत किया गया, तो विविधता
भारत की शक्ति बनी रहेगी। लेकिन यदि उसे उपेक्षित किया गया, तो सामाजिक संतुलन कमजोर पड़ सकता है। अंत
में मैं इतना ही कह सकता हूँ कि भारत अपनी सबसे बड़ी विरासत यानी सह-अस्तित्व को समझे, सहेजे और आगे
बढ़ाए। 2047 का उत्सव तभी सार्थक होगा, जब भारत न केवल आर्थिक रूप से सशक्त, बल्कि सामाजिक रूप से
संतुलित और नैतिक रूप से परिपक्व राष्ट्र के रूप में खड़ा हो।

