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बीबीएयू में पंचकोश आधारित शिक्षा पर राष्ट्रीय सम्मेलन, शारीरिक से आध्यात्मिक विकास तक पर हुआ मंथन

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में 14 अक्टूबर को पंचकोश आधारित शिक्षा पद्धति की प्रासंगिकता, चुनौतियों और कार्यान्वयन पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। योग विभाग और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह सम्मेलन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के उत्तर क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित है। सम्मेलन में शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास से जोड़ने पर जोर दिया गया।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। मुख्य अतिथि के रूप में विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. एच. आर. नागेंद्र उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी के साथ स्कूल ऑफ योगा, नैचुरोपैथी एंड कॉग्निटिव स्टडीज के संकायाध्यक्ष प्रो. बी.सी. यादव और कार्यक्रम संयोजक डॉ. नरेंद्र सिंह भी मंच पर मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। विश्वविद्यालय का कुलगीत प्रस्तुत किए जाने के बाद अतिथियों और शिक्षकों को तुलसी के पौधे, स्मृति चिह्न और शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रो. बी.सी. यादव ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि योग विभागाध्यक्ष डॉ. दीपेश्वर सिंह ने सम्मेलन के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी। मंच संचालन डॉ. रमेश चंद्र नैलवाल ने किया।

कुलपति बोले- भारतीय ज्ञान परंपरा से मिलेगा जीवन में संतुलन का मार्ग

कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने पंचकोश सिद्धांत को शरीर, मन और चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने वाली व्यापक अवधारणा बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित इस सिद्धांत को समझना और आधुनिक जीवन में उसकी प्रासंगिकता को अपनाना जरूरी है।

भारतीय और पश्चिमी दर्शन की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन योग, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के माध्यम से समग्र कल्याण, सहयोग और संतुलित जीवन की भावना को प्रोत्साहित करता है। उन्होंने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभावों का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों, नैतिकता और आंतरिक संतुलन को बनाए रखना भी आवश्यक है।

प्रो. मित्तल ने युवाओं से भारतीय योग संस्कृति और ज्ञान परंपरा के महत्व को समाज तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि योग और भारतीय दर्शन को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर ऐसा समाज विकसित किया जा सकता है, जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति, नैतिक चेतना और सामाजिक समरसता को समान महत्व मिले।

पद्मश्री प्रो. नागेंद्र ने समझाया पंचकोश सिद्धांत का महत्व

मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. एच. आर. नागेंद्र ने ‘तैत्तिरीय उपनिषद में पंचकोश सिद्धांत एवं शिक्षा’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने पंचकोश सिद्धांत के पांच आयामों- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के माध्यम से मानव व्यक्तित्व के समग्र विकास की अवधारणा समझाई।

उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने प्राणमय कोश की संरचना और प्राणायाम के महत्व पर चर्चा करते हुए भारतीय योग परंपरा में वर्णित 72 हजार नाड़ियों की अवधारणा का उल्लेख किया।

प्रो. नागेंद्र ने न्यूटन के गति के नियमों का उदाहरण देते हुए कहा कि विज्ञान के सिद्धांतों का संबंध प्रयोगशालाओं और तकनीकी विकास के साथ जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से भी है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुसंधान मॉडल को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, पंचकोश सिद्धांत को आधुनिक वैज्ञानिक समझ और शिक्षा प्रणाली के साथ जोड़ने से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों के विकास को बढ़ावा मिल सकता है।

डिग्री के साथ संस्कारवान नागरिक तैयार करना भी शिक्षा का उद्देश्य: डॉ. कोठारी

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव और मुख्य वक्ता डॉ. अतुल कोठारी ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा परंपरा एवं पंचकोश आधारित शिक्षण की आवश्यकता’ विषय पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को डिग्री देना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार, संवेदनशील और आदर्श नागरिक के रूप में तैयार करना भी है।

उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, सभ्यता और दर्शन को उचित स्थान देने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, पंचकोश आधारित शिक्षण पद्धति विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास को ध्यान में रखती है। इससे शिक्षा को किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय जीवनोपयोगी और मूल्यपरक बनाया जा सकता है।

डॉ. कोठारी ने सुखी और संतुलित जीवन के पांच सूत्रों- संगीत, स्वाध्याय, सेवा, संयम और सत्संग पर विशेष जोर दिया। उन्होंने शिक्षण संस्थानों से भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन मूल्यों को प्रोत्साहित करने की अपील की, ताकि विद्यार्थी ज्ञान के साथ संस्कार, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित कर सकें।

पंचकोश सिद्धांत पर बनी डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के मीडिया सेंटर द्वारा पंचकोश सिद्धांत पर तैयार डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई। इसमें पंचकोश की अवधारणा, उसके विभिन्न आयामों और मानव जीवन में उसके महत्व को प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के अंत में संयोजक डॉ. नरेंद्र सिंह ने अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

शोध पत्र प्रस्तुतियों और नई शिक्षा नीति पर भी चर्चा

सम्मेलन के दौरान विशेष व्याख्यान सत्र भी आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता शिक्षा शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही ने की। सत्र में डॉ. अतुल कोठारी और बीबीएयू की आईक्यूएसी निदेशक प्रो. शिल्पी वर्मा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं।

इसके अलावा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सह-संयोजक संजय स्वामी की अध्यक्षता में शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। ‘नई शिक्षा नीति-2020 एवं पंचकोश आधारित शिक्षण मॉडल’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने संबंधित विषय के विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल हुए।

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