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बीबीएयू में साइबर अपराधों पर बड़ा जागरूकता अभियान, डिजिटल ठगी से बचने के लिए विशेषज्ञों ने बताए जरूरी तरीके

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में शुक्रवार, 23 अक्टूबर को साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचाव को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग ने साइबर क्राइम मुख्यालय की तकनीकी टीम के सहयोग से इस कार्यक्रम का आयोजन किया। इसमें शिक्षकों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों, प्रशासनिक एवं तकनीकी कर्मियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को डिजिटल माध्यमों का सुरक्षित इस्तेमाल करने, निजी जानकारी की सुरक्षा करने और साइबर अपराधों से बचने के उपायों की जानकारी दी गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। मंच पर शैक्षणिक मामलों के अधिष्ठाता प्रो. एस. विक्टर बाबू, साइबर क्राइम मुख्यालय की तकनीकी टीम के डीएसपी मोहसिन खान, यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रो. शिशिर कुमार, कंप्यूटर विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग के अध्यक्ष और कार्यक्रम संयोजक प्रो. धीरेन्द्र पाण्डेय तथा साइबर सेल के आशीष पाण्डेय और रिषभ कौशिक मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके की गई। इसके बाद विश्वविद्यालय के कुलगीत का गायन हुआ और मंचासीन अतिथियों का स्वागत किया गया। डॉ. मंगलदीप गुप्ता ने उपस्थित लोगों का स्वागत किया, जबकि प्रो. शिशिर कुमार ने कार्यक्रम के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी। इसके बाद उत्तर प्रदेश साइबर सेल के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने साइबर सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखी।

डिजिटल तकनीक के साथ सतर्कता भी जरूरी: कुलपति

कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन लेन-देन ने भारत में आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों को गति देने के साथ लोगों के जीवन को आसान बनाया है। हालांकि, तकनीक के सकारात्मक पहलुओं के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। ऐसे में इसका इस्तेमाल सोच-समझकर करना और संभावित खतरों के प्रति जागरूक रहना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि साइबर अपराधी कई बार लोगों की भावनाओं, लालच, दबाव और जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। इसलिए किसी भी ऑनलाइन प्रस्ताव या डिजिटल गतिविधि में शामिल होने से पहले उसके संभावित परिणामों और जोखिमों पर विचार करना चाहिए। मानसिक रूप से सतर्क रहकर और बिना सत्यापन के किसी प्रलोभन में आए बिना साइबर ठगी से बचने की संभावना बढ़ाई जा सकती है।

कुलपति ने साइबर अपराध के पीड़ितों को समय पर सहायता और उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी व्यवस्था की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश सरकार के साइबर सेल के साथ समझौता ज्ञापन करने की दिशा में प्रयास करना चाहेगा। इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों को साइबर सुरक्षा की व्यावहारिक जानकारी देना, इस क्षेत्र में उनकी समझ विकसित करना और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े शोध को प्रोत्साहित करना होगा। इसके जरिए विद्यार्थी समाज में भी साइबर जागरूकता बढ़ाने में योगदान दे सकेंगे।

साइबर सुरक्षा हर नागरिक की जिम्मेदारी: प्रो. एस. विक्टर बाबू

प्रो. एस. विक्टर बाबू ने कहा कि मौजूदा समय में साइबर अपराधी विभिन्न डिजिटल माध्यमों से लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजी जानकारी, बैंकिंग विवरण और ऑनलाइन गतिविधियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पहले लोग अपने घर खुले छोड़कर भी निश्चिंत रहते थे, लेकिन समय के साथ सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ाना जरूरी हो गया है। इसी तरह डिजिटल दुनिया में भी लापरवाही नुकसान का कारण बन सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी विशेषज्ञों का विषय नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। जागरूकता और सावधानी के साथ डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करके कई तरह के साइबर अपराधों से बचा जा सकता है।

फर्जी लिंक, डिजिटल अरेस्ट और केवाईसी के नाम पर ठगी से रहें सावधान

साइबर क्राइम मुख्यालय की तकनीकी टीम के मोहसिन खान ने बताया कि जल्दबाजी, जागरूकता की कमी और लालच के कारण लोग साइबर ठगी का शिकार बन रहे हैं। ठग आकर्षक प्रस्तावों, फर्जी लिंक, डिजिटल अरेस्ट की धमकी, ऑनलाइन निवेश योजनाओं, केवाईसी अपडेट और बैंकिंग से जुड़े झांसे के जरिए लोगों को निशाना बनाते हैं।

उन्होंने लोगों को सलाह दी कि वे अपने बैंकिंग पासवर्ड, ओटीपी, पिन और अन्य गोपनीय जानकारियां किसी के साथ साझा न करें। अनजान लिंक पर क्लिक करने, संदिग्ध फोन कॉल पर भरोसा करने और बिना सत्यापन के ऑनलाइन भुगतान करने से भी बचना चाहिए।

मोहसिन खान ने साइबर अपराधों की जांच में पुलिस की भूमिका के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि पुलिस शिकायतों की जांच करने, डिजिटल साक्ष्य जुटाने, आरोपियों की पहचान करने और धोखाधड़ी से जुड़े बैंक खातों एवं लेन-देन की जानकारी प्राप्त करने का काम करती है। इसके साथ ही पीड़ितों की मदद के लिए संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय भी किया जाता है।

ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी होने पर 1930 पर करें संपर्क

साइबर सेल के आशीष पाण्डेय ने वित्तीय धोखाधड़ी के विभिन्न तरीकों की जानकारी देते हुए बताया कि साइबर अपराधी फर्जी कॉल, संदिग्ध लिंक, ऑनलाइन भुगतान और बैंकिंग संबंधी जालसाजी के जरिए लोगों की आर्थिक जानकारी का दुरुपयोग कर सकते हैं।

उन्होंने राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी का शिकार होने पर तुरंत इस नंबर पर संपर्क करना चाहिए। समय रहते शिकायत करने से संबंधित लेन-देन पर आवश्यक कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है।

उन्होंने नागरिक-केंद्रित सेवाओं, साइबर स्वच्छता केंद्र, साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था और धोखाधड़ी की राशि वापस दिलाने से संबंधित मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल के बारे में भी जानकारी दी। प्रतिभागियों को बताया गया कि साइबर ठगी की स्थिति में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया की जानकारी होना और बिना देरी के उचित माध्यम से मदद मांगना महत्वपूर्ण है।

डेटा सुरक्षा से लेकर साइबर कानूनों तक दी गई जानकारी

कार्यक्रम के दौरान उभरते साइबर खतरों, ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा सुरक्षा, व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता, ईमेल और सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल तथा साइबर कानूनों जैसे विषयों पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया और उपलब्ध निवारण तंत्र के बारे में भी जानकारी साझा की।

प्रतिभागियों को संदिग्ध संदेशों और लिंक से सावधान रहने, निजी एवं वित्तीय जानकारी सुरक्षित रखने और डिजिटल मंचों का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने के उपाय बताए गए। विशेषज्ञों के साथ संवाद के जरिए उपस्थित लोगों को साइबर सुरक्षा से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं को समझने का अवसर मिला।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. धीरेन्द्र पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, प्रशासनिक एवं तकनीकी कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।

 

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