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मकर संक्रांति पर सूर्यदेव को खिचड़ी का भोग और तिल दान की परंपरा के पीछे छिपा है गहरा धार्मिक और पौराणिक रहस्य

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Makar Sankranti Khichdi And Til Katha : मकर संक्रांति का पर्व आज 14 जनवरी, बुधवार को पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन सूर्यदेव के उत्तरायण होने के साथ ही खरमास का भी समापन हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति पर स्नान, दान और ध्यान करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और सूर्य उपासना का विशेष महत्व बताया गया है।

मकर संक्रांति पर सूर्यदेव को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और तिल से बनी चीजें प्रसाद के रूप में चढ़ाकर श्रद्धालुओं में बांटी जाती हैं। गुड़ और तिल से बने लड्डू, गजक और रेवड़ी इस दिन विशेष रूप से बनाए जाते हैं। यह परंपरा केवल सामाजिक नहीं बल्कि गहरी पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। आइए विस्तार से जानते हैं कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी और तिल खाने की परंपरा कैसे और क्यों शुरू हुई।

मकर संक्रांति पर स्नान, दान और सूर्य पूजा का महत्व
मकर संक्रांति का त्योहार हर वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तरायण काल को देवताओं का दिन कहा गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि मकर संक्रांति के दिन किया गया स्नान, दान और ध्यान कई गुना पुण्य फल देता है। इसी कारण इस दिन सूर्यदेव की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें खिचड़ी का भोग अर्पित किया जाता है।

मकर संक्रांति पर तिल खाने की पौराणिक कथा
श्रीमद्भागवत और देवी श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार, शनिदेव का अपने पिता सूर्यदेव से वैर भाव था। इसका कारण यह बताया गया है कि सूर्यदेव अपनी पत्नी छाया के साथ भेदभाव करते थे और अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज को अधिक महत्व देते थे। इस व्यवहार से आहत होकर सूर्यदेव ने छाया और उनके पुत्र शनि को स्वयं से दूर कर दिया। इससे क्रोधित होकर शनि और माता छाया ने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग होने का श्राप दे दिया।

जब यमराज ने अपने पिता सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से पीड़ित देखा तो उन्होंने कठोर तपस्या शुरू कर दी। यमराज की तपस्या से सूर्यदेव रोगमुक्त हो गए। इसके बाद शनिदेव और माता छाया के व्यवहार से क्रोधित होकर सूर्यदेव ने शनि महाराज के घर ‘कुंभ’ यानी उनकी राशि को जला दिया। इससे शनि और उनकी माता को अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ा।

काले तिल से हुई शनि की पूजा और मिला वरदान
यमराज की विनती पर सूर्यदेव शनि के घर कुंभ पहुंचे, जहां सब कुछ भस्म हो चुका था। उस समय शनि महाराज के पास केवल काले तिल ही शेष बचे थे। शनि महाराज ने उन्हीं तिलों से सूर्यदेव की पूजा की। इस पूजा से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने शनिदेव को वरदान दिया कि जब-जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे, तब-तब शनि का घर धन-धान्य से भर जाएगा।

मान्यता है कि तिल से पूजा करने के कारण ही शनिदेव को दोबारा वैभव प्राप्त हुआ। इसी वजह से शनिदेव को तिल अत्यंत प्रिय माने जाते हैं और मकर संक्रांति पर तिल से सूर्य और शनिदेव की पूजा की जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन काले तिल से सूर्यदेव की पूजा करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं, आरोग्य की प्राप्ति होती है और शनि के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है।

मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा
मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा के पीछे शिवजी के अवतार माने जाने वाले बाबा गोरखनाथ की कथा जुड़ी हुई है। मान्यता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को लगातार संघर्ष करना पड़ता था, जिसके कारण उन्हें भोजन पकाने का समय नहीं मिल पाता था। इस वजह से योगी कमजोर होने लगे थे और कई बार भूखे रह जाते थे।

इस समस्या का समाधान निकालते हुए बाबा गोरखनाथ ने योगियों को दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन जल्दी पक जाता था, स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी था। इसके सेवन से योगियों को तुरंत ऊर्जा मिलने लगी। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम ‘खिचड़ी’ रखा।

इसके बाद गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ मंदिर के पास मकर संक्रांति पर खिचड़ी मेले की शुरुआत हुई। यह मेला कई दिनों तक चलता है, जिसमें बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है और श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। तभी से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने की परंपरा चली आ रही है।

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