तंबाकू रेगुलेशन रूट पर पॉलिसी सर्किल सेमिनार में समग्र समाधान और व्यापक उपभोक्ता विकल्पों पर वार्ता

नई दिल्ली: पूर्व वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा कि प्रभावशाली तंबाकू रेगुलेशन के लिए बेहतर नशामुक्ति केंद्रों सहित समग्र समाधान तलाशने की आवश्यकता है क्योंकि तम्बाकू बैन, इसकी तलब रखने वाले व्यक्ति को इसका सेवन करने से नहीं रोकता है। वह सोमवार को पॉलिसी सर्कल द्वारा तंबाकू रेगुलेशन पर आयोजित एक सेमिनार में उद्योग द्वारा नियोजित किसानों और श्रमिकों की आजीविका को प्रभावित किए बिना तंबाकू की खपत को कम करने में सरकार द्वारा फेस की जा रही बाधाओं पर चर्चा कर रहे थे।

इस अवसर पर पूर्व राज्यसभा सांसद राजीव गौड़ा ने कहा कि देश में तंबाकू उत्पादन को रोकना लगभग असंभव है। उन्होंने यूके और यूएस में प्रकाशित अध्ययनों का हवाला देते हुए बताया कि तम्बाकू रेगुलेशन के लिए जाना, नुकसान के रास्ते पर ही चलना है। उन्होंने 2019 में राज्यसभा में बहस के दौरान ईएनडीएस प्रतिबंध विधेयक का विरोध करने के कारणों के बारे में भी बताया।

फ्यूचर-प्रूफिंग टोबैको रेगुलेशन सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाली इस्पात मंत्रालय के पूर्व सचिव अरुणा शर्मा ने कहा कि सरकार को नीतियां बनाते समय वैज्ञानिक प्रमाणों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग तंबाकू का सेवन छोड़ने के लिए संघर्ष करते हैं, उन्हें जो संभव हो ऐसे विकल्पों के रूप में सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

भारत में सभी तंबाकू उत्पादों को सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (विज्ञापन निषेध और व्यापार व वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति तथा वितरण रेगुलेशन) एक्ट के तहत रेगुलेट किया जाता है, जो 2003 में लागू हुआ था। सीओटीपीए, सिगरेट, सिगार, बीड़ी, चबाने वाला तंबाकू और पान मसाला जैसे उत्पादों को नियंत्रित करता है। वहीं देश में ई-सिगरेट जैसे सभी प्रकार के नवीन उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध है। ईएनडीएस बैन एक्ट, ऐसे सभी उत्पादों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मानता है, न कि तंबाकू उत्पाद। यहां एक ध्यान देने योग्य विसंगति वे हीट बर्न प्रोडक्ट्स हैं, जिन्हे ई-सिगरेट के साथ बंडल किया जाता है, ऐसे में वे असल में तंबाकू प्रोडक्ट होते हैं और उन्हें कोटपा (सीओटीपीए) के तहत आना चाहिए।

नीति आयोग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ मदन गोपाल ने तंबाकू की खपत को कम करने के लिए कड़े कदम उठाने की बात कही, लेकिन यह भी स्वीकार किया प्रतिबंध, इस समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि यह प्रतिबंधित उत्पादों के लिए अवैध बाजार बनाता है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास रेगुलेशन को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

एम्स के पूर्व निदेशक डॉ एमसी मिश्रा ने कहा कि तंबाकू मुक्त दुनिया एक वास्तविक उद्देश्य नहीं है। नियमों को इस समझ के साथ बनाया जाना चाहिए कि तंबाकू के उपयोग को पूरी तरह समाप्त करना असंभव है।

इस मौके पर मशहूर वकील ललित भसीन ने कहा कि ई-सिगरेट और अन्य नए प्रोडक्ट्स पर प्रतिबंध असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि विधायिका को दी गई शक्तियां नियंत्रण करने के लिए हैं न कि प्रतिबंध लगाने के लिए। उन्होंने कहा कि कोटपा (COTPA) भी एक सक्षम कानून है जो निर्देश प्रदान करता है।

एक प्रमुख मनोचिकित्सक, निमेश देसाई ने कहा कि तंबाकू रेगुलेशन के लिए जारी प्रयासों को पैसिव स्मोकिंग के प्रतिकूल प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध जैसे कई उपाय लेकर आई है और सख्त कानून को अपनाने में सामाजिक दबाव ने भूमिका निभाई है।

अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता नीति विशेषज्ञ प्रो बेजोन कुमार मिश्रा ने एक इन्फॉर्मड कंस्यूमर चॉइस की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उपभोक्ता जानता है कि उनके लिए क्या अच्छा है या क्या बुरा और उन्हें खुद निर्णय लेने की इजाज़त दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हांगकांग और जापान जैसे विकसित देशों ने तंबाकू की खपत में गिरावट देखी है और हरम रिडक्शन ने धूम्रपान करने वालों को अन्य विकल्पों पर स्विच करने में मदद की है। उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण स्टेकहोल्डर्स-उपभोक्ताओं से परामर्श किए बिना सरकारों द्वारा एकतरफा प्रतिबंध, पूर्वाग्रह और निहित स्वार्थों से भरा हुआ है।

हालांकि नीति निर्माताओं, वरिष्ठ डॉक्टरों, वकीलों और पत्रकारों के दृष्टिकोण ने वक्ताओं के विचारों का जोरदार विरोध किया हैं। इस जीवंत बहस ने कुछ विषयों पर अलग-अलग दृष्टिकोणों को सामने रखने में मदद की है।

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