आईवीआरआई में “BASiC–2026 : भारतीय एनिमल साइंस कॉन्क्लेव एवं साइंस एक्सपो” का भव्य शुभारंभ

बरेली,02 जून। आईसीएआर–भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर में कल “BASiC–2026: भारतीय एनिमल साइंस कॉन्क्लेव एवं साइंस एक्सपो” का भव्य शुभारंभ हुआ। इस राष्ट्रीय आयोजन का संयुक्त रूप से आईसीएआर–भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर तथा विज्ञान भारती (विभा), ब्रज प्रांत द्वारा आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का मुख्य विषय “परंपरा से प्रौद्योगिकी तक : विकसित भारत@2047 के लिए जैवविज्ञान का मार्ग” रहा। इस साइंस एक्सपो में देश भर से आए 350 शोध छात्र सहित संस्थान के वेज्ञानिकों ने भाग लिया ।

उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए पद्मश्री कंवल सिंह चौहान ने कहा कि खेती तभी लाभकारी बन सकती है जब किसान केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण तथा बाजार से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ें। उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने लगभग 15 वर्ष की आयु से खेती प्रारंभ की और प्रारंभ से ही उनका उद्देश्य कृषि को अधिक लाभकारी बनाना रहा।
उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि परंपराओं में पशुधन आधारित खेती का विशेष महत्व है। गोबर एवं गोमूत्र जैसे संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग कर टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि प्रणाली विकसित की जा सकती है। प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि गोबर आधारित उन्नत जैविक खाद तथा ‘गौ कृपा अमृत’ जैसे जैविक घोलों के उपयोग से उन्हें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। इन तकनीकों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हुए उत्पादन क्षमता को बनाए रखा जा सकता है।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए आईवीआरआई के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. संजय कुमार सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के राष्ट्रीय संकल्प में पशु एवं जैव विज्ञानों की भूमिका को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच है।
उन्होंने उपस्थित वैज्ञानिकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, पशुपालकों, उद्योग प्रतिनिधियों एवं अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आज विश्व दुग्ध दिवस के अवसर पर देश के डेयरी क्षेत्र से जुड़े सभी हितधारक बधाई के पात्र हैं। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के दुग्ध क्षेत्र में लगभग 78 प्रतिशत योगदान महिलाओं का है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा तथा परिवारों की आजीविका को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि BASiC–2026 का विषय “परंपरा से प्रौद्योगिकी तक : विकसित भारत@2047 की ओर जैवविज्ञान का मार्ग” अत्यंत प्रासंगिक एवं दूरदर्शी है। यह विषय भारत की उस विकास यात्रा को प्रतिबिंबित करता है जिसमें परंपरागत ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का समन्वय कर आत्मनिर्भर, तकनीक-सक्षम तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारत का निर्माण किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि विज्ञान, संस्कृति और परंपरा को एक-दूसरे से जोड़ना समय की आवश्यकता है। भारत की अनेक पारंपरिक पशुपालन प्रणालियाँ, उपचार पद्धतियाँ तथा स्थानीय ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं। इन ज्ञान प्रणालियों का वैज्ञानिक सत्यापन कर उन्हें आधुनिक तकनीकों के साथ एकीकृत करना आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी उनसे लाभान्वित हो सकें।
उन्होंने बताया कि BASiC–2026 को विज्ञान, समाज और उद्योग के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। यह सम्मेलन प्रयोगशालाओं को खेतों से, नवाचारों को क्रियान्वयन से तथा वैज्ञानिक उत्कृष्टता को सामाजिक आवश्यकताओं से जोड़ने का कार्य करेगा। उन्होंने कहा कि किसी भी वैज्ञानिक उपलब्धि का वास्तविक महत्व तभी है जब उसका लाभ समाज तक पहुंचे और किसानों, पशुपालकों तथा ग्रामीण समुदायों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए।
उन्होंने कहा कि पशु एवं पशु चिकित्सा विज्ञान भारत के विकास परिदृश्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं क्योंकि इनका सीधा संबंध खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय स्थिरता तथा आर्थिक समृद्धि से है। इसी दृष्टि से सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल पशुधन प्रबंधन, प्रिसिजन लाइवस्टॉक फार्मिंग, आणविक निदान, अनुवादात्मक जैव विज्ञान, जलवायु-स्मार्ट पशुपालन, वन हेल्थ अवधारणा, रोग नियंत्रण तथा एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है।
उन्होंने बताया कि संस्थान को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) द्वारा ‘A++’ ग्रेड प्राप्त है। साथ ही संस्थान ने वैश्विक QS रैंकिंग में भी उल्लेखनीय स्थान अर्जित किया है। उन्होंने कहा कि BASiC–2026 का आयोजन राष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रगति के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता का विस्तार है।
डॉ. सिंह ने बताया कि देश में पशुओं के लिए विकसित अधिकांश महत्वपूर्ण टीकों के विकास में आईवीआरआई की अग्रणी भूमिका रही है। संस्थान द्वारा विकसित लगभग 50 टीकों में से कई राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रमों में उपयोग किए जा रहे हैं, जिनमें खुरपका-मुंहपका (FMD), ब्रुसेलोसिस, पीपीआर तथा क्लासिकल स्वाइन फीवर के टीके प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त रिंडरपेस्ट तथा अफ्रीकन हॉर्स सिकनेस जैसे घातक पशु रोगों के उन्मूलन में भी संस्थान ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्थान द्वारा ‘वृंदावनी’ संकर गोवंश, उन्नत सूकर नस्लों तथा हाल ही में पंजीकृत ‘रूहेलखंडी’ गोवंश जैसी महत्वपूर्ण पशुधन नस्लों का विकास भी किया गया है। आईवीआरआई 24×7 संदर्भ निदान सेवाएँ, जैविक उत्पादों की गुणवत्ता नियंत्रण सेवाएँ तथा पशु रोगों के प्रकोप की जांच एवं नियंत्रण हेतु अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराता है। संस्थान द्वारा विकसित एंटीजन एवं निदान किटों की देशभर में व्यापक मांग है।
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग के उपाध्यक्ष राजेश सेंगर ने कहा कि भारत के समग्र विकास, ऊर्जा सुरक्षा, प्राकृतिक कृषि तथा पर्यावरण संरक्षण में गौवंश की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि BASiC–2026 परंपरागत भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विश्व ऊर्जा संकट, पर्यावरणीय चुनौतियों और वैश्विक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में भारत को अपने पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर स्थायी समाधान विकसित करने होंगे। गौवंश न केवल कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है, बल्कि ऊर्जा, जैविक खाद और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संयुक्त संगठन सचिव प्रवीण रामदास ने कहा कि विज्ञान भारती का प्रमुख उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा, स्वदेशी विज्ञान तथा आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच सेतु का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक विकास को भारतीय दृष्टिकोण और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ जोड़ना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के अमृतकाल में “गुलामी की मानसिकता से मुक्ति” का आह्वान विज्ञान एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है। भारत की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत को समाज और विशेषकर युवाओं तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने भारतीय वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमन के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों के पीछे राष्ट्र के प्रति समर्पण और स्वाभिमान की भावना रही है।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट और संसाधनों के असंतुलित उपयोग जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए भारत का “प्रकृति के साथ सामंजस्य” तथा “वसुधैव कुटुम्बकम्” का दर्शन विश्व को नई दिशा दे सकता है।
विज्ञान भारती, ब्रज प्रांत के अध्यक्ष प्रो. मनोज रावत ने कहा कि विज्ञान भारती का मूल उद्देश्य स्वदेशी विज्ञान को प्रोत्साहित करना तथा भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचारों से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि यही दृष्टिकोण विकसित भारत@2047 के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
प्रो. रावत ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ज्ञान, आयुर्वेद, कृषि, प्रकृति-आधारित जीवन शैली तथा सतत विकास की समृद्ध परंपराओं का धनी रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस परंपरागत ज्ञान-संपदा को आधुनिक जैव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ समन्वित कर समाज और राष्ट्र के विकास में उपयोग किया जाए। उन्होंने कहा कि विज्ञान और परंपरा एक-दूसरे के पूरक हैं और “पुराना बनाम नया” की बजाय “पुराना प्लस नया” का मॉडल अपनाने की आवश्यकता है।
इस अवसर पर पीडीएफएमडी, भुवनेश्वर के निदेशक डॉ. आर.पी. सिंह ने कहा कि BASiC–2026 जैसे आयोजन विज्ञान, आध्यात्मिक दृष्टिकोण और राष्ट्र निर्माण की भावना को एक साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि विज्ञान भारती द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में वैज्ञानिक चिंतन के साथ भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय दृष्टिकोण का समावेश देखने को मिलता है, जो वैज्ञानिकों को समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के प्रति अधिक प्रेरित करता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) देश में पशु स्वास्थ्य एवं पशु विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी संस्थान है। वर्तमान में देश में पशु स्वास्थ्य से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां, टीके और निदान तकनीकें आईवीआरआई द्वारा विकसित की गई हैं अथवा उसके वैज्ञानिक योगदान से आगे बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत आज आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में उभर रहा है और अनेक भारतीय तकनीकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक मंचों पर भारत की पहचान एक ऐसे देश के रूप में बन रही है जो पशु स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण के क्षेत्र में अपनी स्वदेशी तकनीकों पर आधारित समाधान विकसित कर रहा है। यह आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
डॉ. सिंह ने बताया कि भारत विश्व की कुल भूमि का लगभग 2.4 प्रतिशत भाग रखता है, जबकि वैश्विक पशुधन का लगभग 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत में है। ऐसे में सीमित संसाधनों के बावजूद पशुधन क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाना और टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि और पशुधन क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।
उन्होंने खुरपका-मुंहपका (FMD) तथा पीपीआर जैसे रोग नियंत्रण कार्यक्रमों को भारत की महत्वपूर्ण सफलता की कहानियां बताते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में विकसित स्वदेशी तकनीकें भविष्य में पशुधन क्षेत्र के विकास की आधारशिला बनेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि प्रभावी टीकाकरण कार्यक्रम पशुओं में रोगों की रोकथाम के साथ-साथ एंटीबायोटिक उपयोग को कम करने में सहायक होते हैं, जिससे एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि जैसे कृषि में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी प्रकार पशुपालन में प्रभावी टीकाकरण और रोग नियंत्रण उपाय “ऑर्गेनिक एनिमल हसबैंड्री” की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने BASiC–2026 के आयोजन के लिए विज्ञान भारती, आईवीआरआई तथा आयोजन समिति को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि यह सम्मेलन वैज्ञानिक नवाचारों, स्वदेशी प्रौद्योगिकियों और विकसित भारत के लक्ष्य को गति प्रदान करेगा।
अपने व्यख्यान में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एस.पी. गौतम ने कहा कि इस अवसर पर मुख्य वक्ता प्रो. एस.पी. गौतम, पूर्व अध्यक्ष, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा पूर्व अध्यक्ष, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC), ने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रामचरितमानस, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य भारतीय धर्मग्रंथों और शास्त्रों में गहन वैज्ञानिक दृष्टिकोण निहित है। उन्होंने कहा कि इन ग्रंथों में वर्णित सिद्धांत केवल आध्यात्मिक एवं नैतिक जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, मानव कल्याण, सतत विकास तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन शैली जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के प्रभावी समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
इससे पूर्व आयोजन सचिव प्रो. राघवेन्द्र सिंह ने सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अंशुक शर्मा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन मानकीकरण विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रणव धार द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर संस्थान के संयुक्त निदेशकगण, विभागाध्यक्ष, वैज्ञानिक, शोधार्थी, विद्यार्थी, उद्योग प्रतिनिधि, स्टार्टअप उद्यमी तथा विज्ञान भारती के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट
