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लखनऊ में पांच समकालीन कलाकारों की समूह चित्रकला प्रदर्शनी, 30 कलाकृतियों में दिखे प्रकृति, स्मृति और मानवीय अनुभव के रंग

लखनऊ: सिनैप्स इंटरनेशनल आर्ट गैलरी और द सेंट्रम होटल के संयुक्त तत्वावधान में पांच समकालीन कलाकारों की समूह चित्रकला प्रदर्शनी आयोजित की गई है। प्रदर्शनी में वडोदरा के अमरनाथ शर्मा और अमितेश वर्मा तथा दिल्ली के संबित पांडा, उमाशंकर पाठक और शतद्रु सोवन बंदूरी की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं। प्रदर्शनी में कुल 30 कलाकृतियां शामिल हैं, जिनमें कैनवास पर बनाई गई ऐक्रेलिक और ऑयल पेंटिंग्स प्रमुख हैं।

अलग-अलग कैनवास आकारों में कलाकारों ने दिखाई अपनी कल्पना

प्रदर्शनी की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक चौकोर या गोलाकार कैनवास की सीमाओं से अलग प्रयोग देखने को मिलते हैं। कलाकारों ने अपने विचारों और भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए कैनवास के अलग-अलग और अनूठे स्वरूपों का इस्तेमाल किया है। कलाकृतियों में जीवंत और विचारोत्तेजक अवधारणाओं को जगह दी गई है, जो दर्शकों को कला को नए नजरिए से देखने का अवसर देती हैं।

दीप प्रज्वलन के साथ हुआ प्रदर्शनी का उद्घाटन

प्रदर्शनी का उद्घाटन शनिवार, 19 सितंबर 2026 को शाम 5 बजे दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। समारोह की अध्यक्षता मुख्य अतिथि और लखनऊ के वरिष्ठ वास्तुकार अशेष श्रीवास्तव ने की।

उद्घाटन समारोह में उद्यमी एवं फिल्म निर्माता सर्वेश गोयल, वरिष्ठ वास्तुकार सविता अग्रवाल, पद्म भूषण से सम्मानित एवं संपादक पूर्णिमा वर्मन और द सेंट्रम होटल के महाप्रबंधक भगवती पंत समेत अन्य विशिष्ट अतिथि मौजूद रहे।

सिनैप्स इंटरनेशनल आर्ट गैलरी ने बताई प्रदर्शनी की अवधारणा

सिनैप्स इंटरनेशनल आर्ट गैलरी के स्वामी राकेश कुमार मौर्य ने मीडिया को प्रदर्शनी की संकल्पना, उद्देश्य और कलात्मक दृष्टिकोण की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदर्शनी के जरिए अलग-अलग कलात्मक पृष्ठभूमि और दृष्टिकोण रखने वाले कलाकारों की रचनाओं को एक साझा मंच पर प्रस्तुत किया गया है।

अमरनाथ शर्मा की कला में लकड़ी और प्रकृति का संबंध

अमरनाथ शर्मा का संबंध बढ़ई परिवार से रहा है और उनका बचपन एक छोटे गांव में बीता। गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने दादा के साथ समय बिताते थे, जहां उन्हें विभिन्न प्रकार की लकड़ियों को करीब से जानने का अवसर मिला। उनके लिए लकड़ी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवंत अस्तित्व का अनुभव कराती है।

हिंदू परंपरा में लकड़ी का इस्तेमाल घरों के निर्माण से लेकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों तक में होता रहा है। अमरनाथ के लिए लकड़ी जीवन का प्रतीक है और मनुष्य को प्रकृति तथा अस्तित्व से जोड़ने वाली कड़ी है। लकड़ी को काटने के बाद उभरने वाले प्राकृतिक पैटर्न उनके लिए विशेष महत्व रखते हैं, जिन्हें वह अपनी कला में रूपकों के तौर पर प्रस्तुत करते हैं।

उनकी कलाकृतियां मानव जीवन और प्रकृति के आपसी संबंधों की पड़ताल करती हैं। भावनाओं को दृश्य माध्यमों के जरिए व्यक्त करते हुए उनकी कला में लकड़ी केंद्रीय तत्व के रूप में मौजूद रहती है।

अमितेश वर्मा की चित्रकला में मानवीय अनुभव और शारीरिक संरचना

अमितेश वर्मा की कला का केंद्र मानवीय अनुभव है। वह घोड़ों और मानव शरीर की सूक्ष्म तथा गहन शारीरिक संरचना के अध्ययन के लिए जाने जाते हैं। कैनवास पर ऑयल और चारकोल से किए गए उनके काम चित्रांकन के प्रति उनके लंबे समर्पण को दर्शाते हैं।

अमितेश ने 1999 से 2008 के बीच दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट में अध्ययन किया। घोड़ों की शारीरिक संरचना का गहन अध्ययन करने के लिए उन्होंने दिल्ली रेस कोर्स में भी समय बिताया और अपने अध्ययन को आगे बढ़ाया। उनके इस अभ्यास का प्रभाव उनकी कलाकृतियों में दिखाई देने वाली शारीरिक सटीकता में नजर आता है।

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वर्तमान में नई दिल्ली में रहने वाले अमितेश वर्मा देश और विदेश में आयोजित प्रदर्शनियों के माध्यम से समकालीन कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

संबित पांडा की कलाकृतियों में पर्यावरण और बदलते सामाजिक संबंध

संबित पांडा का कला अभ्यास पर्यावरणीय मूल्यों और परंपराओं से जुड़ा है। उनकी कलाकृतियां शहरीकरण और जीवित प्राणियों के बीच बदलते संबंधों पर सवाल उठाती हैं। उनकी एक श्रृंखला में मनुष्यों की अनुपस्थिति में विभिन्न जीव-जंतुओं को प्रस्तुत किया गया है, जो दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करते हुए स्थापित मूल्यों को नए तरीके से देखने का प्रयास करती है।

वह अपनी कला में असामान्य और प्रभावशाली दृश्य छवियों का इस्तेमाल करते हैं। उनका काम पारिस्थितिक चेतना के साथ पीढ़ियों से विरासत में मिले मूल्यों पर भी विचार करता है। महानगरीय और बहुसांस्कृतिक परिवेश से मिले अनुभवों के जरिए वह प्रकृति और आधुनिक शहरी जीवन के बीच बदलते संबंधों को अपनी कला में व्यक्त करते हैं।

शतद्रु सोवन बंदूरी की कला में स्मृति, मिथक और पारिस्थितिकी

शतद्रु सोवन बंदूरी अपनी चित्रकला में स्मृति, मिथक, पारिस्थितिकी और गहन कालबोध को एक साथ जोड़ते हैं। उनकी कलाकृतियों में इतिहास को पारंपरिक कालक्रम से अलग एक ऐसी दृश्य दुनिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जहां जीवाश्म उन प्रजातियों के साथ संवाद करते दिखाई देते हैं जो अभी अस्तित्व में भी नहीं आई हैं।

उनके कला संसार में विलुप्त जीव कभी-कभी भूत-प्राय साक्षियों के रूप में सामने आते हैं। उनका काम पारिस्थितिक क्षति के अनुभव से भी जुड़ा है। वह विशेष रूप से हैदराबाद के शहरी विस्तार की ओर संकेत करते हैं, जिसने जंगलों के विनाश और वन्यजीवों के विस्थापन को जन्म दिया है।

भूकंप, टेक्टोनिक दरारें और संकर जीवन रूप उनकी कलाकृतियों में रूपकों के तौर पर दिखाई देते हैं। इनके माध्यम से वह अस्तित्व संघर्ष और प्रकृति के खिलाफ होने वाली अदृश्य हिंसा को व्यक्त करते हैं। उनके काम में इलेक्ट्रिक पिंक और विषैले नीले जैसे चमकीले रंगों का इस्तेमाल सुंदरता और विनाश को एक साथ प्रस्तुत करता है।

कैनवास और कागज दोनों माध्यमों में काम करने वाले बंदूरी ड्रॉइंग को एक तरह की दृश्य कविता के रूप में देखते हैं। उनकी रेखाएं और चिह्न संभावित जीवन की एक काल्पनिक पांडुलिपि का हिस्सा बनते हैं।

उमाशंकर पाठक की कला में शहर और गांव का द्वंद्व

उमाशंकर पाठक अपनी कलाकृतियों में शहरी और ग्रामीण जीवन के दृश्यों को साथ लेकर चलते हैं। उनकी कला में शहर और गांव के जीवन के बीच का तनाव स्पष्ट दिखाई देता है। स्ट्रीट लाइट और हल के फाल जैसे प्रतीकों के जरिए वह “हर चीज में कुछ नहीं” की अवधारणा को सामने रखते हैं।

उनकी कला उनके अपने प्रवासी जीवन के अनुभव से भी जुड़ी है। यह वह सफर है जिसमें उन्होंने कृषि की दुनिया से निकलकर अपने सपनों की तलाश में आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

24 सितंबर तक देख सकेंगे दर्शक

यह समूह चित्रकला प्रदर्शनी 24 सितंबर 2026 तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। प्रदर्शनी का समय प्रतिदिन सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक रखा गया है। प्रदर्शनी का आयोजन द सेंट्रम होटल के ग्राउंड फ्लोर स्थित ऑरम में किया गया है।

 

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