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19 राज्यों में कैंसर होगा ‘अधिसूचित बीमारी’, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से मरीजों को क्या मिलेगा फायदा?

नई दिल्ली। कैंसर के मामलों की पहचान, निगरानी और इलाज की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने उन 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कैंसर को ‘अधिसूचित बीमारी’ घोषित करने पर कार्रवाई करने को कहा है, जहां अभी यह व्यवस्था लागू नहीं है। अदालत का उद्देश्य कैंसर के मामलों की समय पर और व्यवस्थित रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना है, ताकि बीमारी के प्रसार पर नजर रखने के साथ मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर योजना बनाई जा सके।

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पहले ही कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित कर चुके हैं। अब बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों पर विचार करते हुए उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।

क्या होती है अधिसूचित बीमारी?

किसी बीमारी को अधिसूचित घोषित किए जाने के बाद अस्पतालों, डॉक्टरों और संबंधित प्रयोगशालाओं के लिए उससे जुड़े मामलों की जानकारी निर्धारित प्राधिकारी या संबंधित विभाग को देना जरूरी हो जाता है। कैंसर के मामले में इससे मरीजों और बीमारी से संबंधित आंकड़ों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार करने में मदद मिल सकती है।

इस व्यवस्था के जरिए सरकार को अलग-अलग क्षेत्रों में कैंसर के मामलों की स्थिति की निगरानी करने और बीमारी के बढ़ते मामलों वाले इलाकों की पहचान करने में मदद मिलेगी। इसके आधार पर स्वास्थ्य सुविधाओं और नीतियों को तैयार करना भी आसान हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?

सुप्रीम कोर्ट पिछले साल 12 दिसंबर से एम्स के पूर्व चिकित्सक डॉ. अनुराग श्रीवास्तव की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है। याचिका में कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्यों की कथित नाकामी का मुद्दा उठाया गया था।

याचिकाकर्ता की ओर से देश में कैंसर के मामलों की एकसमान और अनिवार्य रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को जरूरी दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई थी।

केंद्र से समान नीति पर विचार करने को कहा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र से सवाल किया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं।

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अदालत ने केंद्र सरकार से कैंसर के प्रसार पर नियंत्रण और मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने के लिए एक समान नीति तैयार करने पर विचार करने को कहा।

स्वास्थ्य राज्य का विषय, केंद्र ने क्या कहा?

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने अदालत को बताया कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है। उन्होंने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी भी अदालत के सामने रखी, जहां कैंसर को पहले ही अधिसूचित बीमारी घोषित किया जा चुका है।

इसके बाद पीठ ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों पर विचार कर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया, जहां अभी कैंसर अधिसूचित बीमारी नहीं है। अदालत ने संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आदेश के अनुपालन की जानकारी देते हुए हलफनामा दाखिल करने को भी कहा है।

मरीजों को क्या होगा फायदा?

कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित किए जाने का सबसे बड़ा संभावित लाभ इसकी रिपोर्टिंग और निगरानी व्यवस्था मजबूत होने के रूप में सामने आ सकता है। समय पर मामलों की जानकारी मिलने से सरकार यह पता लगा सकेगी कि किन क्षेत्रों में कैंसर के मामले अधिक सामने आ रहे हैं और किन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की जरूरत है।

बेहतर आंकड़ों के आधार पर कैंसर की स्क्रीनिंग, शुरुआती पहचान, उपचार सुविधाओं और रोकथाम से जुड़ी योजनाओं को अधिक प्रभावी तरीके से तैयार किया जा सकता है।

हालांकि, कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मरीज को अपने आप मुफ्त इलाज या किसी विशेष आर्थिक सहायता का अधिकार मिल जाएगा। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य कैंसर के मामलों की रिपोर्टिंग, बीमारी की निगरानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना है।

 

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