“पीढ़ियों की तूलिका में जीवंत बनारस घराने की लघुचित्र विरासत”

लखनऊ, 06 अक्टूबर 2026, नगर स्थित कोकोरो आर्ट गैलरी, लखनऊ में बनारस घराने की बरसों पुरानी समृद्ध लघुचित्र परंपरा को केंद्र में रखते हुए ‘MINIATURES—बनारस घराना’ कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। प्रदर्शनी का उद्घाटन 6 अक्टूबर 2026 को शाम 5 बजे उत्तर प्रदेश शासन के पर्यटन, संस्कृति एवं परिवहन विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात (IAS) ने किया। प्रदर्शनी की क्यूरेटर वंदना सहगल हैं।
‘A Repertoire of Paintings by Generations’ की अवधारणा पर आधारित इस प्रदर्शनी में बनारस की लघुचित्र परंपरा से जुड़ी कई पीढ़ियों—उस्ताद मुलचंद प्रसाद, उस्ताद राम प्रसाद, उस्ताद शारदा प्रसाद, उस्ताद मुकुंद प्रसाद, उस्ताद गोपाल प्रसाद, वंश श्री यादव और अंकित प्रसाद—की प्राकृतिक रंगों से बनी कुल 39 कृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। इनके माध्यम से एक ऐसी गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता सामने आती है, जिसमें मुगल लघुचित्र की पारंपरिक तकनीक स्थानीय धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन से संवाद करते हुए समय के साथ विकसित होती रही है।
क्यूरेटर वंदना सहगल ने बताया कि लघुचित्रकला केवल छोटे आकार में बनाए गए चित्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महीन रेखांकन, सूक्ष्म तूलिका-कर्म, प्राकृतिक रंगों, नियंत्रित रंग-संयोजन, घुटी हुई सतह, सपाट अथवा सीमित परिप्रेक्ष्य और अत्यंत बारीक विवरणों पर आधारित विशिष्ट कलाभाषा है। भारतीय कला में इसकी परंपरा बौद्ध और जैन पांडुलिपियों से लेकर मुगल, राजस्थानी, पहाड़ी और दक्कनी चित्रकला तक विस्तृत है। मुगल काल में विकसित सूक्ष्म तकनीकी अनुशासन ने विभिन्न क्षेत्रीय कला-केंद्रों को प्रभावित किया, जिसके स्थानीय रूपांतरणों से अनेक विशिष्ट शैलियों का विकास हुआ।
बनारस की लघुचित्र परंपरा भी इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके विकास को मुगल दरबारी चित्रकला से जुड़ी गुरु-शिष्य परंपरा से जोड़ा जाता है। शाह आलम द्वितीय के शासनकाल में कुछ मुगल राजकुमार बनारस में निरुद्ध रहे और उनके साथ कुछ शाही चित्रकार भी आए। इन्हीं से अहीर समुदाय के युवा सिखी ने लघुचित्रकला सीखी और आगे की पीढ़ियों तक इस कला-परंपरा को पहुँचाया। इसी परंपरा में उस्ताद बतोही और उस्ताद मुलचंद जैसे कलाकार हुए। मुलचंद ने लघुचित्रकला के साथ भित्तिचित्र, पुस्तक-चित्रण, कंपनी शैली और लिथोग्राफी में भी कार्य किया। बनारस के गोपाल मंदिर और बागेश्वरी मंदिर में उनके भित्तिचित्रों का उल्लेख मिलता है। रामायण, हनुमानबाहुक तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों के लिए उनके चित्रांकन ने इस परंपरा को व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान किया।
बनारस घराने की विशिष्टता इस बात में है कि यहाँ मुगल लघुचित्र की महीन रेखा, तकनीकी अनुशासन और रंग-संयोजन स्थानीय धार्मिक आख्यानों, प्रकृति, देवी-देवताओं, सामाजिक जीवन और भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ एकाकार होते हैं। इस समन्वय ने बनारस की लघुचित्रकला को अपनी विशिष्ट कलाभाषा प्रदान की। इस परंपरा के प्रमुख कलाकार उस्ताद राम प्रसाद का व्यक्तिचित्रण और चेहरे की समानता प्रस्तुत करने में विशेष योगदान रहा। चेहरे की बनावट, भाव-भंगिमा, व्यक्तित्व और वेशभूषा जैसे सूक्ष्म पक्षों को पकड़ने में उनकी असाधारण दक्षता थी। उन्होंने मुगल लघुचित्र की तकनीकी परंपरा को आत्मसात करते हुए भित्तिचित्र, लघुचित्र, तैलचित्र और हाथीदाँत पर भी कार्य किया। धार्मिक प्रकाशनों के लिए उनके चित्रांकन ने पारंपरिक चित्रभाषा को व्यापक दर्शक-समाज तक पहुँचाया।
उस्ताद शारदा प्रसाद ने इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए पारंपरिक रंग-निर्माण, तूलिका-निर्माण और चित्र-संरक्षण की प्रक्रियाओं को जीवित रखा। मुगल लघुचित्र की पारंपरिक तकनीकों पर उनकी गहरी पकड़ थी और वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन से भी जुड़े रहे। उनके चित्रों में वनस्पति, जीव-जगत, प्राकृतिक दृश्यों और दैनिक जीवन के विविध प्रसंग दिखाई देते हैं। आगे उस्ताद मुकुंद प्रसाद और उस्ताद गोपाल प्रसाद ने इस परंपरा को अपने समय की संवेदनाओं से जोड़ा। मुकुंद प्रसाद के कार्यों में मुगल शैली के साथ पहाड़ी और राजस्थानी प्रभावों का समन्वय दिखाई देता है। वहीं गोपाल प्रसाद ने कलाकार के साथ कला-अध्येता, लेखक और शोधकर्ता के रूप में लघुचित्र परंपरा के दस्तावेजीकरण और प्रसार में योगदान दिया। उन्होंने लेखन, वृत्तचित्र और अकादमिक संवादों के माध्यम से इस विरासत को व्यापक संदर्भ प्रदान किया।
इसी क्रम में अंकित प्रसाद और वंश श्री यादव नई पीढ़ी की उस कलाभाषा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें पारंपरिक मुगल लघुचित्र की तकनीकी जड़ें सुरक्षित रहते हुए समकालीन विषय, दृष्टि और संवेदना का समावेश दिखाई देता है। इस प्रकार प्रदर्शनी अतीत से वर्तमान तक लघुचित्रकला के बदलते रूपों, तकनीकी निरंतरता और रचनात्मक विस्तार को एक साथ देखने का अवसर देती है।
प्रदर्शनी बनारस की लघुचित्र परंपरा में सूक्ष्म रेखांकन, रंग-संयोजन, प्रकृति, भारतीय सांस्कृतिक विषयों और कथात्मकता के साथ पीढ़ियों से विकसित होती कलाभाषा को सामने लाती है। यह रेखांकित करती है कि परंपरा स्थिर नहीं होती, बल्कि प्रत्येक पीढ़ी अपने समय और अनुभवों के अनुरूप उसमें नए अर्थ और संभावनाएँ जोड़ती है। इस दृष्टि से ‘MINIATURES—बनारस घराना’ केवल चित्रों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक जीवंत गुरु-शिष्य परंपरा, कलात्मक विरासत और उसके निरंतर रूपांतरण का दृश्य दस्तावेज है।
ज्ञातव्य हो कि कोकोरो आर्ट गैलरी, 13-बी, मदन मोहन मालवीय मार्ग, जॉपलिंग रोड, लखनऊ में यह प्रदर्शनी 7 से 28 अक्टूबर 2026 तक, रविवार को छोड़कर, दर्शकों के अवलोकनार्थ खुली रहेगी।

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