बीबीएयू में राजभाषा हिंदी उत्सव-2026 का भव्य समापन, विजेताओं को प्रमाण-पत्र, पदक और पुरस्कार राशि से किया सम्मानित

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में 30 सितंबर को हिंदी प्रकोष्ठ की ओर से आयोजित ‘राजभाषा हिंदी उत्सव-2026’ का भव्य समापन हुआ। समापन समारोह में विधान परिषद, उत्तर प्रदेश के सभापति श्री मानवेन्द्र सिंह मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं सांसद डॉ. अशोक बाजपेई, कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी के प्रो. मुन्ना तिवारी, कुलसचिव डॉ. अश्विनी कुमार सिंह और कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव भी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय कुलगीत का गायन किया गया। आयोजन समिति की ओर से मंचासीन अतिथियों को अंगवस्त्रम और स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत एवं आभार व्यक्त किया गया। कुलसचिव डॉ. अश्विनी कुमार सिंह ने उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी। मंच संचालन डॉ. रमेश चंद्र नैलवाल ने किया।
हिंदी को विज्ञान, तकनीक और रोजगार से जोड़ने पर जोर
मुख्य अतिथि श्री मानवेन्द्र सिंह ने कहा कि किसी राष्ट्र की भाषा यह बताती है कि वह राष्ट्र क्या सोचता है। भाषा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संवाद स्थापित करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि हिंदी अपनी साहित्यिक परंपरा के साथ-साथ अपनी बोलियों के कारण भी समृद्ध है। हिंदी के विकास को व्यापक बनाने के लिए उसकी साहित्यिक विरासत के साथ बोलियों और भाषाई विविधता को भी समान महत्व देना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी भाषा में केवल साहित्य उपलब्ध हो, लेकिन रोजगार, ज्ञान और विज्ञान से जुड़ी पर्याप्त सामग्री और अवसर न हों, तो वह भाषा नई पीढ़ी से प्रभावी रूप से नहीं जुड़ पाएगी। वर्तमान जरूरतों के अनुरूप हिंदी को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम तकनीक, विज्ञान, डिजिटलाइजेशन और रोजगार के अवसरों से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिंदी को केवल अतीत तक सीमित न रखते हुए ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और रोजगार से जोड़कर भविष्य की सशक्त भाषा के रूप में विकसित करना होगा।
हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन पर भी जोर
पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं सांसद डॉ. अशोक बाजपेई ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करते हुए इसे जनमानस की भाषा बनाने पर विशेष जोर दिया था। हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आचार-विचार और भावनाओं की अभिव्यक्ति की भाषा भी है।
उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रति गौरव और सम्मान की भावना विकसित करने के साथ इसके व्यापक स्वरूप को समझना जरूरी है। भाषायी विवादों से बचने और भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी के साथ कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा के अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इससे भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान की भावना बढ़ेगी और हिंदी की स्वीकार्यता भी व्यापक होगी। वैज्ञानिक युग में हिंदी को केवल साहित्य तक सीमित रखने के बजाय इसके वैज्ञानिक प्रयोग को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
भाषाई विविधता और भारतीय भाषाओं के सम्मान की बात
विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने कहा कि भारत की पहचान उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में निहित है। देश की विभिन्न भाषाएं और बोलियां समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं और विविधता में एकता की भावना को मजबूत करती हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदी को आगे बढ़ाने के साथ देश की अन्य भारतीय भाषाओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए। विद्यार्थियों और युवाओं के लिए एक से अधिक भारतीय भाषाओं का ज्ञान उपयोगी है। दूसरी भाषा सीखने से संवाद का दायरा बढ़ने के साथ विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति, साहित्य और जीवन-मूल्यों को समझने का अवसर भी मिलता है।
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उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हिंदी का प्रयोग शिक्षा, रोजगार, संचार और विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर भी हिंदी का प्रभाव और स्वीकार्यता विस्तृत हो रही है। ऐसे में हिंदी के विकास के साथ उसकी समृद्ध भाषाई परंपरा और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय बनाए रखना जरूरी है।
हिंदी को उसका उचित सम्मान दिलाने पर मंथन
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी के प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि हिंदीभाषी होने के बावजूद आज हिंदी को वह प्रतिष्ठा नहीं मिल पा रही है, जिसकी वह हकदार है। इस दिशा में गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि हिंदी ने भारत की राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के बीच संवाद एवं समन्वय स्थापित करने में भी हिंदी की अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रचार-प्रसार और विकास में कई गैर-हिंदीभाषी व्यक्तियों और विद्वानों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
प्रो. तिवारी ने कहा कि हिंदी के साथ उसकी सहभाषाओं और देश की अन्य भाषाओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए। भाषाओं के बीच समन्वय, सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा देकर ही हिंदी के प्रति मौजूद विरोध और संकोच को दूर किया जा सकता है।
प्रतियोगिताओं के विजेताओं को प्रमाण-पत्र, पदक और पुरस्कार
बीबीएयू में 1 से 30 सितंबर 2026 तक ‘राजभाषा हिंदी उत्सव-2026’ के तहत हिंदी प्रकोष्ठ की ओर से श्रुतिलेख (सु-लेख), टिप्पणी एवं प्रारूपण, हिंदी टंकण, निबंध प्रतियोगिता और स्वरचित कविता पाठ सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।
इन प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विजेताओं को समापन समारोह में मुख्य अतिथि द्वारा प्रमाण-पत्र, पदक और पुरस्कार राशि प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘लोकसाहित्य के विविध परिदृश्य’ का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम के अंत में आईक्यूएसी निदेशक प्रो. शिल्पी वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी हुआ समापन
राजभाषा हिंदी उत्सव के अंतर्गत ‘हिंदी के विकास में बोलियों का योगदान: वर्तमान परिप्रेक्ष्य एवं भविष्य की दिशा’ विषय पर आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी समापन हुआ। विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल के संरक्षण में आयोजित इस संगोष्ठी का आयोजन हिंदी प्रकोष्ठ, बीबीएयू, हिंदुस्तानी एकेडमी, उत्तर प्रदेश प्रयागराज और अखिल भारतीय साहित्य परिषद, अवध प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
संगोष्ठी के दौरान हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. रामपाल गंगवार, रमेश चंद्र नैलवाल और डॉ. नमिता जैसल प्रमुख रूप से उपस्थित रहीं। पूरे कार्यक्रम के दौरान विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।

