उत्तर प्रदेशराजनीतिराज्य

कॉरपोरेट बोर्डरूम से संसद की दहलीज तक; जब बिजनेस टायकून्स ने पकड़ी राजनीति की राह

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसकी विविधता में है। यहाँ संसद की बेंचों पर समाजसेवी, शिक्षक, किसान और कलाकार एक साथ बैठते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में एक दिलचस्प ट्रेंड ने जोर पकड़ा है, और सफेद कॉलर वाले कॉरपोरेट जगत के दिग्गज खादी में नजर आने लगे हैं। आज का सफल उद्यमी केवल मुनाफा कमाने तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह नीति-निर्धारण के केंद्र में बैठकर देश की दिशा तय करने की मजबूत इच्छाशक्ति भी रखता है।

व्यापार की दुनिया से राजनीति में आने वाले ये दिग्गज अपने साथ केवल पैसा नहीं, बल्कि विजन लेकर आते हैं। उनके पास जटिल समस्याओं को सुलझाने का प्रबंधन कौशल, आर्थिक बारीकियों की समझ और समय सीमा के भीतर लक्ष्य हासिल करने की आदत होती है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कंवर दीप सिंह (के.डी. सिंह) इसका एक बड़ा उदाहरण रहे। लखनऊ के प्रतिष्ठित केडी सिंह बाबू स्टेडियम से लेकर बड़े व्यावसायिक घरानों तक अपनी पहचान बनाने वाले सिंह ने समाजवादी पार्टी के जरिए सत्ता के गलियारों में अपनी धाक जमाई। उन्होंने विधान परिषद सदस्य के तौर पर औद्योगिक नीतियों में व्यापारिक दृष्टिकोण को शामिल करने की पुरजोर वकालत की। वहीं देश के दिग्गज उद्योगपति नवीन जिंदल का नाम इस सूची में प्रमुखता से आता है। जिंदल स्टील एंड पावर के शिखर से राजनीति के मैदान तक का उनका सफर प्रेरणादायक भी है और चुनौतीपूर्ण भी। कांग्रेस से लेकर भाजपा तक के अपने सफर में उन्होंने ऊर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे विषयों पर संसद में जो स्पष्टता दिखाई, वह एक विशुद्ध राजनीतिज्ञ के पास कम ही मिलती है।

वहीं, अगर तकनीक और भविष्य की बात करें, तो राजीव चंद्रशेखर का नाम सबसे ऊपर आता है। एक सफल टेक-उद्यमी से केंद्रीय मंत्री बनने तक का उनका सफर यह बताता है कि डिजिटल इंडिया जैसे सपनों को हकीकत में बदलने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता कितनी जरूरी है। साइबर सिक्योरिटी और डेटा संप्रभुता जैसे जटिल विषयों पर उनकी पकड़ ने संसद की बहसों का स्तर ऊंचा किया है।

राजनीति के इस खेल में केवल राष्ट्रीय स्तर के ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय क्षत्रप भी उद्योग जगत से आए हैं। अरविंद खन्ना ने खन्ना ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के अनुभव को उत्तर प्रदेश के विकास में झोंका। बतौर मंत्री उन्होंने एमएसएमई की जो पैरवी की, उसने राज्य के व्यापारिक ढांचे को मजबूती दी। असम में अजमल ग्रुप के बदरुद्दीन अजमल ने तो अपनी अलग राजनीतिक पार्टी एआईयूडीएफ खड़ी कर दी, जो आज राज्य की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका निभाती है। वहीं दक्षिण में के. पंडियाराजन जैसे नेताओं ने दिखाया कि कैसे कॉर्पोरेट अनुभव को शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

राजनीति में हर कोई चुनाव नहीं लड़ता, कुछ लोग चाणक्य की भूमिका निभाते हैं। इस कड़ी में भारत का पहला एंगर मैनेजमेंट कैफे भड़ास खोलने वाले, पीआर 24×7 के फाउंडर, राइटर व समाजसेवी से राजनीतिक रणनीतिकार तक का सफर तय करने वाले डॉ अतुल मिलकराम का नाम भी उल्लेखनीय है। बुंदेलखंड 24×7 जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए उन्होंने क्षेत्रीय मुद्दों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है। डॉ. मलिकराम का काम यह भी दिखाता है कि एक उद्यमी का सामाजिक उत्तरदायित्व राजनीति का मानवीय चेहरा बन सकता है। इंदौर में बुजुर्गों के लिए डेकेयर सेंटर जैसी उनकी पहल बताती है कि सार्वजनिक जीवन केवल वोटों का गणित नहीं, बल्कि समाज की सेवा का जज्बा भी है।

इसी क्रम में प्रवीण खंडेलवाल जैसे नाम भी हैं, जिन्होंने व्यापारिक संगठनों का नेतृत्व करते हुए देश के करोड़ों छोटे दुकानदारों की आवाज को सरकार के कानों तक पहुँचाया।

हालांकि एक सवाल हमेशा बना रहता है कि क्या व्यापारिक हित और राष्ट्रहित एक साथ चल सकते हैं? आलोचक अक्सर हितों के टकराव की बात करते हैं। डर यह होता है कि कहीं नीतियां केवल खास व्यापारिक घरानों को फायदा पहुँचाने के लिए न बन जाएं। इसीलिए, इस नई व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। बेशक, कारोबार और सियासत की यह जुगलबंदी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक फ्रेश एयर की तरह है। यदि एक सफल उद्यमी अपनी ईमानदारी और कार्यकुशलता को जनसेवा में लगाता है, तो इससे निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास के नए द्वार खुलते हैं।

---------------------------------------------------------------------------------------------------