BBAU में ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ पर बड़ा संदेश: सतत जीवनशैली अपनाने पर जोर, विशेषज्ञों ने कहा—प्रकृति संरक्षण ही भविष्य की कुंजी

लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में 22 अप्रैल को ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। भू-विज्ञान विभाग और सतत विकास लक्ष्य समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवनशैली को लेकर व्यापक चर्चा हुई। वर्ष 2026 की थीम ‘हमारी शक्ति, हमारा ग्रह’ को केंद्र में रखते हुए विशेषज्ञों ने पृथ्वी के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों पर बल दिया।

कुलपति ने दिया जिम्मेदारीपूर्ण जीवन का संदेश
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय संस्कृति के ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति की रक्षा करना हमारा मूल कर्तव्य है। उन्होंने चेताया कि अनियंत्रित तकनीकी उपयोग और संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पृथ्वी का संतुलन बिगड़ रहा है। उन्होंने ‘रीयूज़, रिड्यूस और रीसायकल’ के सिद्धांतों को अपनाने पर जोर देते हुए छात्रों से पौधारोपण, जल संरक्षण और स्वच्छता जैसे छोटे-छोटे प्रयासों के जरिए बड़ा बदलाव लाने की अपील की।
DFO ने कहा—सस्टेनेबिलिटी बनाएं जीवनशैली
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर शितांशु पांडेय ने वेदों का हवाला देते हुए पृथ्वी को ‘माता’ बताया और कहा कि इस भाव को व्यवहार में उतारना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सस्टेनेबिलिटी केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवनशैली है। उन्होंने जंगलों को कार्बन सिंक बताते हुए कहा कि ये जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि “प्लैनेट बी जैसा कोई विकल्प नहीं है”, इसलिए हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

विशेषज्ञों ने समझाया पृथ्वी और जीवन का विकास
विशिष्ट अतिथि प्रो. अशोक साहनी ने पृथ्वी पर जीवन के विकास और जैविक जटिलताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जीवन का विकास एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के साथ संतुलन बनाकर ही जीवों का विकास संभव हुआ है, इसलिए इस संतुलन को बनाए रखना बेहद जरूरी है।

नीतिगत, संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास जरूरी
कार्यक्रम समन्वयक प्रो. नरेंद्र कुमार ने कहा कि पृथ्वी एक जीवंत प्रणाली है, जिसमें संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। इसके लिए नीतिगत, संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर समन्वित प्रयास जरूरी हैं। वहीं प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल किताबों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे व्यवहार में उतारना ही असली जिम्मेदारी है। उन्होंने सामुदायिक भागीदारी को बड़े बदलाव का आधार बताया।

छात्रों के लिए विशेष सत्र और प्रतियोगिताएं आयोजित
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों के लिए विशेष व्याख्यान और पैनल चर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। इसके अलावा पोस्टर मेकिंग, रंगोली, भाषण, रील चैलेंज, काव्य पाठ और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
समापन सत्र में अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर धन्यवाद ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और कर्मचारी मौजूद रहे।
