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आईवीआरआई में प्रसार परिषद की बैठक का आयोजन


बरेली,25अप्रैल।आईसीएआर–भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर में आज 27वीं प्रसार परिषद की बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में कृषि एवं पशुपालन विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, राज्य विभागों तथा किसानों की सक्रिय भागीदारी रही, जिसमें महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। बैठक का उद्देश्य कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र में संचालित प्रसार गतिविधियों की समीक्षा, नई रणनीतियों का निर्माण तथा किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों के प्रभावी हस्तांतरण को सुदृढ़ करना रहा।
बैठक में बोलते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक एवं संस्थान के निदेशक डॉ. राघवेन्द्र भट्टा ने कहा कि शोध और खेत के बीच की दूरी को कम करने में विस्तार सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों तथा भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी) के माध्यम से तकनीकों के प्रभावी प्रसार, प्रशिक्षण तथा किसानों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर तकनीकी सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. भट्टा ने संस्थान की दृश्यता बढ़ाने के लिए ‘ओपन डे’, लघु वीडियो निर्माण तथा स्कूल–कॉलेजों के साथ संवाद जैसे नवाचारों को अपनाने पर बल दिया। साथ ही, प्रभाव आकलन हेतु मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
डॉ. आर. आर. बर्मन, सहायक महानिदेशक (कृषि प्रसार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), नई दिल्ली ने अपने संबोधन में आईसीएआर द्वारा संचालित संतुलित उर्वरक उपयोग अभियान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह अभियान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है।
उन्होंने बताया कि मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग, सॉयल हेल्थ कार्ड, जैविक खाद तथा बायोफर्टिलाइज़र के प्रयोग से कृषि लागत को घटाया जा सकता है और उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पशुधन कृषि पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
डॉ. बर्मन ने संस्थान को ग्रीन मैन्योरिंग, अजोला, वर्मी कम्पोस्ट तथा बायोफर्टिलाइज़र पर प्रदर्शन कार्य करने का सुझाव दिया। उन्होंने वर्ष 2030 तक उर्वरक उपयोग में 25 प्रतिशत कमी के राष्ट्रीय लक्ष्य का भी उल्लेख किया, जिससे आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
इस अवसर पर भाकृअनुप–कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), कानपुर के निदेशक डॉ. राघवेंद्र सिंह ने कहा कि आईवीआरआई द्वारा विकसित पशु विज्ञान के ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ को कृषि विज्ञान केंद्रों तक पहुँचाकर किसानों के बीच प्रसारित किया जाना चाहिए। उन्होंने जैविक इनपुट्स के उपयोग तथा मृदा कार्बन में सुधार पर भी जोर दिया।
प्रसार शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एच. आर. मीना ने बैठक में गत वर्ष की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रसार परिषद की पिछली बैठक में कुल 18 सिफारिशें की गई थीं, जिन पर कार्यवाही प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया है। सभी सिफारिशों का विधिवत अनुपालन करते हुए उन्हें पूर्ण रूप से क्रियान्वित किया गया है।
डॉ. रूपसी तिवारी, संयुक्त निदेशक (प्रसार शिक्षा) ने अपने संबोधन में कहा कि संस्थान द्वारा कुल 15,521 प्रसार गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिनके माध्यम से लगभग 1.45 लाख लाभार्थियों तक पहुँच सुनिश्चित की गई। इन लाभार्थियों में महिलाओं की भी उल्लेखनीय भागीदारी रही, जो संस्थान के समावेशी विकास के लक्ष्य को दर्शाती है।
उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा फार्म स्कूल गतिविधियों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, परामर्श सेवाओं तथा तकनीकी साहित्य के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके अतिरिक्त, किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें अटारी एवं राज्य कृषि/पशुपालन विभागों के सहयोग से विकसित किया जा रहा है, ताकि अगले तीन वर्षों में किसानों की प्रमुख समस्याओं का समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
डॉ. तिवारी ने बताया कि पिछले वर्ष विभिन्न राज्यों के साथ चार महत्वपूर्ण समन्वय बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक सहित अन्य राज्यों के उच्च स्तरीय अधिकारियों ने भाग लिया। इन बैठकों के माध्यम से राज्य विभागों, उद्योगों तथा संस्थान के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हुआ तथा क्षेत्रीय आवश्यकताओं की पहचान की गई।
इसके अतिरिक्त, ओडिशा राज्य के प्रधान सचिव श्री सुरेश वशिष्ठ द्वारा आईवीआरआई को राज्य के लिए “नॉलेज पार्टनर” के रूप में कार्य करने का प्रस्ताव दिया गया, जो संस्थान की विशेषज्ञता एवं विश्वसनीयता का प्रमाण है।
डॉ. तिवारी ने यह भी बताया कि संस्थान द्वारा किसानों, छात्रों एवं युवाओं के लिए विशेष जागरूकता दिवस आयोजित करने की योजना है, जिससे वे पशुपालन एवं पशु चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्ध करियर अवसरों एवं स्टार्टअप संभावनाओं से परिचित हो सकें। इसके अंतर्गत प्रदर्शन, प्रशिक्षण तथा संवाद सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिससे युवा वर्ग को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सके।
उन्होंने आगे कहा कि संस्थान किसानों के बीच लो-कॉस्ट तकनीकों, स्वदेशी पशु नस्ल संरक्षण तथा व्यावसायिक पशुपालन मॉडल के प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत है। साथ ही, विभिन्न नवाचारों एवं तकनीकों का फील्ड स्तर पर प्रदर्शन कर उन्हें सरल एवं व्यवहारिक रूप में किसानों तक पहुँचाया जा रहा है।
उन्होंने इंटरफेस मीट्स की उपयोगिता पर भी जोर दिया, जिसके माध्यम से राज्य विभागों, उद्योगों एवं वैज्ञानिकों के बीच समन्वय स्थापित कर वास्तविक समस्याओं की पहचान की जा रही है। इन बैठकों से प्राप्त सुझावों के आधार पर वैक्सीन विकास, सस्ती निदान तकनीक, पशु पोषण सुधार एवं प्रिसिजन पशुपालन तकनीकों पर कार्य करने की दिशा तय की गई है।
कार्यक्रम का संचालन प्रसार शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एच. आर. मीना द्वारा किया गया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. आर. एस. सुमन द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. एस. के. सिंह, संयुक्त निदेशक (शिक्षा) डॉ. एस. के. मेंदिरत्ता, संयुक्त निदेशक (कैडराड) डॉ. सोहनी डे, रजिस्ट्रार श्री राजीव लाल सहित विभिन्न विभागाध्यक्ष, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, बरेली तथा प्रगतिशील किसान उपस्थित रहे। बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट

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