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विमला बिष्ट के 89वीं जयंती पर विशेष लेख


विमला बिष्ट का नाम लखनऊ की समकालीन कला-परंपरा में उस संवेदनशील अध्याय की तरह अंकित है, जहाँ मिट्टी केवल माध्यम नहीं रहती, बल्कि अनुभूति, स्मृति और जीवन की भाषा बन जाती है। आज उनकी 89वीं जयंती पर उन्हें स्मरण करना एक कलाकार को नहीं, बल्कि उस सृजनशील आत्मा को नमन करना है, जिसने अपने हाथों से धरती को कविता में रूपांतरित किया।
विमला बिष्ट का कला-संसार परंपरा और प्रयोग के बीच एक जीवंत सेतु की तरह था। उनकी कृतियों में एक ओर भारतीय हस्तशिल्प की गहरी जड़ें दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक कल्पना की निर्भीक उड़ान भी। वे मिट्टी को केवल आकार नहीं देती थीं, बल्कि उसमें धैर्य, अग्नि और सौंदर्य की एक दीर्घ साधना को पिरोती थीं। हर कृति जैसे समय के भीतर ठहरकर बनी हुई कोई मौन कथा हो, जो देखने वाले से संवाद करती है।
आज ही के दिन 13 मई 1937 को जन्मी विमला बिष्ट ने कला की औपचारिक शिक्षा लखनऊ से प्राप्त की—फाइन आर्ट्स में डिप्लोमा, पॉटरी और मूर्तिकला में पोस्ट-डिप्लोमा, और आगे चलकर विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन से सिरेमिक्स में प्रशिक्षण लेकर अपनी दृष्टि को और व्यापक किया। शिक्षा और अनुभव की यही यात्रा उन्हें उस गहराई तक ले गई, जहाँ कला केवल अभ्यास नहीं रहती, बल्कि जीवन-दर्शन बन जाती है।
वे स्वयं कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ की छात्रा भी रहीं और बाद में उसी संस्थान में अध्यापन करते हुए प्राचार्या (1996-97)के पद तक पहुँचीं। यह यात्रा केवल पदों की नहीं, बल्कि उस सतत समर्पण की कहानी है जिसमें एक कलाकार पीढ़ियों को गढ़ता है। उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को न केवल तकनीक सिखाई, बल्कि देखने, समझने और महसूस करने की दृष्टि भी दी।
उनकी कला-यात्रा में अनेक प्रदर्शनियाँ, शिविर और सम्मान जुड़े रहे। 1984 की एकल प्रदर्शनी से लेकर 1987 और 1989 की समूह प्रदर्शनियों तक उनकी उपस्थिति ने सिरेमिक कला को एक नई पहचान दी। 1985 का एस.एल.के.ए. पुरस्कार, 1987 का उत्तर प्रदेश राज्य हस्तशिल्प सम्मान और 1990 का अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी सम्मान इस बात के प्रमाण हैं कि उनकी कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि गंभीर कलात्मक संवाद भी थी।
पद्मश्री रणवीर सिंह बिष्ट की जीवनसंगिनी के रूप में भी उनका जीवन कला और संवेदना की साझा यात्रा का हिस्सा रहा। लेकिन उनकी पहचान सदैव एक स्वतंत्र और सशक्त सिरेमिक कलाकार के रूप में ही स्थापित रही—एक ऐसी कलाकार, जिसके स्पर्श से मिट्टी भी अपनी भाषा बोलने लगती थी।
22 अक्टूबर 2007 को उनका देहावसान हुआ, पर उनकी कला आज भी चुपचाप सांस लेती है—उन कृतियों में, जिनमें समय ठहरा हुआ है; उन विद्यार्थियों में, जिनमें उनकी सीख जीवित है; और उस लखनऊ में, जिसकी कला-संवेदना में उनका योगदान एक स्थायी प्रकाश की तरह विद्यमान है।
उनकी 89वीं जयंती पर यह स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस सृजनशील यात्रा को प्रणाम है, जिसने मिट्टी को जीवन और कला को आत्मा दी।
लेखक – भूपेंद्र कुमार अस्थाना

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