महाराष्ट्र में सूखे की मार से हाहाकार, मराठवाड़ा में 80% फसलें बर्बाद; जलाशयों में सिर्फ 12.5% पानी
मुंबई: महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में इस बार मानसून की बेरुखी ने किसानों की खरीफ फसलों को बुरी तरह प्रभावित किया है। लातूर, बीड और धाराशिव समेत आसपास के इलाकों में सोयाबीन पीली पड़ गई है, कपास की बढ़वार रुक गई है और अरहर की फसल मुरझाने लगी है। गन्ना भी सामान्य ऊंचाई तक पहुंचने से पहले ही सूख रहा है। क्षेत्र में करीब 80 फीसदी फसलें बर्बाद होने का अनुमान है, जबकि जलस्रोतों में पानी तेजी से घट रहा है।
आसमान से देखने पर खेतों में हरियाली दिखाई देती है, लेकिन जमीन पर तस्वीर काफी अलग है। कई खेतों में खड़ी फसल अब पैदावार देने की स्थिति में नहीं बची है। इसका असर केवल मौजूदा खरीफ सीजन तक सीमित नहीं है। किसानों के सामने अगली फसल के लिए बीज, खाद और अन्य जरूरी खर्च जुटाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।

लातूर-बीड समेत कई जिलों में बारिश की भारी कमी
लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव को सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में बताया जा रहा है। जून से सितंबर के बीच इन क्षेत्रों में सामान्य बारिश 679.5 मिलीमीटर होनी चाहिए थी, लेकिन इस बार सिर्फ 424.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
बारिश की कमी का असर अब खेती के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। खेतों में चारे की कमी बढ़ रही है। ग्रामीण मजदूरी और घरेलू आमदनी प्रभावित हो रही है। वहीं, किसान अगली फसल की तैयारी के लिए जरूरी पूंजी जुटाने में भी मुश्किल का सामना कर रहे हैं।
देवकरा में किसान ने उठाया आत्मघाती कदम
लातूर जिले के देवकरा गांव से सूखे के बीच एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहां पहली बार एक किसान ने आत्महत्या की है। दो एकड़ जमीन पर खेती करने वाले तुकाराम गुट्टे ने यह कदम उठाया।
कीनगांव से आगे जाने पर खेतों में सूखे की गंभीरता साफ नजर आती है। सोयाबीन, कपास और अरहर की फसलें खेतों में सूख रही हैं। हिंगणगांव के किसान तुकाराम अंबाजी के पास 40 एकड़ जमीन है। उनका कहना है कि खेती पर प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन इस बार लागत निकलने की भी उम्मीद कम है।
डेढ़ लाख खर्च के बाद खराब फसल हटाने का भी बोझ
हगदल गांव में किसान बालाजी मुंडे ने गन्ने के खेतों की स्थिति बताई। उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में गन्ना 20 से 25 फुट तक ऊंचा हो जाता है, लेकिन इस साल 10 से 12 फुट की ऊंचाई पर ही उसकी बढ़वार रुक गई। अब गन्ना सूखने लगा है।
मुंडे के मुताबिक 2025 में जरूरत से ज्यादा बारिश ने किसानों की परेशानी बढ़ाई थी और इस साल बारिश की कमी ने नया संकट खड़ा कर दिया है। सावरगांव रोकड़े के किसान राम बेल्लाडे सोयाबीन, अरहर और ज्वार की खेती करते हैं। उन्होंने 8 एकड़ में फसल उगाने पर करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च किए हैं।
अब खेत से खराब फसल हटाने के लिए भी प्रति एकड़ करीब 5 हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे। उनका कहना है कि फसल में अगर कुछ बचता है तो उसका इस्तेमाल सिर्फ मवेशियों के चारे के तौर पर किया जा सकेगा।
सूखी नदी और जलाशयों में सिर्फ 12.5 फीसदी पानी
सूखे का असर खेतों के साथ जलस्रोतों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। लातूर और बीड जिलों के तालाबों में बेहद कम पानी बचा है। लातूर की जीवनवाहिनी मानी जाने वाली माजरा नदी भी सूखी पड़ी है।
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लातूर शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर धाराशिव और बीड की सीमा के पास स्थित माजरा बांध का जलस्तर भी काफी नीचे पहुंच गया है। लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत पानी का भंडारण अब करीब 12.5 फीसदी रह गया है।
नवाबकालीन साइ डैम भी नहीं आ रहा काम
लातूर का नवाबकालीन साइ डैम भी क्षेत्र के पुराने जल इतिहास का हिस्सा है। स्थानीय पत्रकार शशिकांत पाटिल के मुताबिक, कभी इसी डैम के पानी से लातूर शहर की जरूरतें पूरी होती थीं। फिलहाल यह डैम इस्तेमाल में नहीं है।
पाटिल का कहना है कि अगर जल रिसाव रोकने और पानी के बेहतर प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता तो मौजूदा संकट की तीव्रता को कुछ हद तक कम किया जा सकता था।
पहले बुआई का संकट, फिर फसल बचाने की चुनौती
मराठवाड़ा के किसानों से बातचीत में वर्ष 1972 का सूखा बार-बार चर्चा में आता है। पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद की सबसे गंभीर सूखा परिस्थितियों में से एक मानते हैं।
उनके मुताबिक, इस बार संकट के संकेत मानसून के शुरुआती महीनों में ही मिलने लगे थे। अब किसानों के सामने समस्या तीन स्तर पर पहुंच गई है। पहले बुआई के लिए पानी का संकट था, इसके बाद खड़ी फसल को बचाने की चुनौती आई और अब फसल खराब होने के बाद उसे खेत से हटाने तथा अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने की समस्या सामने है।
सरकार के सामने 50 हजार करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च की चुनौती
महाराष्ट्र सरकार ने सूखे की स्थिति से निपटने के लिए राहत प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम उठाए हैं। सितंबर के अंत में राज्य के 265 तालुकों के बाद 43 और तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल किया गया है। फसल नुकसान के पंचनामे तैयार करने के साथ पानी और चारे की व्यवस्था जैसे उपायों पर भी चर्चा हुई है।
अधिकारियों के मुताबिक, सूखे से निपटने के लिए सरकार पर करीब 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ आ सकता है। हालांकि किसानों की जरूरत सिर्फ फसल नुकसान की भरपाई तक सीमित नहीं है। प्रभावित परिवारों को पानी और पशुओं के लिए चारे के इंतजाम के साथ अगली फसल आने तक परिवार का खर्च चलाने के लिए आय के सहारे की भी जरूरत होगी।
मराठवाड़ा में इस समय सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस सीजन में फसल बर्बाद होने के बाद किसान अगली खेती की शुरुआत किस तरह करेंगे। खेतों में खड़ी फसल का नुकसान अब सीधे ग्रामीण परिवारों की आमदनी और भविष्य की खेती की क्षमता पर असर डाल रहा है।

