यूपी के ये 4 ऐतिहासिक मेले सदियों से संजोए हुए हैं गंगा-जमुनी तहजीब, जहां मंदिर की घंटियों के साथ गूंजती है अजान
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के पारंपरिक मेले केवल धार्मिक आयोजनों या खरीदारी के केंद्र नहीं हैं, बल्कि सदियों पुरानी साझा संस्कृति और सामाजिक सौहार्द की पहचान भी हैं। अवध की सूफी परंपरा, ब्रज की आध्यात्मिक विरासत, पूर्वांचल की सांस्कृतिक चेतना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लोकजीवन से जुड़ी परंपराएं इन मेलों में एक साथ दिखाई देती हैं। डिजिटल दुनिया और आधुनिक बाजारों के विस्तार के बावजूद इन मेलों की आत्मीयता और सांस्कृतिक महत्व आज भी कायम है।साझी विरासत की पहचान हैं यूपी के पारंपरिक मेले
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक मेलों में धूल भरी पगडंडियां, ऊंचे झूले, जलेबी की खुशबू, लोकगीत, रागिनी और कव्वाली का अनूठा संगम देखने को मिलता है। ये मेले केवल मनोरंजन या व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग धर्मों, समुदायों और क्षेत्रों के लोगों को एक मंच पर लाते हैं।
अवध की सूफी धरती से लेकर ब्रज के घाटों, पूर्वांचल की धार्मिक परंपराओं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक मैदानों तक फैले ये आयोजन गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल हैं। साथ ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय कारोबार को भी मजबूती देते हैं।
देवा शरीफ मेला: ‘जो रब है वही राम हैं’ का संदेश
बाराबंकी जिले में लगने वाला देवा शरीफ का मेला धार्मिक सौहार्द और साझा संस्कृति का बड़ा उदाहरण है। 19वीं सदी के सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर हर साल कार्तिक महीने में इस मेले का आयोजन होता है। वारिस पाक का संदेश था- ‘जो रब है वही राम हैं’।
इसी विचारधारा का असर मेले में भी दिखाई देता है। यहां चादर चढ़ाने के लिए मुस्लिम श्रद्धालुओं के साथ बड़ी संख्या में हिंदू भी पहुंचते हैं। दरगाह परिसर के बाहर मेला मैदान में मुशायरे, सूफी संगीत और पारंपरिक दंगल का आयोजन होता है।
इस दंगल में अयोध्या, गोरखपुर, हरियाणा और पंजाब तक से पहलवान हिस्सा लेने पहुंचते हैं। यहां धर्म और समुदाय का भेद पीछे छूट जाता है और खेल तथा कला लोगों को एक साथ जोड़ते हैं।
बटेश्वर मेला: यमुना किनारे शिव भक्ति और पशु व्यापार का संगम
आगरा जिले में यमुना नदी के किनारे स्थित बटेश्वर धाम अपने 101 शिव मंदिरों की श्रृंखला के लिए प्रसिद्ध है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां लगने वाला मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ पशु व्यापार की पुरानी परंपरा को भी जीवित रखे हुए है। इसे उत्तर भारत के बड़े पशु मेलों में गिना जाता है।
इस मेले में राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात से व्यापारी ऊंट, घोड़े, खच्चर और अच्छी नस्ल की गाय-भैंसों की खरीद-बिक्री के लिए पहुंचते हैं। एक ओर यमुना में दीपदान और मंदिरों में पूजा-अर्चना होती है, तो दूसरी ओर पशु बाजार में व्यापारियों की चहल-पहल रहती है।
मेले में लोकगीत, आल्हा-ऊदल का गायन और स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें भी आकर्षण का केंद्र होती हैं। इस तरह बटेश्वर मेला धार्मिक परंपराओं के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोकसंस्कृति की झलक भी पेश करता है।
ददरी मेला: भारतेंदु हरिश्चंद्र के ऐतिहासिक भाषण से जुड़ी है पहचान

बलिया का ददरी मेला पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि ने यहां यज्ञ संपन्न कराया था। इसी घटना की स्मृति में मेले की शुरुआत मानी जाती है। सोनपुर मेले के बाद इसे उत्तर भारत के बड़े पशु मेलों में शामिल किया जाता है।
ददरी मेला दो चरणों में आयोजित होता है। पहले चरण को ‘नंदी ग्राम’ और दूसरे को ‘मीना बाजार’ कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान के बाद शुरू होने वाला यह आयोजन कई महीनों तक चलता है।
इस मेले की एक खास पहचान ‘भारतेंदु मंच’ भी है। वर्ष 1884 में इसी मंच से भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपना चर्चित भाषण ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?’ दिया था। आज भी यह मेला किसानों, बुद्धिजीवियों, व्यापारियों और लोक कलाकारों के मिलने-जुलने का बड़ा मंच बना हुआ है।
नौचंदी मेला: मंदिर और दरगाह के बीच दिखती है साझा संस्कृति
मेरठ का ऐतिहासिक नौचंदी मेला गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे चर्चित मिसालों में से एक है। होली के दूसरे रविवार से शुरू होने वाला यह मेला करीब एक महीने तक चलता है। नौचंदी मैदान में एक ओर नवचंडी देवी का प्राचीन मंदिर है, तो दूसरी ओर हजरत बाले मियां की दरगाह स्थित है। बाले मियां को सैयद सालार मसूद गाजी का सेनापति बताया जाता है।
यहां मंदिर की घंटियों और दरगाह की अजान की आवाज एक साथ सुनाई देती है। श्रद्धालु मंदिर में पूजा करते हैं और दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी इस मेले का विशेष महत्व रहा था। बताया जाता है कि उस समय यह क्रांतिकारियों के बीच गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान और जनसंपर्क का प्रमुख केंद्र बना था।
नौचंदी मेले में लगने वाला विशाल बाजार भी लोगों को आकर्षित करता है। यहां मेरठ की कैंची, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन और पारंपरिक हलवा-पराठा खास पहचान रखते हैं।
आधुनिकता के बीच बदल रहा है मेलों का स्वरूप
समय के साथ इन पारंपरिक मेलों का स्वरूप भी बदल रहा है। अब मिट्टी के खिलौनों और पारंपरिक दुकानों के साथ इलेक्ट्रॉनिक सामान, डिजिटल भुगतान के लिए यूपीआई बोर्ड और आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था भी दिखाई देती है। प्रशासन की ओर से स्वच्छता अभियान चलाकर बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, आधुनिक परिवहन और डिजिटल व्यापार के बढ़ते चलन का असर पशु मेलों पर भी पड़ा है। पारंपरिक पशु बाजारों में मवेशियों की आवक पहले की तुलना में कम हुई है। वहीं, सिनेमा और स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच के कारण नौटंकी, कठपुतली और स्वांग जैसी लोककलाओं से जुड़े कलाकारों को दर्शक जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
इसके बावजूद देवा शरीफ, बटेश्वर, ददरी और नौचंदी जैसे मेले अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए हैं। ये आयोजन याद दिलाते हैं कि उत्तर प्रदेश की असली ताकत उसकी विविधता, साझा परंपराओं और आपसी मेलजोल में छिपी है।
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