रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति जी के मार्गदर्शन में भारतीय जनजातीय चिकित्सा परंपराओं पर आधारित महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन

बरेली, 17 मार्च।भारत की समृद्ध जनजातीय परंपराओं, प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों तथा पारंपरिक औषधीय ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धि के रूप में “Traditional Tribal Medicine: A Hidden Brief Knowledge of India’s Culture” नामक पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। यह पुस्तक महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली के माननीय कुलपति महोदय के मार्गदर्शन में प्रकाशित की गई है। यह कृति भारतीय जनजातीय समाज में प्रचलित पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों, औषधीय पौधों के उपयोग और सांस्कृतिक विश्वासों को अकादमिक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है और यहां की जनजातीय संस्कृति भी अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों ने सदियों से प्रकृति के साथ गहरा संबंध स्थापित किया है और प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से स्वास्थ्य संरक्षण तथा रोग उपचार की अनेक परंपरागत विधियों का विकास किया है। इन समुदायों में औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों, प्राकृतिक खनिजों तथा स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर अनेक रोगों का उपचार किया जाता रहा है। यह ज्ञान मुख्यतः अनुभव, परंपरा और गुरु–शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है। हालांकि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण यह बहुमूल्य ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर पहुंच रहा है। ऐसे समय में इस प्रकार के ज्ञान का वैज्ञानिक और नैतिक दस्तावेजीकरण अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए “Traditional Tribal Medicine: A Hidden Brief Knowledge of India’s Culture” पुस्तक का लेखन किया गया है। इस पुस्तक में भारत के विभिन्न जनजातीय समुदायों में प्रचलित पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों, औषधीय पौधों के उपयोग, प्राकृतिक उपचार प्रणालियों तथा उनसे जुड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहलुओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार जनजातीय समाज में स्वास्थ्य और प्रकृति के बीच गहरा संबंध माना जाता है तथा रोगों के उपचार में प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और सतत उपयोग किया जाता है।
पुस्तक में अनेक औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों तथा उनके पारंपरिक उपयोगों के बारे में जानकारी दी गई है। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित हर्बल औषधियों की तैयारी, पारंपरिक वैद्यों और उपचारकों की भूमिका, स्थानीय चिकित्सा परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं का भी उल्लेख किया गया है। पुस्तक में जनजातीय समाज की आहार परंपराओं, जीवनशैली तथा स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। यह कृति इस बात को भी रेखांकित करती है कि जनजातीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग की महत्वपूर्ण अवधारणाएं भी निहित हैं।

यह पुस्तक पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती है। इसमें एथ्नोफार्माकोलॉजी और औषधीय पौधों के वैज्ञानिक महत्व को भी रेखांकित किया गया है, जिससे भविष्य में इन पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के वैज्ञानिक अध्ययन और औषधीय अनुसंधान को प्रोत्साहन मिल सके। आज जब विश्व भर में प्राकृतिक और हर्बल औषधियों के प्रति रुचि तेजी से बढ़ रही है, ऐसे समय में भारत की जनजातीय चिकित्सा परंपराओं का अध्ययन और संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक डॉ. अमित कुमार वर्मा (डी.एससी. उपाधि धारक), सुरभि शाक्य एवं अनुब्रत रैना हैं। डॉ. अमित कुमार वर्मा फार्मेसी के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद, शोधकर्ता और मार्गदर्शक हैं। वे रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग से जुड़े हुए हैं और औषधीय पौधों, एथ्नोफार्माकोलॉजी, आवश्यक तेलों तथा हर्बल औषधियों के क्षेत्र में व्यापक शोध कार्य कर चुके हैं। उन्होंने अनेक शोध पत्र, पुस्तकें और पुस्तक अध्याय प्रकाशित किए हैं तथा कई शोध परियोजनाओं का सफलतापूर्वक संचालन किया है।
सह-लेखिका सुरभि शाक्य फार्मास्यूटिकल साइंसेज में शोधरत हैं और औषधीय पौधों, आवश्यक तेलों, हर्बल औषधियों तथा नवीन औषधि वितरण प्रणालियों के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। वहीं अनुब्रत रैना फार्मास्यूटिकल केमिस्ट्री और औषधीय अनुसंधान के क्षेत्र में कार्यरत हैं तथा उन्होंने औषधीय अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रकाशनों के माध्यम से अपने योगदान को स्थापित किया है। तीनों लेखकों ने इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय जनजातीय ज्ञान परंपरा को शैक्षणिक और वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत करने का सराहनीय प्रयास किया है।
यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, औषधि वैज्ञानिकों, चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों, एथ्नोबॉटनी एवं एथ्नोफार्माकोलॉजी के शोधकर्ताओं तथा नीति-निर्माताओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इसके माध्यम से न केवल पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की समझ विकसित होगी, बल्कि भविष्य में इनके वैज्ञानिक अध्ययन और व्यावहारिक उपयोग के नए आयाम भी सामने आएंगे।
लेखकों ने इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली के माननीय कुलपति महोदय के मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और आशीर्वाद के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया है। उनके मार्गदर्शन में तैयार की गई यह कृति भारतीय जनजातीय चिकित्सा परंपराओं की अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने और उसे व्यापक शैक्षणिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह पुस्तक न केवल भारतीय जनजातीय समाज की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को समझने में सहायक होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य ज्ञान को संरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इस प्रकार “Traditional Tribal Medicine: A Hidden Brief Knowledge of India’s Culture” भारतीय पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है।
बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट
