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बीबीएयू में ईईजी कार्यशाला से समझे मस्तिष्क के संकेत, विशेषज्ञों ने न्यूरोसाइंस और ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस के बताए अनुप्रयोग

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ में 6 अक्टूबर को स्कूल ऑफ योग, नेचुरोपैथी एंड कॉग्निटिव स्टडीज के योग विभाग की ओर से ‘ब्रेन पोटेंशियल: द ईईजी वर्कशॉप- एक्सप्लोरिंग ब्रेन सिग्नल्स फॉर साइंटिफिक डिस्कवरी एंड रियल-वर्ल्ड एप्लीकेशंस’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसका उद्देश्य मस्तिष्क संकेतों, इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी (ईईजी) और उनके वास्तविक जीवन में उपयोग को लेकर विद्यार्थियों और शोधार्थियों की समझ विकसित करना रहा।

कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में मैगस्टिम ईजीआई, यूएसए के डॉ. सुहास विंचुरकर मौजूद रहे। मंच पर योग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दीपेश्वर सिंह, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर एआई, बीबीएयू की समन्वयक प्रो. बबिता पाण्डेय और डॉ. नवीन जी. एच मौजूद रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय कुलगीत का गायन हुआ और आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि व शिक्षकों को पौधा भेंट किया गया।

ईईजी से मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों को समझने में मदद

डॉ. सुहास विंचुरकर ने अपने संबोधन में बताया कि ईईजी तकनीक के जरिए मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों और उसके विभिन्न संकेतों को वैज्ञानिक तरीके से समझने में सहायता मिलती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में ईईजी, ईआरपी और ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस जैसी तकनीकों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।

उन्होंने बताया कि इन तकनीकों के जरिए मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने के साथ शोध, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और वास्तविक जीवन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। डॉ. विंचुरकर ने कहा कि ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों और शोधार्थियों को आधुनिक न्यूरोसाइंस तकनीकों की व्यावहारिक समझ देने का प्रभावी माध्यम हैं।

उन्होंने ईईजी के वैज्ञानिक और जिम्मेदार इस्तेमाल के साथ न्यूरल प्राइवेसी, सूचित सहमति और नैतिक पहलुओं को समझने पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक अकादमिक संस्थानों में इस तरह का प्रशिक्षण युवा शोधकर्ताओं को नई तकनीकों के साथ काम करने और भविष्य में न्यूरोसाइंस तथा बेसिक कंप्यूटर इंटरफेस के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने का अवसर देता है।

डेल्टा से बीटा तक, अलग-अलग मस्तिष्क तरंगों की दी जानकारी

विभागाध्यक्ष डॉ. दीपेश्वर सिंह ने कहा कि आज के दौर में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझना और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रोएन्सेफालोग्राफी एक सुरक्षित, गैर-आक्रामक और दर्द-रहित न्यूरोइमेजिंग तकनीक है। इसमें खोपड़ी पर इलेक्ट्रोड लगाकर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों और वोल्टेज में होने वाले बदलावों को मिलीसेकंड्स की उच्च सटीकता के साथ रिकॉर्ड किया जाता है।

उन्होंने बताया कि ईईजी के जरिए मस्तिष्क की अलग-अलग तरंगों का विश्लेषण किया जाता है। इनमें डेल्टा तरंगें गहरी नींद और रिकवरी, थीटा तरंगें ध्यान और स्मृति, अल्फा तरंगें शांत जागरूकता तथा बीटा तरंगें सक्रिय सोच और ध्यान केंद्रन से जुड़ी होती हैं।

डॉ. विंचुरकर ने कहा कि आधुनिक न्यूरोसाइंस तकनीक के जरिए मेडिकल और क्लीनिकल रिसर्च में नए आयाम स्थापित करने के साथ आम लोगों के दैनिक जीवन में माइंडफुलनेस, तनाव प्रबंधन और बौद्धिक क्षमता को बेहतर बनाने की दिशा में भी काम किया जा सकता है। इससे स्वस्थ और जागरूक समाज के निर्माण में मदद मिल सकती है।

चार सत्रों में ईईजी, न्यूरोनल कंडक्शन और बीसीआई पर प्रशिक्षण

कार्यशाला के दौरान कुल चार सत्र आयोजित किए गए। इनमें ईईजी, न्यूरोनल कंडक्शन और ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई और लाइव प्रदर्शन भी प्रस्तुत किया गया। पहले सत्र में ईईजी के मूलभूत सिद्धांतों और मस्तिष्क संकेतों के बारे में जानकारी दी गई।

दूसरे सत्र में न्यूरोनल कंडक्शन और एक्शन पोटेंशियल्स की कार्यप्रणाली पर चर्चा हुई। तीसरे सत्र में इवोक्ड पोटेंशियल्स, इवेंट-रिलेटेड पोटेंशियल्स और सामाजिक विज्ञान में इनके शोध अनुप्रयोगों पर प्रकाश डाला गया। चौथे सत्र की शुरुआत ईईजी प्रदर्शन के साथ हुई। इसमें विभिन्न व्यावहारिक गतिविधियां कराई गईं। प्रदर्शन के बाद प्रमुख सीख पर चर्चा हुई और प्रतिभागियों के लिए प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने अपने अनुभव और प्रतिक्रिया साझा की।

न्यूरल प्राइवेसी और जिम्मेदार उपयोग पर भी जोर

कार्यशाला में ईईजी के मूलभूत सिद्धांत, ईईजी और ईआरपी डेटा का अधिग्रहण, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के संकेतकों की पहचान के लिए विश्लेषण प्रोटोकॉल, ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस और न्यूरोमॉड्यूलेशन के अनुप्रयोगों की जानकारी दी गई। इसके अलावा प्रयोगशाला और क्षेत्रीय स्तर पर उपकरणों के चयन तथा अकादमिक और उद्योग विशेषज्ञों से व्यावहारिक प्रशिक्षण के बारे में भी बताया गया।

कार्यशाला में बीसीआई से जुड़े नैतिक पहलुओं, न्यूरल प्राइवेसी, सूचित सहमति, सुरक्षा और मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस के जिम्मेदार इस्तेमाल जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों को ईईजी प्रशिक्षण का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया।

पूरे कार्यक्रम के दौरान डॉ. नरेंद्र सिंह, डॉ. कंचन यादव समेत अन्य शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।

 

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