CEC ज्ञानेश कुमार पर जयराम रमेश का तीखा हमला, बोले- अब देश के लिए बोझ बन गए, तुरंत दें इस्तीफा
नई दिल्ली: कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपना हमला और तेज कर दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोमवार को कहा कि ज्ञानेश कुमार को तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘जी-2 के गैर-कानूनी आदेशों को लागू करने’ की उनकी क्षमता ने उन्हें अब ‘देश के लिए बोझ’ बना दिया है। कांग्रेस का यह हमला सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की उस टिप्पणी के बाद सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ऐसी कोई प्रक्रिया, जिससे लाखों भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़े, पूरी तरह मनमानी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ होगी।
न्यायमूर्ति भुइयां की टिप्पणी को बनाया हमले का आधार

जयराम रमेश ने न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी का वीडियो साझा करते हुए सीईसी ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति भुइयां ने हैदराबाद की नालसार विधि विश्वविद्यालय में सीईसी की “पूरी तरह पोल खोल दी।” रमेश ने कहा कि अगर ज्ञानेश कुमार में थोड़ी भी शर्म बची है तो उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि ‘जी-2 के गैर-कानूनी आदेशों को लागू करने’ की उनकी क्षमता ने उन्हें देश के लिए बोझ बना दिया है। जयराम रमेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधने के लिए ‘जी-2’ शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं।
कांग्रेस ने संविधान की मूल भावना के उल्लंघन का लगाया आरोप
कांग्रेस इससे पहले भी न्यायमूर्ति भुइयां की टिप्पणी के आधार पर चुनाव आयोग पर सवाल उठा चुकी है। पार्टी ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि सीईसी ने संविधान के अक्षर और उसकी मूल भावना, दोनों का उल्लंघन किया है।
जयराम रमेश ने कहा था कि न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां पर्यावरण संरक्षण के मुखर समर्थक रहे हैं और अब इस “साहसी कानूनविद” ने वोट देने के अधिकार को लेकर अपनी राय मजबूती से रखी है। रमेश का दावा है कि न्यायमूर्ति भुइयां की टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि संवैधानिक पद पर बैठे सीईसी ने संविधान की भावना का उल्लंघन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहने का “सारा नैतिक अधिकार” खो चुके हैं।
चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को लेकर भी कांग्रेस के सवाल
कांग्रेस का यह हमला उन रिपोर्टों के बाद और तेज हुआ है, जिनमें चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े फैसलों को लेकर मतभेद का दावा किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में इस प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों का मानना था कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या उनकी सिफारिश के बिना लिए गए। इससे चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं।
चुनाव आयोग ने कहा- अलग राय होना सामान्य प्रक्रिया
चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी भी संस्था में अलग-अलग राय होना और फैसलों पर विचार-विमर्श किया जाना सामान्य बात है। आयोग के मुताबिक, उसके सभी आदेशों को कानूनी मान्यता हासिल है और उन्हें निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत ही जारी किया जाता है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि किसी मुद्दे पर अंदरूनी अलग राय या मतभेद को उसके फैसलों की वैधता पर सवाल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति भुइयां ने वोट के अधिकार पर क्या कहा था?
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हैदराबाद स्थित नालसार विधि विश्वविद्यालय में 19वीं न्यायमूर्ति बोध राज साहनी स्मृति वाद-विवाद प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने मतदान के अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो अलग-अलग वर्गों की कल्पना नहीं करता, जिसमें एक वर्ग को वोट देने का अधिकार हो और दूसरे को इससे वंचित रखा जाए।
न्यायमूर्ति भुइयां के मुताबिक, अगर किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में बिना मतदान अधिकार वाले नागरिक बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी।
लाखों लोग वोट से वंचित हुए तो मनमानी होगी
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा था कि अगर किसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लाखों या करोड़ों भारतीय नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी स्थिति में पहुंच जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी होगी।
उन्होंने कहा था कि ऐसी स्थिति को किसी दूसरे मामले का उदाहरण देकर या दूसरे मामलों का हवाला देकर सही नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक, ऐसी कार्रवाई संविधान की मूल भावना पर सीधा हमला होगी और भारत की संवैधानिक व्यवस्था को नकारने के समान होगी।
‘कोई भी संविधान से ऊपर नहीं’
न्यायमूर्ति भुइयां ने मतदान के अधिकार को देश की आजादी के संघर्ष से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार विदेशी शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष और बलिदान से जुड़ा हुआ है।
उनके मुताबिक, अनुच्छेद 326 के प्रावधानों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और न ही कोई अदालत इसका समर्थन या मंजूरी दे सकती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।
वोट देने का अधिकार लोकतंत्र का अहम हिस्सा
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा था कि वोट देने या मतदाता बनने का अधिकार महज संसद के बनाए किसी कानून से मिलने वाला कानूनी अधिकार नहीं है। उनके मुताबिक, यह एक संवैधानिक अधिकार है और लोकतंत्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसी आधार पर उन्होंने इसे भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा बताया। उनकी इस टिप्पणी को कांग्रेस ने चुनाव आयोग और खास तौर पर सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने आरोपों के समर्थन में इस्तेमाल किया है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित अधिकारों के दायरे में लिए जाते हैं।
