Wednesday, July 22, 2026
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कर्नाटक में खुदाई के दौरान मिला बड़ा पुरातात्विक खजाना, रावण की 35 से ज्यादा प्राचीन मूर्तियां मिलने से इतिहासकार भी हैरान

मांड्या: कर्नाटक के मांड्या और मैसुरु जिलों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई और शोध के दौरान रावण की 35 से अधिक प्राचीन मूर्तियां मिलने का दावा सामने आया है। इस खोज ने इतिहासकारों का ध्यान इसलिए भी आकर्षित किया है क्योंकि मांड्या का मुथथी क्षेत्र पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम, माता सीता और रामायण काल से जुड़ा माना जाता है, जबकि निकटवर्ती पांडवपुरा और कुंती बेट्टा का संबंध महाभारत काल के पांडवों से बताया जाता है। ऐसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रावण की मूर्तियों का मिलना प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर नए सवाल खड़े कर रहा है।

अलग-अलग स्थानों से मिलीं कई प्राचीन मूर्तियां

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मद्दूर, मलावल्ली और मांड्या तालुक में खुदाई के दौरान करीब 15 से 20 रावण की मूर्तियां बरामद की हैं। वहीं प्राचीन इतिहास और पुरातत्व के विद्वान प्रोफेसर एन.एस. रंगराजू ने अपने स्वतंत्र शोध के दौरान मलावल्ली, बन्नूर और टी. नरसीपुरा क्षेत्र से करीब 15 से 20 अन्य प्राचीन मूर्तियां खोजी हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि विभिन्न स्थानों से एक साथ इतनी बड़ी संख्या में रावण की मूर्तियों का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र के कुछ समुदायों में रावण के प्रति विशेष सम्मान या पूजा की परंपरा मौजूद रही होगी।

कार्बन डेटिंग से खुलेगा मूर्तियों की उम्र का राज

पुरातत्वविद अब इन सभी मूर्तियों की वास्तविक आयु और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं। इसके तहत शिलालेखों का अध्ययन, विस्तृत विश्लेषण और कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र के इतिहास को बेहतर ढंग से समझने के लिए आगे भी खुदाई और दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि जमीन के भीतर ऐसी और भी प्राचीन मूर्तियां या कलाकृतियां मौजूद हैं या नहीं।

मांड्या का रावण से पहले भी जुड़ चुका है नाम

मांड्या जिले का रावण से जुड़ाव पहले भी चर्चा में रहा है। जिले के मलावल्ली तालुक स्थित निदघट्टा गांव में रावण का एक प्राचीन मंदिर मौजूद है, जहां स्थानीय लोग लंबे समय से रावण को महान राजा और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में पूजते आ रहे हैं।

इतिहासकारों के अनुसार, दक्षिण भारत की कई क्षेत्रीय परंपराओं में रावण को उसकी विद्वता, वेदों के ज्ञान और संगीत में दक्षता के कारण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। ऐसे में रामायण से जुड़े मुथथी क्षेत्र के आसपास बड़ी संख्या में रावण की मूर्तियों का मिलना इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं के नए पहलुओं को सामने ला सकता है।

शोध से खुल सकते हैं इतिहास के नए अध्याय

विशेषज्ञों का मानना है कि इस खोज के बाद दक्षिण भारत के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास पर नए सिरे से अध्ययन का रास्ता खुलेगा। वैज्ञानिक जांच और आगे की खुदाई के बाद इन मूर्तियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आ सकते हैं।

 

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